सृजन-गाथा

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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अंक-4, सितम्बर, 2006      

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पुस्तकायन

 

कृति-समीक्षा.....

 

मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएँ/व्यंग्यकार-गिरीश पंकज/समीक्षक-जयप्रका प्रत्रकारिता पर तीन किताबें/ लेखक-संजय द्विवेदी/समीक्षक-गिरीश पंकज

बाबूना जो आयेगी/हायकुकार- डॉ. सुधा गुप्ता/समीक्षक-प्रदीप कुमार दास

चंद्रकला/ उपन्यासकार- डॉ.जे.आर.सोनी/ समीक्षक- डॉ.परदेशी राम वर्मा     

 

 

छत्तीसगढ़ की बेटियों की शौर्यगाथा

डॉ.परदेशी राम वर्मा

                                                             

       त्तीसगढ़ में उपन्यास कम ही लिखे गये हैं । इन दिनों उपन्यास विधा पर जमकर लेखन हो रहा है । छत्तीसगढ़ी के उपन्यासों में तो केवल छत्तीसगढ़ ही झाँकता है इस लिए पढ़कर पाठक को गहरा संतोष होता है । छत्तीसगढ़ी भाषा के कुछ अपने विशिष्ट संस्कार हैं । कुछ शब्द ऐसे हैं जिनका पर्याय-वाची शब्द हिन्दी में नहीं है ।

 

       ड़ा. जे. आर. सोनी ने छत्तीसगढ़ी में लिखकर खूब यश अर्जित किया है। उनकी कुछ कृतियां हिन्दी में हैं। एक वृहत संसार को छत्तीसगढी की विलक्षण वैचारिकता और आंतरिक शक्ति के संबंध में जानकारी देने के उद्देश्य से उन्होंने हिन्दी में लेखन किया। लेकिन उनका मन रमता है अपनी भाषा में । चंद्रकला डॉ. जे. आर. सोनी का छत्तीसगढी उपन्यास है । इस वृहत उपन्यास में उन्होंने छत्तीसगढी जीवन की रंजक झांकी प्रस्तुत की है ।

 

       छत्तीसगढी में जातियों के बीच समरसता और सौमनस्य की शक्ति और सीमा दोनों का रेर्खांकन चंद्रकला में हम देखते हैं । मुख्य रूप से उच्च, पिछड़ी और निम्न जांतियों  का विभाजन हमें चंद्रकला में दिखता है । बाहर से आकर यहां व्यापार करने वाले लोग भी छत्तीसगढ़ी बन गये । यह अंचल सबको छाया देता है इसलिए सब यहां एकरस हो जाते हैं । ब्राम्हण के बालक को यादव जाति की मा अपना दूध पिलाती है और जीवन भर यह महतारी और पुत्र का रिश्ता उन्हें और समाज को जोड़े रखता हैं । चंद्रकला की मां ही चंद्रप्रकाश को दूध पिलाकर बड़ा करती है । चन्द्रप्रकाश पी. एस.सी. की परीक्षा में बैठता है । घूस के बगर चयन असंभव दिखता है । चंद्रकला नगर पालिका में क्लर्क है । पालिका के अध्यक्ष मालूराम अग्रवाल बाल-बच्चेदार आदमी है । चंद्रकला भाई के लिए पैसा जुटाना चाहती है। वह मालूराम को अपना सर्वस्व सौंप देती है । मालूराम पैसा देने की शर्त ही यह रखता है । चंद्रकला मालूराम की रखैल बन जाती है । चंद्रप्रकाश नायब तहसीलदार के पद पर चयनित हो जाता है और कथा तेजी से आगे बढ़ती है ।

 

       चंद्रकला और चन्दा दोनों मिलीमाता से मिलने दिल्ली जाती हैं । सेठ मालूराम चाहते हैं कि चंद्रकला विधायक का चुनाव लड़े । मिनीमाता की सिफारिश पर इंदिरा जी क्रमशः चंद्रकला को सरिया क्षेत्र से और चंदा को सारंगढ़ रिजर्व क्षेत्र से टिकट देती हैं । दोनों जीतते हैं और चंद्रकला राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार, बनकर क्षेत्र में सेवा करती है । फादर प्रांसिस की कथा नया मोड़ लेती है । वह वापस छत्तीसगढ़ के अपने घर में लौटते हैं । उनकी पत्नी उनको पाकर निहाल हो जाती है । वे फ्रांसिस से पुनः बलराम पाण्डे बन जाते हैं । उनका मुण्डन होता है । विधि विधान पूर्वक उन्हें पुनः ब्राम्हण बनाया जाता है। लेकिन ब्राम्हण समाज उसे स्वीकार नहीं करता । समाज के लोग उसके साथ पंगत में बैठना नहीं स्वीकारते । चंद्रकला में चरित्रों की भरमार है । इसमें ट्रेड यूनियन लीडर गक्फार माई हैं जो लगातार मजदूरों के हित की लड़ाई ल़ड़ते हैं ।

 

       जातीय कट्टरता से त्राण पाने के लिए छत्तीसगढी में धीरे-धीरे लोग सतनाम पंथ में गये । गुरू बाबा घासीदास ने एक ऐसा पंथ चलाया जिसमें सबको समानता का दर्जा मिला । इसलिए भिन्न-भिन्न जाति के लोग सतनामी बने । यह कथा चंद्रकला में गुम्फित है । चंद्रचला उपन्यास में स्त्री और पुरूष चरित्रों की विशेषता हम स्पष्ट महसूस करते हैं । पुरष मतलबी, कामी, अवसरवादी और विचलित दिखते हैं । समारू, बलराम पाण्डे,चंद्रकांत, मालूराम अग्रवाल आदि के चरित्रों से पाठक जान पाता है कि पुरूषों का आत्मबल कितना कमजोर है, दूसरी ओर चंद्रकला, चन्दा, मालुराम की पत्नी सरला, पुष्पा पाण्डे, रमौतिन हैं । ये महिलायें शोषण की चक्की में पिस रही हैं । पुरूष समाज सदैव अवसर आने पर इन्हें जीन्स की तरह इस्तेमाल करता है । फिर भी ये नारियां इन्हीं अंधेरी राहों से गुजरकर सेवा और सद्भभाव का इतिहास रचती हैं ।

 

       मालूराम चंद्रकला को रखैल बनाकर रखता है, उसे पत्नी का दर्जा नहीं देता लेकिन चंद्रकला जीवन भर एकनिष्ट पत्नी की तरह जीवन बिता देती है। वह कभी विचलित नहीं होती । मालूराम के निधन होने पर वह चूड़ी भी उतारती है और उसके परिवार को ढाढस बंधाकर सभी कार्य विधि-विधान पूर्वक निपटाती है । छ्त्तीसगढ़ की बेटियां न यहां मान पाती है न बाहर सुरक्षित हैं, यह संदेश भी कथा के माध्यम से सोनी जी ने दिया है । दिल्ली प्रवास में रीवा के दुष्टों की जकढ़ में सतनाम पंथ, इसाई धर्म, हिन्दू धर्म, इस्लाम आदि के प्रभाव को जे, आर, सोनी ने खूबसूरती से कथा में पिरोकर पेश किया है । कुछ पुरूष चरित्रों का जिक्र संकेतों में आता है । जैसे अमृत जोगी हैं । ये ट्रेड यूनियम लीडर हैं । इन्हें बाकायदा कलकत्ता में ट्रेड यूनियन में काम करने के लिए भरपूर प्रशिक्षण भी मिला है । पार्टी के साथ टकराने की शक्ति रखने वाले  ट्रेड यूनियन के लीडरों का भी सोनी जी ने अच्छा उल्लेख किया है।

       जौन ला कोनो ठौर में जगा नई मिलय बो हा सतनामी समाज म समा जथे,

       यह लेखकीय विश्लेषण बेहद प्रभावी है । डा. सोनी ने उपन्यास में छत्तीसगढ़ी खान-पान, जीवन दर्शन,प्रकृति, संस्कार, त्यौहार, पर्व परंपरा, विवाह-पद्धति, मृत्यु संस्कार, मेला, मडई, धर्म, उत्सव, मंदिर,  जाति, सम्पद्राय, सबको समेटने का प्रयास किया है ।

 

       चंद्रकला नायिका है । इस चरित्र की विशेषता यह है कि इसने दूसरों के सुख, सम्मान और भविष्य के लिए अपना सुख, मान और वर्तमान न्यौछावर कर दिया । इस चरित्र की विलक्षणता भी यही है कि सामान्य छत्तीसगढ़ी स्त्री की अंतर्शक्ति और आत्मिक बल का प्रभावशाली विस्तार अपने माध्यम से चंद्रकला प्रकट करती है । उसके जीवन का विकास भी हम देखते हैं जो एकदम विश्वसनीय बन पड़ा है । पुरूष यहां स्त्रियों के आगे अंततः निश्तेज हो जाते हैं । उप्न्यास में भिन्न-भिन्न जातियों की विशेषता पर भी रोचक टिप्पणी है ।

 

       उपन्यास के पुरूष पात्र स्त्रियों की चाकरी करते से नजर आते हैं। अन्यंत रोचक दृष्य भी है उपन्यास में । पुरूष तेल में लहसुन कड़का कर प्रायः स्त्रियों की मालिश करते हैं । सेक्स सें लेखक ने परहेज तो किया है मगर दांपत्थ जीवन  में लगातार शारीरिक सम्मिलन स्फूर्ति और उर्जस्विता के लिए जरूरी है, यह वे स्थापित करना नहीं भूलते। विवाह के बाद प्रथम रात्रि का भी दृष्य एक पंक्तियों का रहता है मगर हर दंपत्ति साथ जीने मरने का संकल्प उस रात्रि में अवश्य दुहराता है ।

 

       उपन्यास में कई कलियां रात बीतते ही फूल बन जाती हैं । यह लेखकीय सहजता पाठक को गुदगुदाती है । कामकेलि में उत्तेजित स्त्री के लिए सोनी जी ने बार-बार गरम हो जाना लिखा है । फिर हर बार मस्ती कर वे रात्रि विश्राम करने लगे यह वाक्य आता है । उपन्यास में स्त्री जीवन में काम की अहमियत पर लंबा परिच्छेद है। एक हिस्टीरियाग्रस्त स्त्री का वर्णन है जो विकृति के कारण समलैंगिक हो जाती है लेकिन अंततः वह इस विकार से मुक्त होती है । पुरूष साहचर्य मिलने पर वह स्वयंमेव विकारमुक्त होकर सहज हो जाती है । रोटी-पीठा, जोड़ी-जांवर, मीत-मितानी, सबका वर्णन चंद्रकला उपन्यास को पठनीय और विशिष्ट बनाता  है ।

 

       यह छत्तीसगढी का विशिष्ट उपन्यास है जिसमें कमजोर छत्तीसगढ की मजबूत बेटियों के साहस और शौर्य की प्रेरक कथा है । भाषा बिलसपुरिहा, रइपुरिहा और रायगढिहा है । छत्तीसगढी के भिन्न भिन्न इलाकाई रूप इस उपन्यास में है । सोनी जी नगरीय प्रशासन विभाग के बड़े अधिकारी हैं । इसलिए प्रशासन, विधान सभा, स्थानीय प्रशासन, पंचायत, महिला मंडल आदि का जिक्र जानकारी बढ़ाने वाला और प्रामाणिक लगता है । घूस के बिना प्रायः लोक सेवक चयनित नहीं होता यह दावा भी रोचक और व्यंग्य पगा लगता है । घूस देकर चयनित हुए अधिकारी अंततः घूस लेकर ही सेवा का व्रत निभा पाते हैं ।

 

       धर्म परिवर्तन की व्यथा, प्रलोभन का झांसा, जातिय कट्टरता की मार, अज्ञान का फैला घोर अंधेरा इस उपन्यास को बड़ा फलक देता है । उपन्यास में छत्तीसगढी के साहित्यकारों, जन-नेताओं, त्यागी स्वत्रंता सेनानियों, संतों,महंतों और कलाकारों का जीवंत वर्झन है । उपन्यास पठनीय और संग्रहणीय है । अगर डा.जे.आर. सोनी इस पर जमकर कुछ और परिश्रम करते तो शायद अवांछित कथाओं के विस्तार से बच भी जाते । यत्किंचित कटुता का आभास जो अभी मिलता सा लगता है वह भी तिरोहित हो जाता । कुल मिलाकर यह उपन्यास बड़ी साधना और यात्रा का प्रतिफल है। कथा कोशल और कारीगरी प्रशंसनीय है ।

 

 

सदाचार का उल्लघंन करके कोई कल्याण नहीं पा सकता- विष्णु पुराण

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, आदेश ठाकुर चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

तकनीकः प्रशांत रथ