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बोले जाने पर बोला जाना चाहिये

प्रकाशन :शनिवार, 1 मई 2010
अख़्तर अली

न दिनों जितना बोला जा रहा है उतना शायद बोले जाने के इतिहास में और कभी नहीं बोला गया होगा । कौन बोल रहा है, क्यों बोल रहा है, क्या बोल रहा है, ये कुछ भी समझ नहीं आ रहा है । बोला जाना चीख़ें जाने में तब्दील हो चुका है । लोग माईक में चिल्ला रहे है, इतनी ज़्यादा शक्ति लगाकर बोला जा रहा है कि बोला जाना शोर मचाने की की श्रेणी में आ गया है ।

बोले जाने की कोई ख़ास वजह नहीं है फिर भी बोला जा रहा है । कोई सुनने वाला नहीं है फिर भी बोला जा रहा है । मंदिर, मस्जिद, बाज़ार, स्कूल, गोष्ठि, सभा, जहाँ भी आप चले जाईये आप पायेगे कि वहा बोलने की होड़ मची हुई है । हर आदमी इसी कोशिश में है कि बस एक बार माईक हाथ में आ जाये । जिसके हाथ में माईक है वह माईक छोड़ने को तैयार नहीं और जिसके हाथ में अभी माईक आया नहीं है वह वहाँ से हटने को तैयार नहीं । जिनके पास बोलने को कुछ नहीं है वह भी बोलने वालों की लाईन में है, जिनके पास बोलने का सलीक़ा नहीं है वह भी बोलने को आमादा है । यह तय करने वाला कोई नहीं है कि कब किसको कहाँ बोलना है । जिसको ष और स में अंतर नहीं मालूम वह भी बोल रहा है । कक्षा में जो हर प्रश्न के जवाब में सिर्फ़ चुप रहा वह भी माईक हाथ में लेकर सवाल पर सवाल किये जा रहा है । शब्दों की इतनी फ़जूल ख़र्ची और कभी नहीं की गई होगी जितनी इन दिनों की जा रही है । ऐसा लग रहा है मानो पूरे देश में बोलने के वायरस फैल गये है, बोलने की बीमारी लग गई है, बोलने का प्रकोप फैल गया है । एक आदमी बोलता है फिर उसके बोलने पर पाँच औरे उनके बोलने पर पच्चीस आदमी बोलते है यानी बोलने के कीटाणु बहुत तेज़ी से फैल रहे है । अगर आप अपने आस पास ध्यान देगे तो महसूस करेंगे कि ज्ञानी को छोड़ कर हर आदमी बोल रहा है ।

अचानक इतना अधिक बोले जाने की ज़रूरत क्यों पड़ गई ? क्या बोलने का यह तरीक़ा नहीं होना चाहिये कि एक आदमी बोले और बहुत से उसे ध्यान पूर्वक सुने । वह एक बोलने वाला भी कोई ज्ञानी ध्यानी ही होना चाहिये । बोलने का यह कौन सा मापदंड़ हुआ कि चूँकि कल तुमने बोला था इसलिये आज हम बोलेंगे । आज कल गोष्ठियों में लोग सुनने नहीं सिर्फ़ बोलने जाते है, इस अनावश्यक और अत्याधिक बोले जाने के कारण आज कल बोले जाने को महत्व नहीं दिया जा रहा है । कुछ महत्वपूर्ण बाते महत्वहीन बातों के शोर में दब जा रही है, आप अपने इर्द-गिर्द नज़र ड़ालेंगे तो महसूस करेंगे कि यहाँ हर दूसरा आदमी भाषण देने की मुद्रा में खड़ा है । यह बहुत चिंता की बात है कि आजकल बोला जाना बहुत आसान हो गया है । आठवी फ़ेल आदमी भी केन्द्रीय बजट पर टिप्पणी कर रहा है, वित्त मंत्री की आलोचना में बोल रहा है । मंच अयोग्य आदमी की मुटठी में है उसने योग्य आदमी को नेपथ्य में धकेल दिया है । योग्य आदमी अल्पमत में आ गया है । बोलना ही योग्यता की पहचान मानी जाने लगी है । लोगों पर बोलने का नशा इस कॉदर चढ़ गया है कि उनको इतना होश भी नहीं रहता है कि उनके द्धारा क्या बोला जा रहा है, क्यों बोला जा रहा है ? बस एक बार माईक भर हाथ में आ जाये फिर तो पूरे मौहोल की सत्यानाश कर देना तो इनके बाये हाथ का खेल है । कुछ नहीं बोल पायेंगे तो ड़ेढ़ दो घंटे इसी बात का शोर मचाते रहेंगे कि कृपया शांति बनाये रखे ।

अगर बोले जाने पर सोचा जाये तो बड़ी चौकाने वाली बात सामने आयेगी, आप भी सोचेगे कि ये कैसा गड़बड़झाला है कि बोलने के अंदर से विचार ही गायब है, भाषा ही लुप्त हो गई है फिर भी बोला जा रहा है । बोलने वाला अगर बोलता है कि यही विचार है यही भाषा है तो वो बोलने की लिये स्वतंत्र है वह इस बकबक को विचार बोल सकता है, क्योंकि उसकी तो कोई विचारधारा है ही नहीं, और शायद उसे यह भी मालूम न हो कि विचारधारा जैसी कोई चीज़ होती भी है, फिर भी वह सीना ठोक कर बोल रहा है, उसके पास भाषा नहीं है लेकिन शब्दों की कमी तो नहीं है उसके पास । बिन भाषा और बिन शब्द के बोलने वाले बोले जा रहे है । उनके भेजे में बुद्धि नहीं है तो क्या हुआ मुटठी में पैसा तो है, भले माईक उनके मुँह के सामने हो पर बोल उनका जेब रहा है । शहर में विचारहीन और विचारवान दोनों बोलते हैं लेकिन दूसरे दिन सामाचार पत्र के मुख्य पृष्ठ पर कौन होता है और तीसरे पेज पर कौन होता है यह सर्वविदित है । इस अनाप-शनाप बोले जाने से आये दिन बड़ी विचित्र स्थति निर्मित हो जाती है जब बोले जाने पर बोला जाता है कि मेरे बोलने का अभिप्राय यह नहीं था , मेरे बोलने का ग़लत अर्थ निकाला जा रहा है । अरे भय्या आप पहले से ही अर्थवान बोलो न ताकि दूसरो को आपके बोले जाने में से अर्थ ढूँढने की आवश्यकता ही न पड़े । पहले बोलना कठिन और सुनना आसान होता था लेकिन आजकल ऐसा लगता है कि बोलना सरल और सुनना कठिन हो गया है । पहले देश में चुनिंदा लोग बोलते थे और हज़ारों लोग उसे सुनते थे, सुनने का आनंद लेते थे, सुनने में मगन हो जाते थे, सुनकर तालियाँ बजाते थे वाह वाह करते थे, क्योंकि जो बोला जा रहा होता था वह सार्थक होता था, तर्कसंगत होता था, देश, समाज और व्यक्ति के लिये वह बोला जाना अत्यंत आवश्यक होता था क्योंकि वह स्वयं के लिये नहीं दूसरो के हित के लिये बोला जाता था । बोलने की कला पर नहीं, बोले जाने वाले विषय पर ध्यान दिया जाता था । लेकिन अब सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो गया है । अब मंच से बोला नहीं बका जा रहा है, स्तरहीन मुद्दों को उछाला जा रहा है, बेहुदा शब्दों का पथराव हो रहा है मंचों से । यह तो चिंता की बात है ही कि ऐसा बोला क्यों जा रहा है लेकिन उससे भी ज़्यादा चिंता की बात यह है कि ऐसा सुना क्यों जा रहा है ? सभाओ, गोष्ठियो, प्रवचनों को सुनने वालो की बढ़ती संख्या सफ़ल बना रही है ।

पहले सुनने का अवसर नहीं मिलता था तो लोग नाराज़ हो जाते थे कि आयोजन हमारी सुविधा अनुसार क्यों नहीं रखा गया ? हम तो सुनने से वचित रह गये लेकिन अब बोलने का अवसर नहीं मिलता है तो लोग नाराज़ हो जाते है । अब लाईट माईक कुर्सी का पैसा देकर बोलने का अवसर ख़रीदा जा रहा है । बहुत अंतर होता है कि अवसर आपके पास आ रहा है या आप अवसर के पास जा रहे हैं । क़ाबलियत ने आपको अवसर दिया या चालबाज़ी से आपने अवसर हथियाया । कुल मिलाकर संकट यह है कि इन दिनों बोला जाना समस्या बनता जा रहा है और हम इस समस्या से वाकिफ़ नहीं है । हमें इस ओर ध्यान देना होगा कि ये चारों तरफ़ इतना बोला क्यों जा रहा है ? इसकी वजह क्या है , इसकी आवश्यकता क्या है, उपयोगिता क्या है ? इस बोले जाने से क्या लाभ है और अगर यह नहीं बोला जायेगा तो क्या नुकसान होगा ? जो भाषण, प्रवचन, समीक्षा, उदघोषणा कर रहा है उस व्यक्ति में ऐसा क्या गुण है जिसके तहत उसे ऐसा करने का अधिकार मिला है । कुछ ऐसा करना होगा कि इस अनावश्यक बोले जाने में कमी आये । यह भी एक प्रकार का प्रदूषण है जिसे साफ़ किया जाना चाहिये । बोलने वाले से यह पूछा जाना चाहिये कि आपने पिछली बार जो जो बोला था उस पर क्या अमल हुआ ? उस बोले जाने पर आपने क्या क़दम उठाया ? ऐसा तो नहीं कि उस कहनी और करनी में ज़मीन आसमान का अंतर पता चले । यदि ऐसा है तो उसे बोलने का अधिकार नहीं देना चाहिये । यदि इस स्वतंत्र देश में वह बोलने के लिये आज़ाद है तो हम भी तो सुनने के लिये बाध्य नहीं है । हमें वहा अनुपस्थित रह कर उस कार्यक्रम को असफल कर देना चाहिये । अगर हम उस बोलने वाले से उसके बोलने का हिसाब नहीं ले सकते तो कोई बात नहीं हम मन ही मन उसके कहनी और करनी का हिसाब लगा तो सकते हैं । हम उसे अपनी क्षमता के अनुसार जाँच परख तो सकते है ? हम स्वयं परीक्षक बन कर पास या फ़ेल कर सकने का अधिकार तो रखते है । चुनावी सभाओ में खिलाड़ी और अभिनेता बोल रहे है , साहित्यिक गोष्ठियो में नेता बोल रहे है , पुस्तक विमोचन के कार्यक्रम में उद्योगपति बोल रहे हैं ...... आख़िर यह क्या गड़बड़ घोटाला है ? क्या इसका अर्थ यह नहीं निकालना चाहिये कि इन दिनों बोलना मज़ाक़ बन कर रह गया है ? क्या अब समय नहीं आ गया है कि जब एक आम आदमी सुनने से इंकार कर दे ? क्या कोई ऐसा सिस्टम तैयार करने की आावश्यकता नहीं है जिसके तहत केवल मान्यता प्राप्त लोग ही सार्वजनिक तौर पर बोल सके । बोलना, चल रही व्यवस्था में दखल देना होता है और इतना महत्वपूर्ण काम हर एैरा-गैरा कैसे कर सकता है ?

बोलना, कम बोलना और नहीं बोलना ये तीनों बिलकुल अलग-अलग चीज़ है और तीनों का अपना महत्व है । मैं बोलने के ख़िलाफ़ नहीं हूँ, मै कम बोलने का भी हिमायती नहीं हूँ और चुप रहने का समर्थक भी नहीं हूँ । ये चीज़े हमारे औजार और हथियार है इनका इस्तेमाल बहुत सोच समझ कर करना होगा । अगर बहुत बोलने की ज़रूरत है तो वहाँ कम क्यों बोलना और चुप रहने से ही काम बन सकता है तो थोड़ा सा भी क्यों बोलना ? हमें बोलने को हस्तक्षेप मानना चाहिये इसलिये कहीं भी किसी का भी बोलना गंभीर और आवश्यक ही होना चाहिये इससे कम कदापि नहीं । जोश में बोले गये को बोलना न माना जाये यहाँ सिर्फ़ होष में बोलने वालो को ही सुना जाना चाहिये । हमारे यहाँ अब कुछ ऐसी व्यवस्था हो ही जानी चाहिये जिसके तहत हर किसी को बोलने का अधिकार न मिले । बोलने की कुछ तो न्यूनतम योग्यता होनी चाहिये कुछ तो मापदंड़ होने चाहिये । जैसे विश्व कप में खेलने के लिये टीम को क्वालिफ़ाई करना होता है वैसा ही कुछ इस क्षेत्र में भी लागू कर देना चाहिये । जैसे जिस नेता को उसकी पार्टी ने ही टिकट देने की ज़रूरत न समझी उसे बोलने का भी हक़ नहीं होना चाहिये । जो नेता चुनाव हार जाये उसे बोलने का हक़ नहीं होना चाहिये । जो उद्योगपति ने समय पर टैक्स नहीं भरा हो उसे बोलने का हक़ नहीं मिलना चाहिये । बोलने वाले के पिछले रिकार्ड़ चेक करना चाहिये कि वह अपनी पहले कही गई बातों पर अड़िग है कि नहीं ? वह कहे गये अनुसार ही कार्य कर रहा है या नहीं ? उसका पिछला बोला गया भड़काऊ तो नहीं था ? उससे क़ानून और व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव तो नहीं पड़ा ? उसके बोलने से किसी की भावना तो आहत नहीं हुई ? मै यह क़तई कहना नहीं चाह रहा हूँ कि बोलने पर पूरी तरह पाबंदी ही लगा देनी चाहिये । कमज़ोरी, खराबी के ख़िलाफ़ यदि बोला नहीं जायेगा तो देश में कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज़ ही नहीं रहेगी । बुराई का नाश करने में जिन हथियारो का इस्तेमाल किया जाता है उसमें एक हथियार विरोध में बोलना भी है, मै जिस बोलने का विरोध कर रहा हूँ वह अनावश्यक बोला जाना है, ग़ैर ज़िम्मेदाराना बोला जाना है, वह बोला जाना जो सिर्फ़ चर्चा में रहने के लिये बोला जाता है, वह बोला जाना जो सिर्फ़ अपना आस्तित्व बचाये रखने के लिये बोला जाता है । यहाँ ऐसे भी बोलने वाले है जिन्हे ख़ुद नहीं मालूम की वे क्या बोल रहे है, क्यों बाल रहे है, किसके लिये बोल रहे है ? बोलने के लिये सिर्फ़ ज़ुबान ही नहीं दिमाग़ भी होना चाहिये । प्रदूषण विभाग को चाहिये कि वे अनावश्यक बोले जाने वाले शब्दों से पैदा होने वाले प्रदूषण से जनता को निजात दिलाये ।

बोलना एक अतिआवश्यक प्रतिक्रिया है, इसके बिना दुनिया का काम चल ही नहीं सकता । भोजन भी अति आवश्यक आवश्यकता है लेकिन खाने की भी एक सीमा होती है उससे अधिक खाने से भारी नुकसान है, जीने के लिये सोना भी आवश्यक है लेकिन बस सोये ही रहना तो सब कुछ समाप्त कर देगा, परिश्रम करना बहुत ज़रूरी है लेकिन सिर्फ़ काम ही काम करते जायेंगे और विश्राम नहीं करेंगे तो कैसे होगा ? यही फ़ार्मूला बोलने पर भी पूरी तरह लागू होता है । मेंरा बोलने वालो से निवेदन है कि वे अपने बोलने पर नियंत्रण रखे, बोलने से पहले स्वयं की पड़ताल करे, अपने ख़ुद की ख़बर ले, ख़ुद को मुज़रिम मानकर ख़ुद को ख़ुद की अदालत में पेष करे और ख़ुद जज बनकर ख़ुद को फ़ैसला सुनाये । मै सुनने वालों से अपील करता हूँ कि सार्थक बोलने वालो को ध्यान पूर्वक सुनकर उनका समर्थन करे और अनावश्यक बोलने वालों को न सुनकर उनके बोलने का बहिष्कार किया जाये ।


  अख़्तर अली
फज़ली अर्पाटमेंट, आमानाका
रायपुर, छत्तीसगढ़
मो- 9826126781
akhtarali@akhterspritwala.co.in
 
         
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