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स्वतंत्रता
के बाद हिंदी व्यंग्य लेखन में निरंतर सक्रिय तीसरी पीढ़ी के चर्चित
व्यंग्य हस्ताक्षर गिरीश पंकज के चार व्यंग्य संग्रह और दो व्यंग्य
उपन्यास प्रकाशि
समीक्ष्य संग्रह की तमाम रचनाएँ समकालीन परिदृश्य का सूक्ष्म निरीक्षण करती हैं और बीमार व्यवस्था की निर्मम शल्यक्रिया भी करती हैं । इन रचनाओं के माध्यम से लेखक ने समाज की विभिन्न विसंगतियों का संस्पर्श किया है। गिरीश व्यंग्य को मेहतरी मानते हैं । जिसके पीछे बेहतरी का भाव सन्निहित होता है। लेकिन वे यह भी कहते हैं कि “यह भी कटु सत्य है कि गंदगी साफ करने वालों के प्रति समाज में आज भी कोई साफ दृष्टि नहीं है। फिर भी व्यंग्यकार का महत्व सफाई कर्मी के महत्व की तरह कम न होगा ।”
राजनीति का हस्तक्षेप जीवन के सभी घटकों में हो रहा है। यही कारण है कि आजकल व्यंग्य के नाम पर फूहड़ किस्म के व्यंग्य ज्यादा नज़र आ रहे हैं । ये धडल्ले से छप भी रहे हैं । गिरीश ने भी राजनीति पर व्यंग्य लिखे हैं लेकिन उन्होंने दूसरे मुद्दे भी उठाए हैं । इस संग्रह में टीवी के विज्ञापन शिक्षा, साहित्य, समाज, स्त्री अफसरशाही, राजनीति, बेईमानी, समाजसेवा, काव्वेंट–संस्कृति आदि पर लिखे गए धारदार व्यंग्य देखे जा सकते हैं । दरअसल व्यंग्य लेखक समाज में घटित हर तरह के पाखंडों का निर्भीक होकर विवेचन करता है । जीवन जीने के लिए अनेक किस्म के खटराग होते रहते हैं, लेकिन व्यंग्य तभी बनता है, जब खटराग के पीछे मंशा सकारात्मक हो । वरना रचना फूहड़ बन कर रह जाती है ।
संग्रह की पहली रचना ‘कीटाणुओं का हमला’ को ही लें । इसमें टीवी के विज्ञापनों पर हमला है। विज्ञापन आम आदमी की जेबें ढीली कर देते हैं । टूथपेस्ट कम्पनियाँ देश की सबसे बड़ी समस्या दाँतों में कीटाणुओं की घुसपैठ ही मानती है । ‘गइया जागी सुन रे बैल’ सत्य घटना पर आधारित व्यंग्य है। जिसमें एक गाय बैल की जान ले कर चरवाहे को भी घायल कर देती है। व्यंग्यकार कहता है, कि इसके पीछे कारण साफ है, कि गाय को उसके हिस्से का चारा खाने को नहीं मिला, सो वह इंसानों पर ही टूट पड़ी।
गिरीश पंकज ने ऐसे अनेक विषयों को छूने की काशिश की है । वे पुस्तक मेले में जाने वाले असाहित्यिक किस्म के लोगों की ख़बर लेते हैं, तो कान्वेंट संस्कृति पर भी प्रहार करते हैं । गिरीश सोचते हैं कि काश मच्छर उन्मूलन की बजाय नेता उन्मूलन अभियान चलाया जाता । महिलाएँ उपवास करती हैं और पुरुष खा-पीकर मस्त रहता है । इस पर भी संग्रह का व्यंग्य सोचने पर बाध्य करता है । लोक कला में अभिरुचि का दिखावा एक फैशन है । पंकज इस प्रवृत्ति पर भी कड़ा प्रहार करते हैं । गणेश जी की प्रतिष्ठा करके कुछ दिनों के बाद उनका विसर्जन कर दिया जाता है । कुछ ऐसी हालत इस देश के शिक्षक की है। इस मुद्दे पर भी समीक्ष्य पुस्तक में एक सशक्त व्यंग्य ‘गणेशोत्सव बना शिक्षक दिवस’ संगृहीत है । महान साहित्यकार-कलाकारों के घर खंडहर में तब्दील होते जा रहे हैं । उस पर एक मार्मिक वंयग्य है, ‘मकान बनाम मूल्यों के खंडहर’। सूखाग्रस्त क्षेत्र में जाने वालों का चरित्र हो या दंगा करने वालों का मनोविज्ञान, इस पर भी संग्रह में ‘भरपेट यात्रा के नाम’ और ‘मिलना मिस्टर दंगाई से एक दिन’ जैसी पठनीय रचनाएँ हैं । धंधेबाज आँदोलनकारी, वोट की खातिर भीख माँगते नेता हों, या आयोजनों के लिए छटपटाते नेता, इन सबकी प्रवृत्तियों का भी व्यंग्यकार ने बारीक विश्लेषण किया है।
महिलाएँ आधुनिक हो रही हैं । लेकिन इनकी आधुनिकता फूहड़ता तक पहुँचती जा रही है। ‘कालोनी की आधुनिकाएँ’ रचना पढ़कर नारी स्वातंत्र्य की विसंगतियाँ भी समझी जा सकती है। व्यंग्य रचना अगर पाठक को केवल गुदगुदाती है, तो वह सही व्यंग्य नहीं हो सकता। सच्चा व्यंग्य पाठक को उद्धेलित करता है। इस लिहाज से संग्रह में अनेक रचनाएँ हैं । ‘नेताजी की नरक यात्रा’ अभूतपूर्व व्यंग्य है । ऐसे एक-दो व्यंग्य परसाईजी ने भी लिखे हैं । गिरीश पंकज के व्यंग्य में परसाई की नकल नहीं है, लेकिन छाया जरूर नजर आती है। पंकज अपने मौलिक मुहावरे और शब्दावलियों को गढ़ने के लिए पहचाने जाते हैं। इस संग्रह में भी ऐसे अनेक शब्द आए हैं जिनका प हली बार शायद लेखक ने ही इस्तेमाल किया है । जैसे,‘दंगेच्छु’ ‘वोटार्जन’,‘भष्टोदय’,’आंदोलनजीवी’,‘बीरता का वायरस’,‘हँसी उगलना’ आदि ।
इस संग्रह पढते हुए यह आशंका निर्मूल हो जाती है, कि समकालीन व्यंग्य में तेजस्विता की कमी आई है। तथाकथित आलोचकीय आरोप भी गलत प्रतीत होता है कि परसाई, जोशी और त्यागी के बाद व्यंग्य की धार भोथरी हुई है। गिरीश पंकज व्यग्य की पुरानी पीढ़ी की परम्परा को जिम्मेदारी के साथ निभाने जाने वाले उत्तराधिकारी प्रतीत होते हैं । इस संग्रह की रचनाओं से गुजरते हुए तो यही महसूस होता है।
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जगत हम ही हैं । हम उसके अंदर है और वह हमारे बाहर है- महात्मा गाँधी |
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