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निर्मल
जी अपने बड़े लेखक होने से सामने वाले को आतंकित नहीं करते थे । उनमें
एक खामोश-सी सरलता थी । आई.आई. सी में लाइब्रेरी या लाँज के पास अक्सर
मिल जाते थे, सोचते हुए से अकेले बैठे हुए । अपने से संवाद करते हुए ।
एक समझदार पाठक की तरह ऐसे में उन्हें डिस्टर्ब करना ठीक नहीं, सोचकर
नहीं भी मिलती थी। हमेशा वेल्ड्रेस्ड निर्मल जी आमना-सामना होने पर
बढ़कर अभिवादन स्वीकारते थे।
निर्मलजी चिन्तक, विचारक और कथाशिल्पी थे। उन्होंने गद्य की बहुत-सी विधाओं में लिखा कहानी, उपन्यास, यात्रा-वृत्तान्त, डायरी, संस्मरण, निबन्ध इत्यादि सभी में उनका लेखक लीक से हटकर था। उनका कथा साहित्य और उनके पात्र आपसी रिश्तों की कहानियां कहते हैं। उनमें रिश्तों के भीतर की नमी सूख जाने का दर्द है । उससे उपजी उदासी है । स्वार्थी उदासीनता जो अपनों के भीतर पनप रही है उसे वह पाप कहते हैं निर्मलजी की व्यकितवादी चेतना निर्वासित चेतना नहीं थी। उसमें समाज की समाविष्टि भी थी । निर्मल जी ने अपने लम्बे प्रवासकाल में बौद्धिकता और आधुनिकता को अपने भीतर आत्मसात किया था। इसलिए इसके पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों के प्रति उनकी दृष्टि साफ थी । व्यक्ति और समाज के बीच द्वंद्व और अन्तरालों के प्रश्नों को उन्होंने अपने निबन्धों में उठाया है । उनकी लेखकीय चेतना में सामाजिक संघर्ष का नाद तो था ही । पश्चिम प्रवास में भी पश्चिम उन पर कभी हावी नहीं हुआ बल्कि और अधिक भारतीय जीवनदर्शन को समझ सके । ‘धुंध से उठती धुन’के निबन्धों में उन्होंने घर्म, संस्कृति, सांप्रदायिकता जैसे विषयों पर गहन चिन्तन-मनन किया और अपने पारदर्शी निष्कर्ष भी दिए । भारतीय संस्कृति, को समझना हो तो उसकी गहनता में ही समझा जा सकता है । भारत की संस्कृति अस्मिता, सामूहिक सांस्कृतिक गंध के भीतर से दृश्यमान होती है । भारतीय सभ्यता और संस्कृति में जीवन की लय है एक समग्रता का भाव है जो उसे अखंड बनाता है । भारतीयता बोध जीवन से रचा-पचाहै । उसे खंडित करके धर्म, राजनीति, राष्ट्रीयता और टुकड़ों में बाँटकर नहीं देखा जा सकता । यह एक तरह का समग्रताबोध है । धार्मिक बोध को निर्मल जी ने सांस्कृतिक परम्परा की धरोहर कहा । धर्मनिरपेक्षता को वह पश्चिम की झूठी नकल मानते हैं । धर्म परिवेश की पवित्रता है । हमारे पर्मिक सस्कार ही हमारे सृजनातमक साहित्य के मूल में होते हैं परन्त धर्म को ‘रिलिजन’ के अर्थ में नहीं समझ सकते । धार्मिक होना साम्प्रदायिक होना नहीं है । यह हमारे जीवन में जातीय स्मृति का प्रतिभागी है। इस तरह निर्मल जी ने भारतीय संस्कृति को वैश्विक स्तर पर पश्चिम के प्रतिरोध में समझा । इतिहास के परिप्रेक्ष्य में जाना । इसलिए उनके निबन्धों में भारतीय संस्कृति की आत्म-सजग स्वीकृति है । कला और साहित्य के सरोकारों के संदर्भ में, लेखक के धर्म और दायित्व के संदर्भ में तथा उसके स्वप्न और स्वतंत्रता के संदर्भ में अपना विमर्श प्रस्तुत किया । इसी समग्र दृष्टि के कारण निर्मल जी पर उनके अपनों ने अपनी एकतरफा सोच के कारण गोलीबारी की । परन्तु निर्मलजी रचनाकार की स्वतंत्रता के पक्षधर थे । इसलिए उन्होंने अपनी स्वायत्तता और स्वतंत्रता को बनाए रखा । अपनों की उपेक्षा और आलोचना को सहा । शुरू में निर्मल जी मार्क्सवादी थे मार्क्सवादी चिंतन ने उन्हें भारत में छुआछूत, जातिभेद के कारण असमानताओं से उपजे शोषण की और प्रेरित किया । बाद में उन्हें मार्क्सवाद अपूर्ण लगा । आर्थिक कारण ही जीवन में प्रमुख नहीं हो सकते । साथ ही कोई एक विचारधारा संपूर्ण नहीं हो सकती । एकमत में फंसकर लेखक का यथार्थ सीमित हो जाता है मतवाद उसे प्रचारक बना देता है। जीवन सत्य की अनेक पर्तें हैं । जीवन यथार्थ के अनेक पहलू हैं उन्हें मतवाद के जरिये परिभाषित नहीं किया जा सकता । इसलिए उन्होंने लिखा कि उन्हें लंदन में अच्छा लगा, पात्र नहीं । क्योंकि उनकी दृष्टि में रचनाकार और व्यक्ति की प्राइवेसी और स्वतंत्रता का महत्व था। यूरोप के अस्तित्ववाद ने भी उन्हें दृष्टि दी । उनके आत्मबोध को जगाया । उनके निबन्धों में जातीय अस्तित्व,दर्शन, धर्म, सभ्यताओं का संतुलित संवाद और अपने समय की चिन्ताओं का वस्तुपरक विवेचन है। निर्मल जी के लिए सृजन एक तलाश है । अपने समय से जुडे सवालं पर वह एक जागरूक दृष्टि से विचार करते हैं । जहाँ पूर्व और पश्चिम का अलगाव नहीं रहता । निर्मल जी यदि गाँधी, विवेकानन्द, महर्षि रमण, लोहिया, जयप्रकाश नारायण पर विचार करते हैं तो रिल्के ,सार्त्र, काकू, हाइडगोर पर भी सोचते हैं । पश्चिमी दर्शन ने एक फिल्टर का काम किया जिससे उन्होंने वामपंथी विचार की संकीर्णता को ही नहीं उसके मानवतावाद की छलना को भी पहचाना । शब्द और स्मृति, कला का जोखिम, ढलान से उतरते हुए इतिहास, स्मृति और आकांक्षा, शताब्दी के ढलते वर्षों में साहित्य का आत्मसत्य निबन्ध देखे जा सकते हैं। इनमें रचनाकार चिन्तक का वैयक्तिक स्वातंत्र्य है जो न पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है और न पश्चिम से त्र्स्त । उनके चिन्तन में एक तरफ जहां सामाजिक-सांस्कृतिक बोध है वहां जीवन के शाश्वत प्रश्नों की अकुलाहट भी है ।
एक पाठक के रूप में मैं निर्मल जी की भाषा से सदा आक्रान्त रही । उनकी रचनाओं में प्रवेश करना एक रहस्यमय संसार में प्रवेश जैसा था। एक उदास साँझ-सी उतरती लगती और धुंध सी छा जाती । मैंने उनसे पूछा था- आपने कविता नहीं लिखी ? उन्होंने कहा था शुरू में लिखी थी । लेकिन आप अपने गद्य में भी कविता ही तो करते हैं । आपका सारा लेखन एक लम्बी कविता जैसा लगता है । निर्मल जी की भाषा ठण्डी है बिना किसी उत्तेजना के धीमी गति में कविता में लिखा गद्य है । परन्तु उसमें एक परोक्षता है बारिश की बूँदों की तरह धीरे-धीरे पाठक के अन्तस में सीपती है । उनकी एक निजी दुनिया भी है जो उनके साथ रहकर उनके रचनात्मक संवेदनों को प्रभावित करती है । इस दुनिया में उनके दोस्त, घर, संगीत, किताबें, कविता, यात्राओं की स्मृतियाँ, बेरोजगारी के दिनों की फाकामस्ती सभी कुछ है । आप क्या लेखक ही बनना चाहते थे ? पूछा तो हँसे थे और कहा था –लेखक के आलावा मैं बहुत कुछ होने की सोचता था, जैसे टीचर, पुस्तकालय में लाइब्रेरियन और जहाज का कप्तान भी । लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ । जीविका के लिए मैंने प्राइवेट कोचिंग सेंटर में पढ़ाया, चेकोस्लाविया में अनुवाद किये लेकिन मूलतः मैं एक लेखक ही था । एक निश्चल-सी मुस्कान के साथ उन्होंने कहा था । निर्मल जी ने ‘वेलन्टाइन डे’, मेरी कहानियाँ की पुस्तक पर अपने विचार व्यक्त किये थे उद्यण कहानी प्रकाशित हुई थी तो पूछा था, अस्पताल की इतनी सूक्ष्म और विस्तृत जानकारी तुम्हें कहाँ से मिली ?
‘माँ थी अस्पताल में, उनकी देखभाल के लिए रहना होता था।’ ‘अच्छा ।’ उस अच्छा में एक उच्छवसित संवेदना थी । तब वह वैस्टर्न एक्सटेंशन एरिया में थे, करोलबाग में । वे अस्वस्थ मे । उन्हे देखने उनके घर पर गई थी । गगन गिल भी थीं । निर्मल जी इतने अच्छे दोस्त भी थे, यही नहीं सोचा था । गगन गिल में पंजाब की गर्माहट भरा आतिथ्य का भाव था। निर्मल जी अपने पीछे आने वाली पीढ़ी के लिए हरियाली के बीज रोपते जाते थे ताकि उस रास्ते पर छाया बनी रहे । यह बड़ा दुर्लभ भाव है जो अब समाप्त हो रहा है ।
पिछले दिनों वे बहुत अस्वस्थ रहे । बहुत बार मन चाहा कि देख आऊँ पर संकोच बना रहा ऐसी स्थिति में मिलने आने वाले कितनी असुविधा उत्पन्न करते हैं यह जानती हूँ । कई बार घर पर फोन किया यह सोचकर कि घर आ जाएँ तो एक बार जाकर मिल लूँगी। लेकिन फोन नहीं मिला । इस दौरान वह कई बार अस्पताल में भर्ती हुए । कई बार घर आए । एक दिन फोन मिलाया तो निर्मल जी ने ही उठाया । मैंने हिचकिचाहट के साथ कहा था, आपसे मिलना चाहती हूँ । क्या मैं आपके घर आ जाऊँ थोड़ी देर के लिए । ‘आ जाओ संक्षिप्त – सा उत्तर था ।’
यह उनसे पहली अनौपचारिक भेंट थी । शंकर मार्केट के बस स्टोंप पर खड़े थे । मेरे साथ गुलमोहर पार्क तक आए थे । रास्ते भर वह मेरी जिज्ञासाओं के साथ रहे । छोटी-छोटी सहज बातचीत के बीच एक बड़े ही निर्मल भाव से । मेरे घर, बच्चों और मेरी नौकरी को लेकर एक आत्मीय सा संवाद बना था । इतना सब एक साथ करने और मेरे लेखन में निरन्तर बने रहने पर उन्होंने खुशी जाहिर की थी । जिसमें एक शाबास का भाव भी था । मैंने कहा था मैं अंदर छोड़ दूँगी उन्होंने नहीं माना था। मुख्य सड़क पर ही उतर गए थे, इतना घूमकर जाना पड़ेगा । मैं यहाँ बीच से निकल जाऊँगा । यह उनकी संवेदनशीलता ही थी । मरा कविता संग्रह ‘सूर्य देता है मन्त्र' प्रकाशित हुआ था । उसे कूरियर से गगन और निर्मल जी के नाम से भेज रही थी । पुस्तक को लिफाफे से निकाल लिया कि खुद ही जाऊँगी तो अपने हाथ से उन्हें दूँगी । ऐसे ही लगभग महीना निकल गया और मैं जा ही नहीं की ।...... तभी समाचार पत्र में खबर पढ़ी तो एक धक्का-सा लगा। ‘मैं क्यों नहीं गई ?’ यह उनसे मेरा आखिरी संवाद था।
मेरे रचनाकार को अज्ञेय और निर्मल जी दोनों ने सम्मोहित किया और मेरी संवेदना को समृद्ध भी । अज्ञेय की तरह वह भी अपने मौन में अद्धितीय थे। पर उनमें एक आत्मीय गर्माहट भी थी जो सहज रूप से भेंटती भी थी । उनका मौन उनके साहित्य में मुखर होता रहेगा और उनकी आत्मीय गर्माहट आने वाली पीढ़ियों को आश्वस्त करती रहेगी ।
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सज्जन न्याय का ही अवलंबन करते हैं- भारवि |
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