जब भी समाचार पत्रों को उठाकर देखता हूँ,
तब यही लगता है कि हमारा देश बहुत कमज़ोर हो गया है। ऐसा कमज़ोर कि वह न तो चल सकता है, न उठ-बैठ सकता है, न सो सकता है। पता नहीं एक अजीब प्रकार की कमज़ोरी से घिरा दिखाई दे रहा है। अख़बार में छपने वाले विज्ञापन तो यही बात बयां कर रहे हैं कि देश कमज़ोर है। वे यह भी बता रहे हैं कि एक ख़ास क़िसिम की कमज़ोरी से युवा वर्ग जूझ रहा है। उसमें कभी-कभी अधेड़ और बुजुर्ग भी शामिल हो जाते हैं। विज्ञापन देने वाले इतने चिंतित हैं कि वे बिना नागा किए पूरे देश को ताक़तवर बनाने का ज़िम्मा उठाए हुए हैं। पता नहीं नुस्ख़े बेचने वाले डॉक्टर अमरपाठा खाकर आए हैं, जो साठ साल बाद भी फ़ोटू में जवाब बने हुए हैं। हमारे प्रधानमंत्री को अमेरिका के राष्ट्रपति से बात कर इन्हें गिनीपिग बनाना चाहिए। इन विज्ञापनों को देखकर मैं सोचता हूँ कि यदि देश सचमुच इतना कमज़ोर है तो फिर आबादी दिन-दूनी-रात-चैगुनी तरक्की क्यों कर रही है। यदि वाक़ई ख़ुद को कमज़ोर समझने वाले युवा समाजसेवी विज्ञापनों में बताई हुई वस्तुओं का सेवन करने लगेंगे तो फिर देश की आबादी कहाँ जाकर टिकेगी।
एक तरफ़ तो हमारे नेता, मैनेजमेंट गुरु यह कहते नहीं थक रहे हैं कि दुनिया में आज सबसे ज़्यादा युवा भारत में हैं। इनकी शक्ति का समुचित उपयोग देश के विकास में करना चाहिए। सकारात्मक सोच से आज का युवा देश को कहीं से कहीं ले जा सकता है। विकासशील देश के बदनुमा दाग से निकालकर वह उसे विकसित देशों की श्रेणी में ले जाने में सक्षम है। आज के युवा को कोई कमज़ोर न समझे। पर दूसरी तरफ़ वे विज्ञापन है, जो युवाओं में कमजोरियों को ढूँढ रहे हैं। युवा को कमज़ोरी का अहसास कराके वे अपने नुस्ख़े की बिक्री कर ख़ुद को ताक़तवर बनाना चाहते हैं। यह कोई आज की नयी बात नहीं है। यह तो अपने देश की परंपरा रही है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि पहले जो नुस्ख़े राजा-महाराजाओं को नसीब हुआ करते थे, जो शौक़ वे फरमाया करते थे, लोकतंत्र के आते ही वे नुस्ख़े, जिसमें चांदी-सोना और न जाने किस-किस की भसम होती है, आमजन को सर्वसुलभ हो गए हैं। आज का युवा अपनी ताक़त को पता नहीं कहाँ-कहाँ परखता फिरता है। सिगरेट के कश में, शराब के नशे में, देर रात तक चलने वाले क्लब में, पान की दुकानों पर, गोरी के मकान पर, राजनीति के आँगन में, नेताओं के दामन में, दँगों की लपटों में। और भी न जाने कितने तरीक़ों से वह यह जताना चाहता है कि उसमें ताक़त बाक़ी है। कभी-कभी तो ये विज्ञापन अख़बारों के धार्मिक पन्ने पर भी दिखाई दे जाते हैं। उपर की ख़बर में साधु-संत बता रहे हैं संयम से रहो, ब्रह्मचर्य का पालन करो, भोग-विलास का त्याग करो और बाक़ी बचे पन्ने पर विज्ञापन है कि खाया-पिया लगता नहीं, नीम-हक़ीमों से बचो, जवानी का भरपूर आनंद लें, खोयी हुई ताक़त और जवानी फिर से हासिल करें। उपर के प्रवचन में संन्यासी कह रहे हैं कि अपने जीवन में करुणा का प्रसार करो, हृदय का विस्तार करो। नीचे विज्ञापन है कि अपने अँग को कैसे बढ़ाएँ। कौन-से यंत्र को अपनाएँ। साधु कह रहे हैं कि जीवन के शुद्ध होने पर आत्मा और परमात्मा की बातें हो सकती हैं। नीचे एक महिला के मुस्कुराते चेहरे के साथ कई सारे टेलीफ़ोन नंबर दिए हुए हैं, जो मीठी-मीठी बातें करने की दावत दे रही है। उसीके साथ एक और विज्ञापन चिपका मिल जाएगा फ़लाने फल के फ़्लेवर में। मानो कोई खाने की चीज़ हो। पता नहीं हमारी सरकार का ध्यान अभी तक युवाओं में कमज़ोरी के विज्ञापनों पर नहीं गया है। जिस दिन उसका ध्यान इन पर चला गया उसी दिन से युवाओं के लिए ज़रूर कोई-न-कोई नयी योजना की घोषणा प्रधानमंत्री लालकिले की प्राचीर से करेंगे।
जब से सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से प्रश्न किया है कि वैश्यावृत्ति को ज़ायज़ कर दिया जाए, तब से इस योजना की उम्मीद बंध गई है। सरकार कभी भी कोर्ट के सुझाव के विपरीत काम नहीं करती। अभी तक रेल्वे स्टेशन, बस स्टैंड और समाचार पत्रों में ही युवाओं की कमज़ोरी दूर की जा रही थी। आने वाले समय में सरकारी और निजी स्कूल-कॉलेज की दीवारों पर, अस्पतालों, गलियों, चैराहों पर युवाओं की कमज़ोरी दूर करने के विज्ञापन शोभा बढ़ाएँगे। संस्कृति रक्षक हमेशा की तरह सभ्यता की दुहाई देंगे। शराब के नशे में चूर होकर वे विज्ञापनों पर कालिख पोतेंगे, तब तक, जब तक कि उन्हें योजना में हिस्सा नहीं मिलने लगेगा। मुझे सब कुछ सोचकर युवाओं का भविष्य स्वर्णिम नज़र आ रहा है। जो समाचार पत्र युवाओं की कमज़ोरी के विज्ञापनों से परहेज़ करते थे, उन्हें भी लगने लगा है कि यदि वे इस ओर ध्यान नहीं देंगे तो विज्ञापन के बिना ख़ुद ज़रूर कमज़ोर हो जाएँगे।

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