सृजन-गाथा

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

E-mail-srijangatha@gmail.com   

 

 

 

अंक-4, सितम्बर, 2006   

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतर संस्कार पुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

प्रसंगवश

भाषाःक शब्द.... लगाना- डॉ. गंगा प्रसाद बरसैंया

मीडिया-विमर्श.....समसामयिक पत्रकारिता का परिदृश्य- संजय द्विवेदी

विचार.....मृत्यु पर विजय- पुष्करलाल केडिया

लोक-आलोक....जिन्ने ट्रिनबैगो (ट्रिनिडाड-टुबैगो) नहिं देख्या- सुवास कुमार

तकनीक.....इंटरनेट पर उपलब्ध हैं रोजगार- रविशंकर श्रीवास्तव

मूल्यांकन.....आनुवाद यानी तलवार की धार- वीरेन्द्रकुमार वरनवाल

प्रसंगवश.....शरद जी की लेखन विधा का मूल सौंदर्य- राम पटवा

अंतरजाल.....हिंदी मीडिया की दिशा बदल सकता है यूनिकोड- बालेन्दु शर्मा दाधीच

 
 

लेखन का मूल सौंदर्य-"मनुष्य की बेबसी"

।। राम पटवा ।।

 

(5 सितंबर / स्व. शरद जोशी की पुण्यतिथि पर विशेष)

          र समय हमारे साथ जीता, हमारी बात लिखता, हमारी बात बोलता, हमारे लिए लड़ता, हमें अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध लड़ना सिखाता, हमें इन संकटों में जुझारू बनाने वाला यह व्यंग्यकार आज हमारे बीच नहीं हैं । उनकी मृत्यु की समाचार से हिन्दी क्षण भर के लिए हँसना भूल गई हो, या हँसते-हँसते रो पड़ी हो । उन्होंने अपने जीवन की 'परिक्रमा' पूरी कर मृत्यु को हँसते-हँसते गले लगाया और 5 सितम्बर 1993  को हमेशा-हमेशा के लिए एक जिंदादिल इंसान हमारे बीच से चले गये।

 

        प्रख्यात व्यंग्यकार शरद जोशी की अनुपस्थिति समूची व्यंग्य विधा पर एक बज्रपात है । उन्होंने व्यंग को बहुआयामी, बहुवचनी और बहुरंगी बनाया । कार्टून के क्षेत्र में जो नाम आर. के.   लक्ष्मण का है, व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में यही बेजोड़ हैसियत शरद जोशी को हासिल थी। निरंतर 30 वर्षों तक कोई सप्ताह ऐसा न हो जब उन्होंने अपने प्रिय पाठकों को अपनी उपस्थिति का एहसास न कराया हो और लोगों की चेतना को न कुरेदा हो । नवभारत टाइम्स का प्रतिदिन कॉलम उनके व्यंग्य लेखन की पंचवर्षीय योजना ही थी ।

 

         यह सत्य है कि एक व्यंग्यकार अपने देशकाल और परिवेश का सुकरात, दुर्वासा और नारद होता है । हिन्दी के अधिकांशः रीढ़हीन साहित्यकार चाहते हैं कि व्यंग्य में सब कुछ हो मगर धार और प्रहार न हो । शरद जोशी को ऐसी साहित्यिकता से परहेज था।

 

        मालवा की मिट्टी को चूमकर पले, बढ़े और दैनिक नई दुनिया इंदौर से अपनी साहित्यिक यात्रा शुरु करने के बाद जोशी जी ने हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं में अपना महत्वरूर्ण स्थान बनाया। अखबारों के कॉलम से लेकर फिल्मी पटकथा और नाटकों में उनका जितना अधिकार था उतना ही कवि सम्मेलनों में भी। वे हंसाने के साथ-साथ झझकोरते भी थे। व्यंग्य के क्षेत्र में मध्यप्रदेश का अवदान तब लगभग ऐतिहासिक हो जाता है, जब हम उन्हें परसाई के साथ जोड़कर देखते हैं । इन शीर्षस्थ व्यंग्यकारों ने हिन्दी के व्यंग्य लेखकों की एक पूरी पीढ़ी खड़ी कर दी। परसाईजी ने कहीं कहा है किहिन्दी साहित्य में व्यंग्य लेखकों को अछूत माना जाता है। हिन्दी व्यंग्य के इन मूर्धन्य नामों ने ही इस व्यंग्य नाम की विधा के अछूतोद्वार का काम किया, इसमें परसाई, शरद जोशी और श्रीलाल शुक्ल का नाम प्रमुख है।

 

       आजादी के बाद हिन्दी व्यंग्य का केन्द्र मध्यप्रदेश रहा है। शरद जी उस केन्द्र के स्तम्भ थे। शरद जी ने, कभी किसी का अंधा आदर नहीं किया । उनका मानना था कि व्यंग्यकार विदूषक होता है वह राजा को नंगा कहता है, और करता भी है। नवभारत टाइम्स का उनका 'प्रतिदिन' कॉलम इतना लोकप्रिय हुआ कि वे अपनी अनुपस्थिति के बाद भी लोकप्रिय बने रहे, बने ही रहेंगे । उनका यह कॉलम संसद के सेन्ट्रल हाल में दिलचस्पी से पढ़ा जाता था। कई मंत्री एवं पूर्व राष्ट्रपति, ज्ञानी जैलसिंह का नाम शरद जी को पढ़ने, सुनने वालों की सूची में प्रमुखता से लिया जाता है। निःसंदेह शरद जी देश की एकता, अखंडता, धर्म निपेक्षता तथा समाज की ताकत थे।

      

       जोशी जी प्रगतिशील रचनाकार थे, साथ ही पत्रकारिता में उनकी पैनीपकड़ भी थी, वहीं दूसरी ओर उनके पास अभिव्यक्ति का एक भरा-पूरा संसार भी था । यह संसार इतना व्यापक था कि व्यंग्य की विधा कभी-कभी उनके सामने ठिगनी हो जाती थी। लगभग चार दशक की अनवरत सेवा यात्रा में उन्होंने अपने व्यक्तित्व को अलग ही स्थापित किया । चार दशकों की इस संपूर्ण यात्रा में उन्हें अपनी धर्मपत्नी इरफाना जी का संबल निरंतर प्राप्त होता रहा । लिखने के साथ-साथ उनमें प्रस्तुतिकरण की भी अद्भुत शैली थी। रचना पाठ के क्रम में लोगों को वे हंसाते भी थे और जाने कब हंसाते-हंसाते उनकी प्रफुल्लित चेतना के हिस्सा हो जाते थे । यह जो जिन्दगी टी.व्ही. सीरियल से उन्होंने दूरदर्शन को सहज हास्य की शब्द क्रीड़ा से परिचित कराया ।पोष्ट आँफिस जैसे गद्यनुमा व्यंग्य कविता के शब्दों की तरह वे जन-जन के जुबान पर चढ़ गये, और कवि सम्मेलनों में पद्य के साथ गद्य को भी एक सिंहासन में बिठाने का कार्य शऱद जी ने किये ।

      

                उनकी पैनी निगाह, जीवन और गम्भीरता, महानता और उदारता के दूसरे पक्ष को तुरंत देख लेती थी, इसी कारण सामयिकी में वे छा जाते थे। वे दूसरों पर व्यंग्य करने के साथ-साथ स्वयं पर भी व्यंग्य करते थे । उनका मानना था कि स्वयं की चीर फाड़, आपरेशन से ही शायद श्रेष्ठ व्यंग्य का जन्म होता है। राजनीति,अफसरशाही, ताकतवर प्रतिष्ठानों के अत्याचार, अनाचार और मनुष्य की बेबसी, शरद जी के लेखन विधा के केन्द्रीय बिन्दु थे। इस संदर्भ में परसाई, और जोशी जी ने अपने-अपने नजरिये से लिखा । ये व्यंग्य की दो बेगवान धारायें, शक्ति एवं सत्ता सम्पन्न लोगों की बड़ी-बड़ी नावों को हमेशा डगमगाया करती थी। वे एक ऐसे स्वतंत्र लेखक थे, जिन्होंने किसी प्रतिष्ठान या साहित्यिक आंदोलन के जरिए नहीं बल्कि अपने ही दम-खम से एक अलग ढंग से अपने को स्थापित किया । शरदजी का स्वाधीन लेखन मनुष्य की स्वधीनता छीनने वाली ताकतों पर बहुत बड़ा मारक यंत्र था

 

 

 

 

विद्या की परिपूर्णता का कोई बिन्दु नहीं होता- टॉमस जे. वाट्सन   

आपकी प्रतिक्रिया

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतर संस्कार पुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, आदेश ठाकुर चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

तकनीकः प्रशांत रथ