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भाषाःएक शब्द.... लगाना- डॉ. गंगा प्रसाद बरसैंयामीडिया-विमर्श.....समसामयिक पत्रकारिता का परिदृश्य- संजय द्विवेदी विचार.....मृत्यु पर विजय- पुष्करलाल केडिया लोक-आलोक....जिन्ने ट्रिनबैगो (ट्रिनिडाड-टुबैगो) नहिं देख्या- सुवास कुमार तकनीक.....इंटरनेट पर उपलब्ध हैं रोजगार- रविशंकर श्रीवास्तव मूल्यांकन.....अनुवाद यानी तलवार की धार- वीरेन्द्रकुमार वरनवाल प्रसंगवश.....शरद जी की लेखन विधा का मूल सौंदर्य- राम पटवा अंतरजाल.....हिंदी मीडिया की दिशा बदल सकता है यूनिकोड- बालेन्दु शर्मा दाधीच |
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महामृत्युंजय मंत्र की जाप बहुधा लोग मृत्यु से बचने या उसे टालने के लिये करवाते हैं अथवा स्वयं करते हैं । मृत्यु एक शाश्वत सत्य है । जिसने जन्म लिया है, वह मरेगा ही । पंच तत्वों का नश्वर शरीर जब अपना कार्य करना बन्द कर देता है, “मर गया” शब्द का वहाँ प्रयोग होता है ।
मर गया - अमर हो गया, दोनों में ‘मर’ शब्द आता है पर ‘अ’ अक्षर जुड़ जाने से ‘मर’ की जगह अमर हो जाता है । महामृत्युजंय का सम्बन्ध भी अमरता से होना चाहिए ।
मृत्यु जीवन में किये गये कार्यों के हिसाब बताने का दिन है । अतः मुत्यु के पूर्व औरों के लिए क्या किया गया है, यही वास्तविक जीवनी है । जिसके जीने से बहुत लोगों को जीवन प्राप्त हो, उसी का जीवन सफल है।
एक सौ पैसों की इकाई एक रुपया और एक सौ रुपयों की इकाई सौ रुपया । हजार, लाख, करोड़, अरब, खरब रुपयों की इकाई संपत्ति । इसी प्रकार सेकेन्ड, मिनट, घंटा दिन, सप्ताह, माह, वर्ष की इकाई है ज़िन्दगी । संपत्ति की कीमत ज़िन्दगी से अधिक नहीं । किन्तु आश्चर्य है - दुःख हमें रुपया बरबाद होने पर होता है । समय बरबाद होने पर नहीं ।
ज़िन्दगी का एक छोटा सा हिसाब समझें । यदि एक व्यक्ति 100 वर्ष जीता है तो उसे कुल 36500 दिन मिले । 8 घंटे सोने के हिसाब से उसका 12000 दिन से में चला जाता है । 8 घंटे अध्ययन अथवा रोजगार करे तो 12000 दिन इनमें चले गये । करीब 4 घंटे नित्य कर्म तथा आने-जाने में निकल जाय तो 6000 दिन- टी.वी. सिनेमा, विवाह, जन्म-दिन, घूमना-फुरना, गप्पबाजी आदि में व्यतीत हो जाये तो सत्कार्यों के लिये अमूल्य समय कहाँ बचा ?समय का सदुपयोग ही जीवन का सही मूल्यांकन है ।
नौकरी करने वाला 500 वर्ष नौकरी करता रहे तो उसका उद्देश्य सिर्फ अपना एवं परिवार का निर्वाह करना ही रह जाता है । व्यापार उद्योग करने वाला यदि 500 वर्ष तक सिर्फ अपने धन्धे में ही लगा रहे तो परिवार निर्वाह, परिवार वालों का शादी-विवाह, जन्म-दिन, सम्पत्ति का भोग यथा आलीशान मकान, बंगले मोटर गाड़ियाँ, नौकर-चाकर के अलावा जीवन में और कुछ करना याद ही नहीं आता । वह चाहे जितने मृत्युंजय जप करवाले, आखिर मरना ही है । अमर हो नहीं सकता
समय के मूल्यांकन के लिए किसी ने ठीक ही कहा- जीवन में एक माह का महत्व समझना हो तो उस माँ से पूछो जिसके एक महीने पहले बच्च पैदा हो गया । एक सप्ताह का महत्व समझना हो तो उससे पूछो जो साप्ताहिक समाचार पत्र निकालता है एवं एक सप्ताह अख़बार न निकाल सका। एक दिन का महत्व समझना हो तो उससे पूछो जो रोज मेहनत कर अपना पेट पालता हो, व उस दिन उसे कार्य नहीं मिला । एक मिनट का महत्व समझना हो तो उससे पूछो जिसकी रेलगाड़ी छूट गई। एक सेकेण्ड का महत्व समझना हो तो उससे पूछो जो दुर्घटना से बाल-बाल बच गया । एक सेकेण्ड का दसवें भाग का महत्व समझना हो तो उससे पूछो जो ओलम्पिक खेलों में गोल्ड मेडल न पा सका । बहुधा लोग अच्छा कर्म करने के लिए मुहुर्त दिखाते है एवं शुभकार्य का श्री गणेश नहीं कर पाते । बुरे कार्यों का मुहुर्त नहीं दिखाते एवं दुष्कर्म कर बैठते हैं । एक कहावत है- काल करे सो आज कर, आज करे सो अब । पल में प्रलय होयेगी, बहुरी करेगा कब ।।
इसी संदर्भ में महाभारत की एक घटना है। किसी व्यक्ति ने युधिष्ठिर से गुहार लगाई । युधिष्ठिर ने उसे कल आने के लिए कहा । भीम यह सुनकर बड़ी जोर से हंस पड़ा । युधिष्ठिर ने हंसने का कारण पूछा, तो भीम ने सटीक उत्तर दिया –‘ऐसा लगता है कि धर्मराज ने काल को जीत लिया है ।” भीम की बात का तात्पर्य समझकर धर्मराज ने भीम से क्षमा मांगी और कहा- “भाई मेरे से गलती हुई, जो आज हो सकता था उसे कल पर टालना मेरा अपराध था।
मनुष्य की अकेले की शक्ति सीमित है पर और औरों का सहयोग लिया जाय तो यही शक्ति असीमित हो जाती है । माँ दुर्गा के हजार हाथों का यही संदेश है। हम विवाह–शादी व अन्य समारोह मे सैकड़ों हजारों लोगों को आमंत्रित करते हैं। समारोह में आमंत्रित व्यक्तियों में क्या ऊर्जा छिपी है- उनका सहयोग शिक्षा, चिकित्सा, व्लड बैंक, एम्बूलेन्स, पुलिस, सरकारी कार्य आदि में किस रूप में सहयोग प्राप्त किया जा सकता है यह जानना जरूरी है । शक्तिदायिनी माँ दुर्गा के हजार हाथ में अलग-अलग तरह के हथियार हैं । इसका तात्पर्य शक्ति संगठन कर औरों की मदद के लिए सेवा कार्यों में इनका सहयोग लेना ही है । अपने परिचितों की शक्ति का सदुपयोग करके ही महान कार्य किये जा सकते हैं ।
दुर्गा माँ की पूजा में समृद्धिदात्री लक्ष्मी, ज्ञान की देवी सरस्वती, विवेक के देवता गणेश एवं शक्ति संगठन के प्रतीक कार्तिकेय का साथ रहने का यही संदेश है।
जीवन में अच्छे कार्य करके ही मृत्यु को जीता जा सकता है । भरत, ध्रुव, वाल्मीकि, तुलसी ,रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष आदि अनेकानेक महान पुरुषों को मृत्यु कहाँ मार सकी है। आज भी उनका मार्गदर्शन वैसे ही मिल रहा है जैसे वे जीवित हों । जिन्होंने औरों के लिए कार्य किया है या करेंगे वे अमर ही रहेंगे । महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी, गुरुगोविन्द सिंह, ईसा मसीह, हजरत मुहम्मद आदि अपने सत्य कार्यों से देवता के रूप में पूज्य हो गये ।
यश की दिव्यता या काल को जीतने वाले के तेज के सामने सब कुछ तुच्छ है। मातृभूमि की रक्षा में वीरों ने अपने प्राणों को अर्पित कर दिया था । रणक्षेत्र में उनके शव पड़े थे। माँ के अन्न-जल का ऋण व्याज समेत उन्होंने चुकाया था । माँ-भूमि की आँखों से गंगा-यमुना बह रही थी । वीरगति-प्राप्त उन नरपुंगवों को देख सूरज ने अपना रथ रोक लिया, बोला – धऱित्रि ! तेरे इन पराक्रमी बेटों को मैं अपना प्रकाश चढ़ाने आया हूँ । तेजस्वियों का तेज से ही श्रृंगार होना चाहिए ।
धरती ने उत्तर दिया - “सूर्यदेव, आपका तेज तो शाम को समाप्त हो जाएगा, वह तो क्षणिक है, किन्तु मेरे सपूतों के शौर्य का तेज तो अमर हो चुका है इस काल को जीतने वाले तेज के सामने आपके तेज की क्या बराबरी? ”
वायु ने आग्रह किया- “पृथ्वी, पारिजात-वन का दिव्य सौरभ लाया हूँ । अपने इन पुत्रों का गंधाभिषेक मुझे करने देवें ।”
पृथ्वी ने कहा - “वायुदेव, यश के सौरभ से बड़ी और कौन-सी सौरभ-सुगंध है ? यश की दिव्यता के सामने पारिजात के दिव्य सौरभ की क्या विसात !”
मातृभूमि एवं समाज का कर्ज उतारने के लिए जिस किसी भी क्षेत्र में जिन्होंने अपना जीवन समर्पित किया है, वे सदैव अमर रहेंगे एवं उन्हें सदैव याद किया जायेगा । महामृत्युजंय का मंत्र जीवन में कुछ करने की प्रेरणा दे तो निश्चय ही मृत्यु पर विजय पायी जा सकती है। क्या मार सकेगी मौत उसे, औरों के लिए जो जीता है। मिलता है जहाँ का प्यार उसे, औरों के जो आंसू पीता है।।
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विद्या की परिपूर्णता का कोई बिन्दु नहीं होता- टॉमस जे. वाट्सन |
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