सृजन-गाथा

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अंक-4, सितम्बर, 2006  

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कहानी

 

हानी

ईंटों का जंग- तेजेन्द्र शर्मा

जिन्दगी एक पहेली- बालशौरि रेड्डी

 

 

जिन्दगी एक पहेली


बालशौरि रेड्डी

 

             दोस्त ! एक हजार रुए का इंतजाम कीजिए । बड़ी मुसीबत में पड़ा हूँ । बच्चे स्कूल-फीस और किताबों के लिए तंग कर रहे हैं । आखिरी दिन हैं । किसी भी हालत में फीस जमा करनी है। नहीं तो प्रवेश नहीं मिलेगा । कल पर टालते हुए कितने दिन उन्हें समझा सकता हूँ ?  आप दफ़्तर में अग्रिम लेकर ही सही, इस बार मेरा बेड़ा पार लगा दीजिए । लीजिए, इस वाउचर पर दस्तखत करके दे दीजिए । तुरन्त मैं लेखा-विभाग में भिजवा दूँगा । शाम तक पैसे मिल जायेंगे । गोपल एक साँस में कहे जा रहा था। मैं प्रस में मैटर भेजने के लिए पाण्डुलिपि ठीक करने में मशगूल था।

 

       रुपये मांगते हुए गोपाल का अनुरोध करना शायद यह दसवीं बार था। लेकिन मुझे लगता कि-वह यही पहली बार ही मुझे अपनी विपदा की कहानी सुना रहा है। हर बार वह कोई न कोई समस्या लेकर मेरे पास फटकता और बातचीत के दौरान अपने गृहस्थ जीवन की गहराइयों से मुझे अवगत कराता। मजे की बात यह है कि गोपाल की समस्या में हर बार नए रूप में प्रस्तुत होता हैं । आश्चर्य इस बात का है कि उसने इस तरह की अनेक समस्याओं को बड़ी आसानी से हल कर लिया है। असंख्य समस्याओं को बड़ी आसानी से जुड़े अनेक वर्षों को उसने अपनी जिन्दगी में बड़ी सुगमता से पार कर लिया है।

 

       गोपाल का अपना खास सिद्धान्त है-कष्टों का सामना तो मनुष्य को ही करना पड़ता है, वृक्षों को नहीं। उसका मानना है –‘मानव जीवन फूलों की सेज नहीं, कांटों का ताज भी होता है । विपदाओं से डरकर जीवन से पलायन करना निरी मूर्खता है । यातना रूपी आंधियों का उसने एक महापर्वत की भांति स्थर रह कर हिम्मत के साथ सामना किया है। विपदा के समय विचलित हुए बिना उनसे जूझने में ही वह आनन्द की अनुभूति पाता है।  गोपाल की आज की समस्या भी उसी परम्परा की एक कड़ी है। उसकी यह समस्या मात्र एक हजार रुपये से हल होने वाला नहीं है। और न वह अपना सारा बोझ किसी एक व्यक्ति के सर पर डालकर उसे दबाने की बात कभी सोच नहीं सकता है। आधे दर्जन से अधिक बच्चों के लिए स्कूल-फीस और स्पेशल फीस, चुकाने के साथ उन्हें बर्दी और किताबें भी खरीद कर देनी है।  इसीलिए गोपाल ने सही मौके पर ही इस बात को भलीभांति हृदयंगम कर लिया कि मुझ जैसे कुछ व्यक्तियों के साथ निरन्तर यों सम्बन्ध  निभाये रखना बहुत ही आवश्यक है। उसके मांगने पर मना करने में सब कोई संकोच करते हैं । तिसपर किसी न किसी रूप में उस के लिए रुपयों का प्रबंध करना अपना कर्त्तव्य समझते हैं ।

 

       गोपाल का दिमाग कम्प्यूटर की भाँति न केवल भविष्य में उत्पन्न होने वाली समस्या को भी भांपता है, बल्कि उसके निराकरण की उपाय भी सुझाता है। इंधर अचानक उसके भीतर जो बहुत बड़ा परिवर्तन आया है, उसने विशेष रूप से मेरा ध्यान आकष्ट किया । सहज रुप में गोपाल परम्परावादी है। प्राचीन सम्प्रदायों के प्रति उसके मन में विशेष आदर है । लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह लकीर का फकीर है । समय और संदर्भ के अनुरुप व्यवहार करने में वह माहिर है और दूसरों को मौके पर सलाह देकर उसका प्रतिफल पाने में भी वह संकोच नहीं करता । सुबह जब वह घर से दफ़्तर के लिए निकल पड़ता है तब गाड़ी में ताश खेलकर अपना जेब खर्च कमा लेता । उसका एक अतिरिक्त पेशा है। रुपये कमाने के लिए यदि कोई भी रास्ता निकल आता है, तो उससे फायदा उठाने से वह कभी नहीं चूकता।

 

       गोपाल धन कमाने के लिए चाहे जो भी गलत- सलत रास्ता अपनाता हो, लोकिन धर्म और आचार व्यवहारों के प्रति उसके मन में अकथनीय विश्वास और निष्ठा है। वह गत पचीस वर्षों से गृहस्थी का सागर तैरता हुआ आ रहा है। इस सारे अनुभव के बावजूद भी उसके दैनिक जीवन में प्रत्येक घटना एक समस्या बनती जा रही है।

 

       उसके आधे से अधिक दर्जंन सन्तानें हैं । आज तक वह इस विश्वास के बल पर  विपदाओं का समाना करता आया । जो बीज बोता है, वह खींचता भी है। अब उसे अपनी पत्नी के साथ साथ एक दर्जन प्राणियों को पालना भी  है। बच्चों के लिए कपड़े खरीदना हो तो मीटरों के हिसाब से नहीं, थान-के-थान किताब और नोटबुकों के लिए एक दुकान ही खोलनी पड़ेगी । गोपाल के परिवार को एक छोटी-सी कॉलोनी के समान मानना पड़ेगा।

 

       एक व्यक्ति इतनी सारी समस्याओं का हल कैसे निकाल सकता है ? इस प्रकार की कई जटिल समस्याओं ने गोपाल की मान्यताओं तथा विचारों को एकदम झकझोर दिया । उसने अच्छी तरह से इस नग्न सत्य को हृदयंगम कर लिया कि कोई भी सिद्धन्त व्यक्ति के सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियों पर आधारित होता है। उसका विचार है कि यदि व्यक्ति देश, काल और स्थितियों के अनुरूप अपने को नहीं ढालता तो वह जीवन के संग्राम में हार खाएगा  । उसके भीतर ये परिवर्तन देखकर मुझे अत्यन्त आश्चर्य हुआ ।

 

       अब सवाल यह है कि गोपाल इन सारे कष्टों का सामना कैसे कर पा रहा है। उसने वार्तालाप के संदर्भ में एक बार मुझसे कहा था कि थोड़ी बहुत पैतृक सम्पत्ति उसे वारिस के रूप में प्राप्त हुई है।

 

       मैने पूछा-गोपाल, तुम्हारे खेत में जो धान की फसल होती है, क्या तुम्हारे पूरे परिवार के लिए पर्याप्त है।यदि अच्छी फसल हो जाती है, तो हमें साल भर खाने को कोई तकलीफ नहीं होती । गोपाल ने सहज भाव से उत्तर दिया।

 

       तुम्हारी तनख्वाह बच्चों के कपड़े-लत्ते ,फीस, किताबें और ऊपरी खर्च के लिए पर्याप्त होती है न ?

       मेरा सवाल सुनकर गोपाल का चेहरा गम्भीर हो गया । उसने पुनः अपनी व्यथा-गाथा सुनाना शुरू किया ।

दोस्त, दिन तो किसी-न-किसी तरह गुज़र ही जाता है। समय किसी के लिए नहीं रूकता। दरअसल मेरी सबसे बड़ी चिन्ता बड़ी बेटी की है। वह शादी के योग्य हो गई है । अब बिलम्ब किये बिना उसकी शादी करनी होगी। चाहे गरीब- से-गरीब बर के साथ रिश्ता कायम करूँ । पन्द्रह-बीस हजार रुपये दहेज में देने होंगे । उल्टे जेवर, कपड़े आदि शादी का खर्च भी है। एक कन्या की शादी के पीछे पुरखों से प्राप्त जमीन-जायदाद बेच डालूँ तो बाकी पांच लड़कियों का क्या होगा? और शेष लड़कों का पालन-पोषण कैसे करूँगा ?

 

तो एक काम करो । सब बच्चों को पढ़ाओ-लिखाओं गरीब परिवारों के शिक्षित युकों से शादी रचाओ।

आपका सुझाव अच्छा है। मैं भी यही सोच रहा हूँ, लेकिन पहली कक्षा से लेकर दसवी कक्षा तक पढ़ने वाले बच्चे हैं। उनके लिए फीस, किताबें और यूनिफार्म जुगाड़ करने में मेरी नानी मर रही है ।

 

तो एक काम करो । अब भी कुछ बिगड़ा नहीं है। परिवार नियोजन के दफ़्तर में जाकर सलाह क्यों नहीं लेते ।

 

दोस्त, आप यह क्या कह रहे हैं? यह सब हम लोगा का भ्रम है। हम भगवान के हाथ के खिलौने हैं । ये सब उन्हीं की अनुग्रह है। जो होना है सो होगा ही । किस्मत में जो बदा है, उसे बदलने वाले हम कौन होते मैं ? मैं ऐसा काम नहीं कर सकता। लेकिन इस वक्त मेरी अहम समस्या यही है कि तत्काल कन्या की शादी करनी ही होगी। बिरादरी में मैं सर उठाकर चल नहीं पाता लेकिन कोई मेरी कन्या के साथ बिना दहेज लिये शादी करने को तैयार नहीं है । मैं अपने बच्चों को समझाता हूँ कि तुम लोग किसी मुखर्जी, चटर्जी, मनन, वर्मा, शर्मा, नायुडू या रेड्डी के साथ प्रणय-विवाह कर लो। वरना इन झंझटों से मुझे मुक्ति महीं मिलेगी । शेष लड़कियों की शादी में अभी कोई जल्दी नहीं है । उन्हें पढ़ा-लिखाकर शिक्षित बनाऊँगा । इस बीच समाज की रीति-नीतियों में भी बदलाव आयेगा । दहेज की समस्या भी अपने आप हल हो जायेगी । हमने आज तक अपनी जिन्दगी की गाड़ी किसी न किसी तरह खींच ली है । हमारे बच्चों का भविष्य सुनहला होगा । इसी हिम्मत और आत्मविश्वास के साथ अपने दिन काट रहा हैँ । हम भविष्य की चिन्ता में वर्तमान को क्यों दुःखमय बनायें । कह नहीं सकता कि मैं उस वक्त तक जिन्दा रहुँगा या नहीं? इस दुनियां में कौन किसका अपना होता है। जब तक हम लोग जिन्दा हैं तब तक माता-पुता, पत्नी-बच्चे बन्धु-बान्धवों का रिश्ता जोड़ते हुए उन्हें सुखी देखने के सपने पालते रहते हैं । वे छटपटाते हैं, लेकिन जब हमारी यह सांस रुक जाती है और यह शरीर निर्जीव हो जाता है,प्राण पखेरु उड़ जाता है तो फिर क्या है ? यह दुनियाँ केवल भ्रम है, मायाजाल है । दुनियां के साथ हमारे सारे बन्धन कट जाते हैं। इसके बाद सुख-दुःख से जुझना होगा । घर ग्रहस्थी के मायाजाल में फँसकर हम लोग इस मृग-मरीचिका के पीछे दौड़ रहे हैं ।  जिन्दगी की इन जटिल समस्याओं को सुलझाने में ही मेरी सारी उम्र कट जायेगी । इससे जूझना ही होगा । मेरे जीवन का अपना कोई लक्ष्य नहीं रहा । आखिर मैनें जीवन में क्या पाया ?  यह भी कोई जिन्दगी है ? लोग कहते हैं यह भूतल स्वर्ग है।  लेकिन मुझ जैसे व्यक्ति के लिए यह नरक बना हुआ है । चाहे हम वेद, पुराण, उपनिषदों और काव्यों में प्रतिपादित सुन्दर सुक्तियों को भले ही रटते रहें, उससे जीवन में कोई बदलाव आने वाला  नहीं है । मेरा तो अन्तिम निष्कर्ष यही है कि जब तक सामाजिक व्यवस्था में पूर्ण रुप से बदलाव नहीं होता तब तक जीवन के लिए कोई सुरक्षा नहीं होगी । मुझे जैसे व्यक्तियों को कोल्हू के बैल की भांति ज़िन्दगी जुए को ढोते रहना होगा । इसके अतिरिक्त मालूम, कोई सही फार्मूला हो सकता है, मैं सोच नहीं पाता हूँ ।

 

दरअसल,गोपाल की जिन्दगी सहानुभूति दिखाने लायक है। मुझे जैसे लोग यदि उस के प्रति सहानुभूति दिखाते हैं तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है इसके अतिरिक्त हम लोग कर भी क्या सकते है ? इस समस्या का समाधान क्या होगा और हल कैसा, क्योंकि स्वयं यह जिन्दगी एक पहेली जो है।

 

जीवन एक आश्चर्य श्रृंखला है- एमर्सन

आपकी प्रतिक्रिया

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, आदेश ठाकुर चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

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