सृजन-गाथा

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अंक-4, सितम्बर, 2006   

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व्यंग्य

गैस का सिलेण्डर/ कृष्ण कुमार त्रिवेदी

 बेताल कथा-2: खास प्रजाति का अफसर/ गिरीश पंकज

 

 

खास प्रजाति का अफसर


गिरीश पंकज

 

     

     विक्रमार्क ने बेताल को फिर कंधे पर लादा और अपने महल की ओर चल पड़ा । बेताल ठहाके लगा रहा था, लेकिन विक्रमार्क ने जैसे कुछ सुना ही नहीं । आखिरकार बेताल ने बोलना शुरू किया - राजन्, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ । तुम्हारी जगह कोई और होता, तो वह मैदान छोड़ कर भाग खड़ा होता लेकिन तुम हो, कि हार ही नहीं मानते । चलो, तुमको फिर एक कहानी सुना रहा हूँ । सुन रहे हो न ?”

     

      विक्रमार्क ने जवाब नहीं दिया । बेताल ने मुस्कराते हुए कहानी शुरू की- किसी राज्य में एक युवक रहा करता था। दूसरे साधारण युवकों की तरह उसे अपने भविष्य की कोई चिंता नहीं थी। हर कोई कहीं फिट हो रहा था। किसी के पास पैसा था, तो किसी के पास एप्रोच । इसके बलबूते युवक नौकरी पा रहे थे। युवक ज्ञानप्रकाश के पिता सेठ दयाराम व्यापारी थे। इसलिए वह निश्चिंत था, कि उसके पिता उसे काम से लगा ही देंगे । यही सोच कर वह मस्ती में रहा करता था। वह बड़ा ही हँसमुख और शरारती था। मिलनसार भी था। हर किसी से हँस कर मिलता-जुलता था। सेठ जी शुरू-शुरू में तो यही चाहते थे, कि उनका बेटा भी घंधा-पानी संभाले,लेकिन बाद में उन्होंने अपना इरादा बदल दिया । उन्होंने तय कर लिया कि बेटे को इस पारम्परिक धंधे से दूर ही रखूँगा । सेठ जी के तीन बेटे थे। उन्होंने एक को तो राजनीति में घुसेड़ दिया । दूसरे को अपने साथ बिठा लिया और तीसरे को अफसर बनाने की ठान ली । समाज में उस वक्त तीन वर्ग ही ऐसा था, जिसके पास नाम, दाम और रुतबा था। व्यापारी, नेता और अफसर । तीनों वर्ग मलाई काट रहे थे । अफसर सदाबहार होता है । नेता आज पावर में है, कल नहीं । बेटा अफसर रहेगा तो साठ साल तक हर तरह के सुख-वैभव को उपयोग करते हुए सात पुश्तों की व्यवस्था कर लेगा ।

     

       सेठ जी ने तय कर लिया कि लड़के को अफसर बनाना है लेकिन कौन-सा अफसर  ? सौ तरह के अफसर हैं । फूड आँफीसर बनाएँ कि सेल्स टैक्स ? लेकिन ये तो छोटे-मोटे पद ही हैं । कमाई तो अच्छी है लेकिन इनका उतना सम्मान नहीं है । बहुत से अफसर कलेक्टर के अधीन रहते हैं । तो क्यों न बेटे को कलेक्टर ही बनाया जाए । बस, सेठजी ने ठान लिया कि बेटे को कलेक्टर बना कर रहेंगे ।

     

       एक दिन सेठ जी ने बेटे ज्ञानप्रकाश को पास बुलाया और उसे अपने मन की बात बता दी, बेटे तुमको कलेक्टर बनना है। अब तू किताबों का कीड़ा बन जा । सबको घोट कर पी जा । कोचिंग ले। जहाँ जाना है, वहाँ जा । पैसे पानी की तरह बहा दूँगा, लेकिन ध्यान रहे, मैं सेठ की औलाद हूँ । घाटा बर्दाश्त नहीं करूँगा । जितना तुझ पर खर्च करूँगा, उसे ब्याज सहित वापस भी लौटाना होगा।

      ज्ञान प्रकाशबोला -फिक्र मत करो बापू । मैं भी तेरी औलाद हूँ । आप एक बार कलेक्टर तो बनवा दें, फिर देखें, जीवन भर खानदान को मालामाल करता रहूँगा ।

      बेटे की बात सुनकर सेठ जी की आँखों में भ्रष्टाचार के आँसू छलक पड़े।

     

      अचानक विक्रमार्क ने बेताल की और निहारा । बेताल मुस्करा रहा था। बेताल बोला, मैं समझ गया राजन्, कि तुमने मेरी ओर क्यों निहारा । हे राजनं, भ्रष्टाचार के आँसू मेरे द्वारा गढ़ा गया बिल्कुल नया मुहावरा है । इस पर केवल मेरा कॉपीराइट रहेगा । जैसे खुशी के आँसू, दुख के आंसू, वैसे ही भ्रष्टाचार के आँसू ।

     

       विक्रमार्क के चेहरे पर हल्की-सी हँसी नज़र आई । वह मन ही मन सोच रहा था, कि ये ससुरा बेताल समय के साथ चल रहा है इसलिए इसकी भाषा भी बदल रही है। बीच-बीच में विदेशी शब्दों का उपयोग भी खूब करने लगा है। विक्रमार्क कुछ बोलना चाहता था लेकिन मौन रहना उसका मजबूरी थी। मौन भंग होने पर बेताल फिर जाकर डाल पर लटक जाता । बेताल भी चाहता था कि विक्रमार्क को बोलने पर मजबूर कर दे, लेकिन कहानी में कोई टर्निंग प्वाइंट भी तो आए । बेताल ने कहानी आगे बढ़ाई,तो,  हे राजन्, सेठ का लड़का यानी ज्ञानप्रकाश के दिमाग में यह बात बैठ गई कि उसे कलेक्टर बनना है । लेकिन सेठ जी बेटे की मिलनसारिता देख कर अक्सर चिंतित रहा करते थे, कि कलेक्टर बनने के बाद भी ज्ञानप्रकाश इसी तरह हँसमुख और मिलनसार बना रहा तो कर चुका कलेक्टर । सेठ जी ने एक दिन बेटे को पास बुला कर समझाया, देखो बेटे, तुझे कलेक्टर बनना है, नेता नहीं मिलने-जुलने के हथकंडे नेताओं को ही शोभा देते हैं, क्योंकि उन्हें चुनाव लड़ने पड़ते हैं। सवाल वोट का रहता है । तुझे काहे की चिंता । तू अभी से रिजर्व रहना सीख ले । दिन-रात पढ़ाई कर । परीक्षा की तैयारी कर । तभी कलेक्टर बन पाएगा।

     

               “लेकिन बेटे ने बाप की इस सलाह पर ध्यान नहीं दिया और और बिंदास बंदे की तरह मटरगश्ती करता रहा । समय बीतता गया। एक दिन सब लोगों ने देखा, कि सेठ का लड़का गंभीर रहने लगा है। उसके चेहरे से मुस्कान गायब हो गई है। सबसे मिलने-जुलने वाला युवक लोगों से कतराने लगा । गुमसुम-सा रहने लगा। उसे जानने वाले लोग सोच में पड़ गए, कि अचानक् इसे क्या हो गया है। हे राजन्, अब तुम्हीं बताओ, कि क्या ज्ञानप्रकाश कलेक्टर बन सका ? क्या वह कलेक्टर न बन पाने के कारण ही गंभीर रहने लगा था। उसकी मुस्कान छिनने का असली कारण क्या था ? तुम मेरे इन सवालों का बिल्कुल ठीक-ठीक ज़वाब देना । ऐसा उत्तर मत देना, जैसा लोग अदालत में देते हैं । गोल-मोल । सच-सच बताना, वरना तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे ।

      

       विक्रमार्क से अब रहा न गया । वह बोल पड़ा, सेठ ने अपने लड़के को कलेक्टर बनाने के लिए पैसा पानी की तरह बहाया । उसे अच्छी कोचिंग दिलाई । लड़के ने कलेक्टरी की परीक्षा भी पास कर ली। इंटरव्यू के दौरान एक लालची किस्म के व्यक्ति को सेट भी कर लिया । और सेठ का काम बन गया । लड़का कलेक्टर हो गया । कलेक्टर बनने के बाद ज्ञानप्रकाश अपने शहर आया । यार-दोस्तों से मिला । खूब मस्ती की । लेकिन जब वह आईएएस बनने वाली ट्रेनिंग पूरी करके एक जिले में प्रशिक्षु के रूप में पदस्थ हुआ, तभी से उसकी हँसी भी गायब हो गई । मिलने-जुलनेवाला ज्ञानप्रकाश सबसे कटने लगा। रिजर्व रहने लगा । घर से दफ्तर और दफ्तर से सीधे घर। घर में खाली रहते हुए भी वह लोगों से मिलना नहीं चाहता था। इसके पीछे कोई मानसिक बीमारी कारण नहीं थी। वरन वह ट्रेनिंग थी, जो उसे आइएएस होने के बाद दी गई थी। वहाँ ज्ञानप्रकाश को बताया गया था कि, तुम अब एक खास किस्म की प्रजाति के प्राणी हो गए हो । मनुष्य हो कर भी मनुष्यों से ऊपर हो । अब तुमको केवल मंत्री या मुख्यमंत्री के सामने ही दुम हिलानी है। बाक़ी जगह तो तुम राजा हो । आम लोगों से न तो मिलो, और न उन्हें देख कर मुस्काओ । बस, ज्ञानप्रकाश का दिमाग फिर गया और उसके जीवन की सहजता सरलता गायब हो गई।

 

       विक्रमार्क ने बिलकुल सही ज़वाब दिया था। लेकिन तब तक उसका मौन भंग हो चुका था,  इसलिए वेताल फिर डाल पर जाकर लटक गया ।

 

 

 

  निराधारों के लिए रामनाम सबसे बड़ा आधार है - महात्मा गांधी

अभिमत

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, आदेश ठाकुर चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

तकनीकः प्रशांत रथ