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भोर का बावरा अहेरी पहले बिछाता है आलोक की लाल-लाल कनियाँ पर जब खींचता है जाल को बाँध लेता है सभी को साथः छोटी-छोटी चिड़ियाँ मँझोले परेवे
बड़े-बड़े पंखी
डैनों वाले डील वाले डौल के बैडौल उड़ने जहाज़ कलस-तिसूल वाले मंदिर-शिखर से ले तारघर की नाटी मोटी चिपटी गोल घुस्सों वाली उपयोग-सुंदरी बेपनाह कायों कोः गोधूली की धूल को, मोटरों के धुँए को भी पार्क के किनारे पुष्पिताग्र कर्णिकार की आलोक-खची तन्वि रूप-रेखा को और दूर कचरा जलाने वाली कल की उद्दण्ड चिमनियों को, जो धुआँ यों उगलती हैं मानो उसी मात्र से अहेरी को हरा देगी !
बावरे अहेरी रे कुछ भी अवध्य नहीं तुझे, सब आखेट हैः एक बस मेरे मन-विवर में दुबकी कलौंस को दुबकी ही छोड़ कर क्या तू चला जाएगा ? ले, मैं खोल देता हूँ कपाट सारे मेरे इस खँढर की शिरा-शिरा छेद के आलोक की अनी से अपनी, गढ़ सारा ढाह कर ढूह भर कर देः विफल दिनों की तू कलौंस पर माँज जा मेरी आँखे आँज जा कि तुझे देखूँ देखूँ और मन में कृतज्ञता उमड़ आये पहनूँ सिरोपे-से ये कनक-तार तेरे – बावरे अहेरी सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
बुनी हुई रस्सी को घुमायें उल्टा तो वह खुल जाती है
और अलग-अलग देखे जा
सकते हैं
उसके सारे रेशे
मगर कविता को कोई खोले तो उल्टा तो साफ़ नहीं होंगे हमारे अनुभव इस तरह क्योंकि अनुभव तो हमें जितने उसके माध्यम से हुए हैं उससे ज़्यादा हुए हैं दूसरे माध्यमों से व्यक्त वे जरूर हुए हैं यहाँ
कविता को बिखरा कर देखने से सिवा रेशों के क्या दिखता है लिखने वाला तो हर बिखरे अनुभव के रेशे को समेट कर लिखता है ! भवानी प्रसाद मिश्र
एक मारवाड़ी मुनीम जमुहाई लेता हुआ कुंजी का गुच्छा खोंसे अपनी टेंट में चलता चला चलता है दुकान की ओर बही खोल लिखता है श्री गणेशाय नमः, शुभ-लाभ । जमुहाई लेकर फिर एक बार जोरसे कहता है- ऊँ नमः शिवाय !
पटरी पर खड़ी एक गाय
रँभाती है गली से एक स्त्री हाथ में झा़डू सिर पर टोकरा लिये आती है ।
सड़क पर धूल, आँख में कीचड़ पेड़ पर धूप धोती पर दाग चौके में धुआँ अचानक हर घर में सुबह फट पड़ती है । एक बिल्ली मुँडेर पर बैठी हुई दूसरी बिल्ली से झगड़ती है
दुकानें खुलती हैं । श्रीकांत वर्मा
माधवी के नीचे बैठा था कि हठात् विशाखा हवा आयी और फूलों का एक गुच्छ
मुझ पर झर उठा; माधवी का यह वृक्षत्व मुझे आकण्ठ सुगंधित कर गया ।
उस दिन एक भिखारी ने भीख के लिए ही तो गुहारा था और मैंने द्वाराचार में उसे क्या दिया ?- उपेक्षा, तिरस्कार और शायद ढेर से अपशब्द । मेरे वृक्षत्व के इन फूलों ने निश्चय ही उसे कुछ तो किया ही होगा, पर सुगंधित तो नहीं की ।
सबका अपना-अपना वृक्षत्व है ।
नरेश मेहता
धधकती धूप में रामू खड़ा है खड़ा भुलभुल में बदलता पाँव रह रह बेचता अख़बार जिसमें बड़े सौदे हो रहे हैं ।
एक प्रति पर पाँच पैसे
कमीशन है,
और कम पर भी उसे वह बेच सकता है अगर हम तरस खायें, पाँच रूपये दें अगर ख़ैरात वह ले ले ।
लगी पूँजी हमारी है छपाई-कल हमारी है ख़बर हमको पता है, हमारा आतंक है, हमने बनायी है यहाँ चलती सड़क पर इस ख़बर को हम ख़रीदें क्यो ? कमाई पाँच दस अख़बार भर की क्यों न जाने दें ?
वहाँ जब छाँह में रामू दुआएँ दे रहा होगा ख़बर वातानुकूलित कक्ष में तय कर रही होगी करेगी कौन रामू के तले की भूमि पर कब्ज़ा ।
रघुवीर सहाय
पेड़ों ने इतने पत्ते गिराए तब भी ,
हमारे
होश, ठिकाने नहीं आए । हम आँखें मूंदे, करते रहे कल्पना- वसंत की और प्रकृति नंगी हो गई.......।
मुझे उन पौधों को बचाना था मैंने उनकी कलमें यहाँ - वहाँ जहाँ - तहाँ जहाँ भी जगह मिली- वहाँ सब जगह रोप दीं।
जब हवा विपरीत हो मौसम प्रतिकूल जब एक पूरी कौम का अस्तित्व खतरे में पड़ा हो तो ऐसा करना लाजिमी हो जाता है! इला प्रसाद
लेकर पर परिंदो के, आसमान में उड़ना चाहती हूँ, बनके बूँदें ओस की मैं, पीपल के पत्तों पे सोना चाहती हूँ, बनके ख्वाब मैं आँखों का, पलकों पे कोना चाहती हूँ, बनके वाणी में संतों की,
ग्रंथों में होना चाहती हूँ, बनके लहर मैं सागर की, साहिल पे उमड़ना चाहती हूँ, बनके दुआ मैं होठों की, बस दिल से निकलना चाहती हूँ, बनके शमां मैं यादों की, रातों में पिघलना चाहती हूँ, मधुर आवाज लिए मैं कोयल की, बागों में चहकना चाहती हूँ, महक लिए मैं फूलों की, गुलिस्ता में महकना चाहती हूँ, बनके आंचल मैं दुल्हन का, सर से सरकना चाहती हूँ, बनके जाम मैं प्यालों का, आँखों में छलकना चाहती हूँ, बनके चाँदनी चाँद की, रातों में चमकना चाहती हूँ, जो मैं चाहती हूँ, क्यों चाहती हूँ ? जो हो नहीं सकता, बस नहीं मैं चाहती हूँ ?
रिम्मी बेदी
मुझे यह तो याद नहीं पहली बार यक्ष ने कब घेरा था और क्या पूछा था पर जो भी पूछा था उसका उत्तर नहीं था मेरे पास। अब जब से अकेला हो गया हूँ अक्सर खड़ा हो जाता है सामने और नंगा कर देता है।
कई
बार उसके डर से कमरे का बल्ब भी बुझाया है पता नहीं कहाँ से नाइट-बल्ब की तरह टिमटिमा जाता है! आते ही सवालों की रोशनी फेकने लगेगा। बार-बार चादर से जिस्म को अंधेरे में ले जाता हूँ। पर ज़मीर को ये मंजूर नहीं उसको घुटन होती है बंद हवाओं में कहता है- तड़पने दो मुझे बचपन पॉलीथीन बीन रहा है जिम्मेदारी कौन लेगा? माँ और बहनें छली जा रही हैं सुरक्षा कौन करेगा? दुश्मन सेंध लगा रहा है रखवाली कौन करेगा? बहूयें जल रही हैं अग्निशमक कौन बनेगा? भाई आतंकवादी हो गया दोषी कौन? बाहुबली सीना फाड़ते हैं अपराधी कौन? नेता देश बेच रहे हैं पापी कौन? शैलेश भारतवासी
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