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स्याह सफ़ेद

सोच पर शौच, और श्रद्धांजलि

प्रकाशन :गुरूवार, 2 फरवरी 2012

गांधी की हत्या को आज एक और बरस पूरा हुआ। देश की आजादी के आधे बरस के भीतर ही जिस तरह से गांधी को मारा गया था, उस हत्या के दिन को गांधी की पुण्यतिथि का नाम देकर उस हत्यारी सोच को हल्का करने का काम भारत का समाज करता है। गांधी को मारने के जिम्मेदार कुछ लोगों को सजा हो गई, कुछ लोग उसमें से बच भी गए होंगे जैसा कि भारत के किसी भी दूसरे अदालती मामले में होता है, लेकिन गोलियों से छलनी उस शरीर को जन्मतिथि और पुण्यतिथि के चबूतरों पर चढ़ाकर रख देना दरअसल उस सोच पर शौच कर देने सरीखा है।

भारत ऐसा काम इसलिए करता है क्योंकि चबूतरों पर सालाना माला आसान होती है, सोच पर अमल नामुमकिन सा काम होता है। एक हत्या को हत्या शब्द के साथ जोड़कर जब तक नहीं देखा जाएगा तब तक आज भी जिंदा गांधी की सोच एक जिंदा सोच न रहकर इतिहास के एक दस्तावेज सरीखी रह जाएगी। इसलिए पुण्यतिथि जैसे शब्द फिजूल हैं और गांधी को उनकी हाथ की बनी खादी, उनकी हाथ की बनी चप्पल और उनके फटे पैरों की तरह खुरदुरे तरीके से ही याद करना चाहिए।

भारत, यहां का लोकतंत्र और यहां की संस्थाएं, इस कदर बेईमानी से भरे हुए हैं कि गांधी की सोच के ठीक खिलाफ काम करते हुए भी वे गांधी के नाम का नगदीकरण रात-दिन करते हैं। हत्यारे और उनके पीछे के संगठन, उनके पीछे की विचारधारा तो ठीक है, वह तो खुलकर हत्यारी है ही, उसने बस बेईमानी इतनी की है कि गांधी का नाम अपनी वल्दियत में लिखना शुरू कर दिया है, लेकिन अधिक बेईमानी तो गांधी के उन वारिसों की है जो कि गांधी का नाम लेकर पलते आए हैं, देश को आज लूट रहे हैं, और आजादी की लड़ाई, गांधी को अपनी खानदानी विरासत बताते हैं।

आज अगर कोई अखबारनवीस गांधी से बातचीत कर पाता तो शायद वे यही कहते कि वे ऐसे राष्ट्र के पिता बनने को तैयार नहीं हैं जहां पर आधी से अधिक आबादी को पेट भर खाना नसीब नहीं है, जो गरीबी की रेखा के नीचे है, जहां सत्ता पर अवैध कब्जा करने वाले लोग हर किस्म के जुर्म में भागीदार हैं, और बात-बात में ये तमाम अपराधी गांधी की कसमें भी खाते हैं। ऐसे राष्ट्र का पिता बनना कौन चाहेगा?

गांधी ने अपनी आलऔलाद के लिए अपनी कोई विरासत नहीं छोड़ी। उन्होंने जो छोड़ा, अपने देश के लिए छोड़ा, और जिसे वे सबसे गरीब पाते थे, उस सबसे कमजोर दरिद्रनारायण के लिए छोड़ा। लेकिन आज उन बड़े नोटों पर गांधी की तस्वीर छापकर सत्ता पर काबिज लोग दो नंबरी कारोबार में उनका इस्तेमाल करते हैं, संसद में कोठों की तरह बिकने वाले और खरीदने वाले सांसद, संसद के अहाते में गांधी को बिठाकर अपनी इज्जत बढ़वाते हैं। क्यों गांधी चाहेंगे ऐसे राष्ट्र का पिता बनना? नेहरू जैसे जो लोग उनकी औलाद बनने के हकदार थे, वैसे नेहरूओं की अपनी औलादें आज नेहरू की औलादें बनने के लायक नहीं हैं, हकदार नहीं हैं, ऐसे में गांधी क्यों अपना नाम इन लोगों को देना चाहेंगे?

और इससे परे भी सच तो यह है कि इस देश के नाम से अलग-अलग तबकों के जिन भी नामी-गिरामी लोगों का नाम जुड़ा हुआ है, वे तमाम लोग उस पूरी सोच पर रोज सुबह सोच-समझकर शौच करते हैं जो कि गांधी ने इस देश के लिए खुद अमल करके सामने रखी थी। देश के तमाम ताकतवर तबके, तबकों के रूप में कमजोर तबकों के हक लूटने में लगे हैं, और कोई गांधी की तस्वीरें टांगकर रखते हैं तो कोई उनकी प्रतिमाओं को लगवाकर अपने नाम की वाहवाही करवाते हैं। जब भारतीय लोकतंत्र के ताकतवर लोग गांधी का नाम जपते हुए उनकी तारीफ करते हैं, तब इटली के सिसिली इलाके के वे माफिया डॉन याद पड़ते हैं जो कि जुर्म की बादशाहत के साथ-साथ ईसा मसीह का नाम लेते हुए चर्च भी जाते हैं। या जिस तरह मुंबई का मस्तान नाम का डॉन हज भी जाता है।

जिस तरह एक नामौजूद ईश्वर का कोई भला ऐसे भक्तों से नहीं होता, उसी तरह गांधी का कोई भला आज के उनके नामलेवा लोगों से नहीं हो रहा। जिस तरह ऊनी कपड़ों को बिना पानी के धुलाई करने वाली लॉन्ड्री में साल में एक-दो बार धुलवा लिया जाता है, उसी तरह साल में दो बार गांधी, दो बार लोकतंत्र और संविधान, दो-चार बार देश के लिए शहादत और बलिदान की बात कर ली जाती है और हर कोई टमाटर सॉस माथे पर लगाकर शहीदों में नाम लिखा आता है।

यह सिलसिला पूरी तरह फर्जी, फरेबी और गांधी-विरोधी है। गांधी की सोच, सोच पर अमल करके दुनिया के सामने एक मिसाल रखने की थी। दुनिया के सामने ठीक उल्टी मिसाल रखने वाले, गांधी के तन और उनके मन को मारने वाले अलग-अलग गिरोह अगर उनकी तस्वीरों को लेकर, माला चढ़ाकर अपनी वाहवाही पाते हैं, तो गांधी की हत्या वाला यह सालाना दिन किसी धर्म की जुबान की तरह पुण्यतिथि कहकर खत्म कर दिया जाता है।

यह सिलसिला बंद होना चाहिए। भारत के भीतर एक आवाज ऐसी खड़ी होनी चाहिए कि जो लोग सोच-समझकर, साजिश के तहत, अपनी किन्हीं जरूरतों से परे जाकर, सबसे कमजोर के हक लूटते हुए जब गांधी की सोच का कत्ल करते हैं, तो कम से कम उस सोच के लहू को अपने माथे पर लगाते हुए उन्हें शहीद बनने का हक न मिले। देश के भीतर एक ऐसे आंदोलन की जरूरत है जो लोगों को गांधी के बुतों वाले चबूतरों से दूर रखे, और किसी कानून के तहत ऐसा नहीं हो सकता इसलिए एक प्रतीकात्मक विरोध की तरह इन चबूतरों पर पहुंचने वाले लोगों के सामने कम से कम कोई बैनर-पोस्टर लेकर खड़े तो हों।

यह कैसे त्रासदी है, और कैसा विरोधाभास-भरा दिन है कि जब गांधी के सम्मान के नाम पर सुबह से शाम तक उनका अपमान किया जाएगा!

  सुनील कुमार
संपादक, दैनिक छत्तीसगढ़
रायपुर, छत्तीसगढ़
मो. 9893625000
editor.chhattisgarh@gmail.com
 
         
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