देश का
सबसे बड़ा नक्सली हमला पूर्ण तरह से शांत हो चुका है, जहाँ हमला हुआ था वो चिंतलनार भी शांत हो गया है। पर कहीं न कहीं चिंतलनार के उन सूनी रास्तों में पड़े हुए ख़ून के छींटे और हमारे वीर जवानों के अवशेष चीख-चीख कर इस बर्बर कृत्य को बयान कर रही है। 6 तारीख को घटे इस घटना में देश के 80 ऐसे जवान शहीद हो गए जिनके वजह से हम जैसे आम आदमी रात को अपने घरों में आराम से सो पाते है। युद्ध के भी कुछ नियम क़ायदे होते है, पर इन नक्सलियों ने जैसे इस घटना को अंजाम दिया है उससे तो नहीं लगता है कि इन नकसलियों के पास कोई इंसानियत जैसी चीज़ बची हुई होगी। सूत्र बताते है कि लगभग एह हज़ार नकसलियों ने घेरा बनाकर मात्र 120 जवानों पर हमला किया और उनके अंतिम साँस चलने तक उन पर गोलियाँ बरसाई। इस घटना में नकसलियों ने प्रेशर बमों का भी ख़ूब इस्तेमाल किया ताकि जवानों को भागने का मौक़ा भी न मिल पाये और जब जवानों की मृत्यु हो चुकी थी तो नक्सलियों ने उन्हें लूटने में भी कोई क़सर नहीं छोड़ा, मृत सैनिकों के शरीरों से जूते-मोजे तक उतार लिए।
इन 76 जवानों से जूड़े न जाने कितने ही परिवारों के दिए इन कायर नक्सलियों ने रात के अँधेरे में बूझा दिया। कितने ही बच्चे अनाथ हो गए और कितने ही औरतें विधवा। देश का हर वर्ग इस घटना से रोष में है पर अगर कोई शांत है तो वो है मानव अधिकारों पर बोलने वाले अमिर मानवाधिकारविद्, न जाने ऐसी कौन सी नींद में सोए हुए है ये तमाम लोग। अगर नक्सल प्रभावित क्षेत्र में कोई जवान किसी नक्सली को एक थप्पड़ भी मारता है तो दिल्ली में बैठे मानवअधिकार के इन तथाकथित नुमाइंदों को उस थप्पड़ की गूँज सुनाई देने लगती है और फ़ौरन ही हज़ारों रूपए विमान यात्रा और शाही होटल किराये में फुँककर वे बस्तर पहुँच जाते है। प्रश्न यह है कि आज इन बुद्धिजीवियों को क्या हुआ है क्यों इनके कर्कश ज़ूबां नहीं खूल रहे है, क्या सारे नियम-क़ायदे देश की सुरक्षा में लगे इन जवानों पर ही लागू होते हैं?
मानवअधिकार का मतलब यह होता है कि हर मानवजाति जो इस विश्व में है उनसे सबंधित एक न्यूनतम मापदंड जिसका पालन सेनाओं को भी करना पड़ता है। पर क्या ऐसा युद्ध संभव है जहाँ एक तरफ से लडऩे वाले सारे नियमों में बंधकर लड़ाई लड़े और दूसरी ओर नक्सली सारे नियम-क़ायदों को ताक में रखकर इन पर हमला करें।
आज हमारे देश के एक बहुत बड़े हिस्से को लाल गलियारा कहा जाने लगा है। कमोवेश हर राज्य में जहाँ नक्सलियों का आतंक है उन जगहों पर मानवअधिकारवादियों की भी एक समानांतर सेना कागज़ों में अपने ही सरकार को घेरने के लिए तैयार खड़ी रहती है। मानवअधिकारवादियों की उस सेना में बड़ी संखया में बुद्धिजीवियों का एक जमावड़ा देखने को मिलता है। पर मुझे इन बुद्धिजीवियों के बुद्धि पर तरस आता है, कयोंकि ये तमाम लोग नकसलियों को दोस्त और जवानों को दुश्मन बताने में लगे रहते है। कुछ दिनों पूर्व सुश्री मेघा पाटकर अपने लाव-लश्कर के साथ बस्तर पहुँच गई और दो दिनों तक वहाँ डेरा डाले रखा और ख़ूब मेहनत कर ऐसा कुछ मुद्दों को खोज निकाली जिससे नक्सल विरोधी सरकार के अभियान को धक्का लगाया जा सके और रायपुर आकर एक प्रेस कांन्फ्रेस भी ली । उनके साथ अँगरेज़ी में बात करने वालों की एक बड़ी टीम भी थी जो शायद बुद्धिजीवी थे । पर आज ये मानवअधिकारवादी कहाँ हैं, अबतक दो दिन गुजर चुके हैं, इस बर्बर घटना को घटित हुए पर किसी भी मानवअधिकारवादी का कोई बयान तक नहीं आया है। अगर अभी मेघा जी बस्तर आये तो उन्हें ज़्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ेगी तथ्यों को खोजने के लिए । क्योंकि हमारे जवानों के जख़्म अभी भी हरे ही है।
पर इस बात को तो माननी ही पड़ेगी कि नक्सलियों ने एक ऐसा वर्ग को जोड़ लिया है जो उन्हें बाहर से हर संभव मदद पहुँचाने के तत्पर रहती है। ऐसे अखंबारों की भी कमी नहीं है जो मानवअधिकार की आड़ लेकर घर-घर तक नक्सली विचारधाराओं को पहुँचाने में लगी रहती है। नक्सलियों ने पढ़े-लिख बुद्धिजीवी की एक अलग सेना बना ली है, ऐसा कहा जाये तो भी ग़लत नहीं होगा।
नकसलबाड़ी आंदोलन की जब शुरूआत हुई थी उस समय सचमुच यह एक आंदोलन ही थी जिससे जनभावनाओं का समागम था । पर आज नक्सलवाद एक व्यापार का रूप ले चुकी है। सूत्रों की माने तो छत्तीसगढ़, झारखंण्ड, प.बंगाल और उड़ीसा से नक्सली संगठन हर साल लगभग 1000 करोड़ रूपये कमाते है। कमाई का मुख्य स्त्रोत गाँजे और अफीम की खेती, वनोपज की हेरा-फ़ेरी, इमारती लकडिय़ों की तस्करी, अवैध खनिज उत्खनन और ठेकेदारों और ओैद्योगिक घरानों से अवैध वसूली शामिल है। इस कमाई का बड़ा हिस्सा ये मानवअधिकारवादियों को पालने में भी ख़रचते है ताकी वक़्त-वक़्त ये मानवअधिकारवादी उन्हें कागज़ी कार्रवाई के द्वारा मदद कर पाये हैं। तभी तो आज तक बस्तर के जितने मानवअधिकारीवादी आते हैं, सब विमानों के द्वारा और ऐसी कारों का लुफ़्त लेते हुए अपने कार्यों को अंज़ाम दे जाते हैं।
सरकारों और राजनैतिक पार्टियों को इस मुद्दों को समझना होगा । अब इन नक्सलियों ने समझा दिया है कि ढूलमूल रवैये से इस समस्या का निवारण नहीं हो सकता है। कठोर नियम बनाने होंगे, नक्सलियों के साथ-साथ उनके इन अप्रत्यक्ष साथियों को भी क़ानून के दायरें में लाना होगा। आज पूरा देश डॉ.रमन सिंह और गृहमंत्री पी.चिदंबरम के साथ इस मुद्दे पर खड़ा है। इन शहीदों को न्याय मिलना चाहिए, उनका बलिदान ख़ाली नहीं जाना चाहिए । अब देखना होगा कि यह तमान मानवअधिकारवादी कब तक ख़ामोश बैठते है। आज आम जनता को भी चाहिए कि इन बुद्धिजीवियों को सिरे से नकार दें ताकि समाज से उनका दुष्प्रभाव खत्म हो जाए।

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