सृजन-गाथा

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

E-mail-srijangatha@gmail.com   

 

 

 

अंक-4,सितंबर, 2006   

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतर संस्कार पुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

कविता

 

  बावरा अहेरी-अज्ञेय बुनी हुई रस्सी- भवानी प्रसाद मिश्र

 दिनारंभ- श्रीकांत वर्मा वृक्षत्व- नरेश मेहता अख़बारवाला- रघुवीर सहाय

पतझड़/कौम- इला प्रसाद  मैं चाहती हूँ- रिम्मी बेदी पापी कौन ?- शैलेश भारतवासी

 
 

 

माह के कवि

प्रभात त्रिपाठी

 

एक आदमी

 

एक आदमी सिर पर पत्थर रखकर जा रहा था

इसका दूसरा मतलब यह भी है

कि वह सिर पर ईश्वर रखकर जा रहा था

तीसरा मतलब भी है

कि वह जा रहा था बाजार

भगवान की मूरत बेचने

 

एक आदमी जेठ की तीखी धूप में

पत्थर के टुकड़ों से भरे भागते ट्रक में

सोया था चुपचाप

इसका दूसरा मतलब यह भी है

कि वह ईश्वर के टुकड़ों से भरे भागते ट्रक में

सोया था चुपचाप

तीसरा मतलब भी है

वह एक विशाल पत्थर को

टुकड़े-टुकड़े करता रहेगा

जीवन-भर

एक छोटी शांत नींद के लिए

 

ईश्वर निर्मित पत्थर के नीचे

पत्थर निर्मित ईश्वर के नीचे

सदियों से दबा एक आदमी

लिखता है अपने पुण्य, अपने पाप

इसका जो चाहें वो मतलब

आप ख़ुद निकालें माई बाप !

 

 

आवाज़

 

दूर से आती है कोई आवाज़

कोई आकार बनाने की कोशिश करता हूँ

झरती है रात की ख़ामोशी

झरती है ओस

अदृश्य

फिर जाती है पेड़ पर नज़र

 

ऊपर आकाश तना है

दूज के चाँद

शीत के सितारों से भरी

एक सूरम्य रहस्यमयता में

कोई परिचित धुन तिरती है

हवा के पंखों पर सवार

 

शायद यही है आकार

दूर से आती आवाज़ का

शायद यही है रंग

यही है नाम

आज रात

ख़ामोशी के अनिर्धारित समय में

अनाकार अदृश्य अबूझ

मेरा स्वप्न

शायद यही है ।

 

 कारीगर और मैं

 

चंदन के काठ की कलम जिसने बनाई

क्या उसे आता है लिखना ?

 

सोचा मैंने एक पल

लिखा मैंने एक शब्द

अपने मन में

 

जंगल जल गया कहीं दूर

बदहवास दौड़ा कारीगर

शहर की ओर

शहर तैयार था

बंदूकों से लैस

उसने कारीगर से कहा

चुप रहो

चुपचाप करो अपना काम

मत लिखो, मत लिखो

अपना नाम

 

सचमूच गूँगे की तरह

एक शब्द बोले बिना

उसने बनाई कलम

मैंने खरीदी

और दूसरे पल

अपनी सफेद क़मीज में

शान से लटकाकर नई कलम

चला गया

बंदूकधारी को सैल्यूट मारने ।

 

पृथ्वी की भंगुर सतह पर

 

हजार बरस पहले के तारे को

देख रहे हैं हम अभी

खिलखिलाती किसी मुक्ता की हँसी में

इस पेड़ के नीचे

 

हजार बरस बाद

औरत के रसोईघर

बेटे की नींद के समय में

हम पाते हैं

अपनी प्रार्थना का एकांत

 

वृक्ष के विनम्र मौन में

गढ़ते अपने आकार की तुच्छताएँ

हम खड़े हैं

विस्फोटों की ढूह पर

निर्विकार शांत

 

लपलपाती घृणा से बेखबर

हम अपनी माँद में

खोज रहे हैं

अपना पूजाघर

 

हजार बरस पहले

हजार बरस पहले

पृथ्वी की भंगुर सतह पर

हम खिलाते हैं फूल

कमल के !

अँधेरा

 

अभी यहाँ अँधेरा है

 

मैं बैठा हूँ कुछेक बूढ़े वृक्षों को ताकता

गुमनामी के अनंत में

 

चारों तरफ शहर है

थोड़ा सुस्त थोड़ा उदास भी

शायद मेरी तरह सोच में डूबा

शायद मेरी तरह अकेला

आकाश के चमकते सितारों को ताकता

वह भी यहाँ बैठा है

मेरे क़रीब

अपने घर के बरामदे पर

गुमनामी के अनंत में

 

अभी मेरे शहर में अँधेरा है ।

 

 

 

पक्के ज्ञान की एकमात्र पहचान है सिखाने की शक्ति- अरस्तू

आपकी प्रतिक्रिया

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतर संस्कार पुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, आदेश ठाकुर चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

तकनीकः प्रशांत रथ