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अधेंरे में उम्मीद डॉ. श्रीराम परिहार
चिडियों
की किलबिल के साथ जागती है बिटिया । चिड़िया खिड़की से फूर्र हो किरणों के
पंख नापती आकाश को जाती है । बिटिया बिस्तर से उठती है । पुकार-प्रश्नों की
शाखा-प्रशाखाओं में कमरे-कमरे बढ़ती है और पूरा घर हो जाती है । बच्चों के
स्कूल जाते ही घर बेमौसमी पत्तों-सा झड़ने लगता है
बिना खिड़की का मकान गोदाम होता है, घर नहीं । बिना आस के हृदय यंत्र होता है, मन नहीं । खिड़की घर की आँख होती है और आसा मन की । आसा की खिड़की खुलते ही पूरा जीवन महकने लगता है । जीवन में आशा होठों पर हँसी सरीखी है । अँधेरे में प्रकाश की रेखा है । रेगिस्तान की पीठ पर नदी की झूल है । बूढ़े पेड़ के हाथों जैसे किसी ने मुट्ठी भर फूल रख दिये हों । आशा का खिलना जैसे पलाशों की सुगंध से वन का महक-महक उठना । झुलसती धरती पर दूब का अँगड़ाई लेने लगना । खाली डिब्बे में जैसे रोटियों का भर जाना । आकाश की सड़क पर जैसे चंद्रमा का बहकते हुए चलना । सन्नाटे में जैसे मुट्ठी भर शब्द-बीजों का अँखुवाना । सूने आँगन में जैसे बेला का महकना । प्रतीक्षातुर क्षणों में जैसे घुँघरुओं का बज उठना और पतझड़ को धकेलकर वसंत का लहक उठना ।
आशा संघर्ष–पथ की प्रेरणा है । नियति की जकड़नों और विडंबनाओं से वही उबारती है । एक पथिक परदेश जा रहा है, शाम हो गयी । मंज़िल अभी दूर है । अँधेरा गहराने लगा-जंगल का सूना पथ । वह रास्ता भटक गया । अँधेरा इतना कि हाथ को हाथ न सूझे । पीछे सिंह दहाड़ रहा, आगे असूझ अँधेरा । वह भटकता रहा बड़ी देर । इतने में दूर कहीं एक दीपक टिमटिमाता दिखाई दिया । उन दुर्दांत क्षणों में आशा की एक किरण काँपी और मन को दीपक से जोड़ गयी । आशा ने मार्ग की सारी बाधाओं को पार करवा उसे देहरी के सामने लाकर खड़ा कर दिया, जहाँ दीपक जल रहा था ।
समुद्र की छाती पर नाव खेते मछुआरे दूर-दूर तक मछलियों की तलाश में चले जाते हैं । अपने प्रिय के लौटने की आशा में प्रिया मंजूषा में दीप रखकर समुद्र किनारे ऊँचा लटका देती है और कामना करती- “ यह दीपक उनका पथप्रदेशक बने ।” दहाड़ते सिंधु के थपेड़ों और अँधकार में फँसे नाविकों में दीप देखते ही आशा ही नाचने लगती । वे किनारा पा जाते । इस आशा ने हज़ारों-हज़ार धड़कनों को डूबनैे से बचाया है । उन्हें किनारे का सूख दिया है । जीवन के निविड़ अँधियारे में आशा की एक ज्योत-रेख सुबह के द्वार तक ले जाने में पर्याप्त है ।
प्रेम के मार्ग में दुःख सहते हुए प्रेमी अपना सब कुछ लुटा देता है । उसाँसे लेते-लेते शरीर का वायु तत्व निकल जाता है । आँसुओं में सारा नीर ढर जाता है । देह की कांति चली जाती है । शरीर हाँड का ढ़ाँचा मात्र रह जाता है और चारों तरफ शून्य भर जाता है । फिर भी प्रिय मिलने की आस नहीं टूटती । विरहिणी कौए से अपने शरीर का माँस खा जाने को कहती है, लेकिन आँखों के बारे में निवेदन हैः-
“कागा सब तन खाइहों, चुग-चुग खाइहों माँस । दो नैना मत खाइहों, प्रिया मिलन की आस ।।”
आशा के सहारे व्यक्ति पहाड़ जैसी जिंदगी काट देता है । एक विधवा अपने नन्हें बच्चों के भविष्य की आशा में जीवन की सारी पीड़ा और समाज का ज़हर पी जाती है । उसका बच्चा बड़ होगा, उसके दिन फिर लौटेंगे । पेड़, वसंत की आशा में पतझड़ की मार सह लेते हैं । रूखी और निर्वसन डालियों पर फिर श्रृंगार होता है । स्वर की देवी कोकिला फुदक-फुदक कर फिर राज करती है । मधुमास आता है ।
चातक की आस उसे एकनिष्ट बनाती है । उसके लिए नदी, सरोवर, समुद्र तुच्छ हैं । स्वाति बूँद की आशा में निरंतर बादलों की ओर देखता रहता है । एक दिन स्वाति के बादल घिरते उसकी तृष्णा तृप्त होती है ।
इतिहास पुरुषों की आशाओं में समूह-हित की विराटता छुपी हुई थी । उनकी आशाएँ पावस घन की तरह सब पर बरसकर व्यक्ति –व्यक्ति में हुमस भर देने का माद्दा रखती थीं । बादल करोड़ों को जीवन देने के लिए बरसकर मिट गये । स्वतंत्रता का एक –एक दीवाना भारत के कोरड़ो-लोगों पर न्यौछावर होता चला गया । महात्मा गाँधी, लोकमान्य तिलक, सुभाषचंद्र बोस और सैकड़ों नाम जिनके भीतर स्वतंत्रता की आस पलती रही । जुल्म सहते रहे । वीर सावरकर को अण्डमान निकोबार के पोर्ट व्लेयर की जेल में (कालापानी) एक ही कोठरी में नौ साल रखा गया । यह कोठरी तीसरी मंजिल पर थी । उसके नीचे फाँसी घर बना हुआ था । माँ भारती के जितने वीरों को फाँसी दी जाती थी, वीर सावरकर को कोठरी से बाहर निकालकर मृत्यु का वह ख़तरनाक खेल दिखाया जाता था । नौ साल में 87 शहोदों को उस जगह फाँसी दी गयी । सावरकर जंजीरों की टूटन की आस लिये यह त्रास झेल गये । एक अटूट आशा कि भारत माता के भाल पर स्वतंत्रता झिलमिलाएगी । इन अमर सेनानियों की आशाओं ने उन्हें खुद को राष्ट्र को समर्पित कर दिया था । उनका कुछ नहीं था । करोंड़ों लोगों से बने देश सुख-दुःख उनके भीतर कसमसा रहा था ।
किसान को सारी फसल नहीं मिलती है । पेड़ के सारे फूल उसके नहीं होते । सब रातें दीवाली नहीं होती । हर साँस सुख की नहीं होती । सब बादल नहीं बरसते । हर सुबह सूरज बेरोकटोक नहीं निकलता । हर ऋतु में वसंत की आशा नहीं होती । हर यात्रा सफलता का दावा नहीं कर सकती । आदमी की हर आशा पूरी नहीं होती । न जाने कितनी आशाएँ तो कुँवार की घाम में सूखती हुई घास की तरह कुड़-मुड़ जाती हैं । कितनी अकाल मौत मर जाती हैं । परिस्थितियाँ पंखों पर सवार हो इस तरह कसती हैं कि व्यक्ति की उड़ान रुक जाती है । पिछले तीन साल का आँखों का पानी तक सुखा डालने वाला सूखा और ऊपर से मँहगाई का वज्र । इस बरस थोड़ी उम्मीद है कि दीवाली के दियों में थोड़ा तेल डबरा जाए । बुजुर्ग कहते हैं –एक ज़माना था, पूरा घर दियों से जगममाता था। आज गृहसक्ष्मी दीयों की गिनती करती है-धनतेरस के तेरह, चौदस के चौदह और अमावस के दो-चार औऱ । इस संख्या में और कटौती हो रही है । धनतेरस-चौदस को पाँच-पाँच में ही काम चलेगा । अमावस को पन्द्रह । यह गिनती तब शुरू होती है, जब हाथ अधिक हों, काम कम । मुँह अनेक हों, चीजें थोड़ी । जरुरतें ज्यादा हों, साधन कम । चीज़ों के ढेर पर दो चार बैठे-बैठे गरिया रहे हों, बाकी जमात कटोरे बजाती हो । तब ही, ठीक तब ही आसा अपने जनम पर रोती है ।
आशा के भी अलग-अलग तेवर होते हैं । अलग-अलग तरह का पागलपन होता है । अलग-अलग क़िस्म का जुझारुपन होता है । एक आशा निरी वैयक्तिक होती है । इस तरह की आआस आदमी के हमेशा आसपास चलती है । आदमी की निजी ज़िंदगी के दायरों के भीतर अनेक तरह के रंगों के सूत्र रचती है । कभी-कभी यह अतिरिक्त मलतबपरस्त आदमी की आँख में मोतियाबिंद बनकर बैठ जाती है । यह आशा व्यक्ति को आगे ज़रूर बढ़ाती है, लेकिन इसके अंधेपन की वजह से आदमी ग़लत वस्तु की प्राप्ति ग़लत तरीके से और कभी-कभी सही स्थिति की प्राप्ति भी ग़लत साधनों से करने की कोशिश करता है । परिणाम में संसार से छिनकर व्यक्ति-केंद्रित होने लगते हैं । होता यह है कि चंद जिंदगियाँ गुलछर्रे उड़ाती हैं, और एक बड़ी बिरादरी जीवन की प्राथमिकताओं की ही मोहताज होती चली जाती है । ऐसी स्वार्थ लिपटी आशा हल्ला ज्यादा मचाती है । डमरू जोर से बजाती है, और समूह के बीच गफ़लत फैला जाती है । आम आदमी को सपने बाँटती है और यथार्थ का भोग खुद करती है । ऐसी दशा में ईमान का सत्य सड़क किनारे रुआँसा होकर टुकुर-टुकुर देखता रहता है । लेकिन यह रगड़घस्सा ज्यादा दिन तथा बहुत देर तक नहीं चलता । जन-जन के भीतर का तेल इकट्ठा होता है और आस को दीपक झकझका उठता है । काली रात में भी यह दीपक अँधेरे के चेहरे की एक-एक परत से करोंड़ो लोगों को वाकिफ कराता है । उन्हें सुबह तक चलते रहने के लिए तैयार करता है । उसके बाद जो सुबह आती है । उसकी ललाई और जीवन का एक रंग होता है । वह सुबह आएगी । उस दिन चिड़िया खिड़की से फुर्र से नहीं होगी....... बल्कि वह बिटिया के साथ आँगन में फुदकेगी और पूरे घर को सिर पर उठा लेगी ।
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इस लोक में मनुष्य से बढ़कर कुछ भी नहीं है- महाभारत |
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