सृजन-गाथा

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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अंक-4, सितम्बर, 2006      

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कृति-समीक्षा.....

 

मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएँ/व्यंग्यकार-गिरीश पंकज/समीक्षक-जयप्रकाश

प्रत्रकारिता पर तीन किताबें/ लेखक-संजय द्विवेदी/समीक्षक-गिरीश पंकज

बाबूना जो आयेगी/हायकुकार- डॉ. सुधा गुप्ता/समीक्षक-प्रदीप कुमार दास

चंद्रकला/ उपन्यासकार- डॉ.जे.आर.सोनी/ समीक्षक- डॉ.परदेशी राम वर्मा     

 

 

 

 हिंदी पत्रकारिता और संजय की सजग दृष्टि

गिरीश पंकज

 

       समूची हिंदी पत्रकारिता में मुट्ठी भर लोग ही ऐसे हैं जो मौजूदा परिवे पर कलम चलाने की सोच पाते हैं, कलम चलाना तो दूर की बात है। दरअसल पत्रकारिता में वर्षों से बिलबिलाते हुए अनेक पत्रकार चूके हुए चरित्र के दृष्टांत बन चुके हैं। इन लोगों से नई सर्जना की अपेक्षा करना बेमानी है। नई पीढ़ी के भी जो पत्रकार पत्रकारिता में प्रवेश कर रहे हैं, वे राजनीतिक चकाचौंध के सहारे खुद के ही पुनर्वास की जुगत में ज्यादा नजर आते हैं। गहन चिंतन और सामाजिक मुद्दों पर गंभीर लेखन की दिशा में लेखन के लिए प्रतिबद्धता कम होती जा रही है। नई पीढ़ी के पत्रकार राजनीतिक-प्रशासनिक खबरों की चीरफाड़ में तो गहरी दिलचस्पी दिखाते हैं (इसके अनेक परोक्ष कारण भी हैं) लेकिन समाज या राष्ट्र को प्रभावित करने महत्वपूर्ण विषयों या व्यक्तियों पर लिकने की जहमत नहीं उठाते। घटनाओं को जस का तस प्रस्तुत कर देने में क्या माल। कमाल तो तब है जब किसी एक घटना पर गंभीर विश्लेषमात्मक आलेख तैयार हो। इसके लिए अनेक सामयिक-समीचीन संदर्भ एकत्र करना, तथ्यों का अन्वेषण करना और अपने मौलिक चिंतन के प्रदेय द्वारा पाठकों के लिए पठनीय सामग्री तैयार करना एकाग्रचित्त कर्म है। इसे कर पाने की ललक जिनमें है, मैं उन्हें ही सच्चा पत्रकार मानता हूँ। बाकी तो संवाददाता हैं, बस। पत्रकार तो वही है जो अपनी लेखनी के द्वारा समाज को उद्वेलित करने की सार्थक कोशिश करे। ऐसे ही एक पत्रकार हैं संजय द्विवेदी जिन्होंने पत्रकारिता के जंगल में वनफूल की तरह महकने की कोशिश की है। पिछले दिनों संजय की तीन कृतियों को देखने-पढ़ने का सुअवसर मिला। इस सूचना समर में, मत पूछ हुआ क्या-क्या  और तीसरी सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और उनकी पत्रकारिता। तीनों पुस्तकों को पढ़कर आश्वस्त हुआ जा सकता है कि पत्रकारिता के भीतर पनप रहे अपढ़ किस्म की बिरादरी में पढ़ने-लिखने की परंपरा बरकरार है, जो लुप्त होती नज़र रही है।

 

       इस सूचना समर में  संजय द्विवेदी के अड़तीस आलेख संग्रहित हैं और अट्ठाईस विशिष्ट लोगों पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां हैं। लेखों की चुटीली भाषा पढ़कर स्पष्ट हो जाता है कि लेखक सामाजिक-राजनीतिक विद्रूपों को तल्ख भाषा के सहारे ही प्रस्तुत करना चाहता है। फिर चाहे वह सवाल अखिल भारतीय चरित्र का है हो या चाहे विचारधारा के अरण्य से जनपथ पर वापसी हो, इन सभी में लेखक  अपने समय के ही ज्वलंत सवालों को केवल व्यंग्यात्मक तरीके से उठाता है वरन् कहीं-कहीं समाधान खोजने की कोशिश भी करता है। कथ्यों को तथ्यों के सहारे प्रस्तुत करने से पाठक को इतिहास की जानकारी तो मिलती ही है, उसकी अपनी दृष्टि भी बनती है। संजय अपने लेखों के माध्यम से पाठकीय दृष्टि बनाने की भी कोशिश करते है। अखिल भारतीय चरित्र को बचाने के सवाल पर संजय लिखते हैं कि चिरत्र मात्र चुनावी गणित ही नहीं, एक राष्ट्रीय सोच एवं सवेदना है। डॉ. लोहिया एवं दीनदयाल उपाध्याय जैसे राजनीतिक चिंतकों का हवाला देकर संजय ने स्थापित किया है कि विरोधी मतों वाले नेता भी राष्ट्रीय मूल्यों वाले विषयों पर एकमत हुआ करते थे। फिर चाहे वह भारत पाक महासंघ बनाने की साझा अपील ही क्यों हो। संजय ने आज के संदर्भ में बड़ा सटीक सवाल उठाया है कि मुलायम सिंह भी भारत पाक महासंघ की मांग करते नज़र आते हैं, पर क्या वे अपने प्रतिद्ë