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प्रेमचंद विश्व
साहित्य परिदृश्य के महानायक
रायपुर,भारत
। छत्तीसगढञ राष्ट्रभाषा प्रचार सिमिति ने कालजयी कथाकार मुंशी प्रेमचंद
की जयंती
पर उनके विराट कथा संसार का स्मरण करते हुए उन्हें युग-युग तक
प्रासंगिक रहने वाले कथाकार की संज्ञा दी। प्रेमचंद को कभी
खारिज नहीं कर सकने की बात मुख्य अतिथि डॉ. बलदेव ने की।
कार्यक्रम की अध्यक्षता हसन खान ने की।
वैभव प्रकाशन में आयोजित गोष्ठी में डॉ. सुधीर शर्मा ने सबका
स्वागत किया। इस अवसर पर डॉ. चित्तरंजन कर ने कहा कि प्रेमचंद
लोगों में इतने प्रिय क्यों हुए, उनके कारकों की जाँच करनी
चाहिए। वे विषयवस्तु के चयन में सिद्धहस्त थे। तुलसी की तरह
वे भी जन-जन के मध्य से वि षय
तलाशते थे। प्रेमचंद ने जनता को अपना नायक चुना। जन को आत्मसात
करना उन्हें विश्वख्यित की ओर ले जाता है। प्रेमचंद
साहित्य
के अनुवाद में निरंतर व्यंजनाएं पैदा करती हैं। सद्भावना दर्पण
के संपादक गिरीश पंकज ने कहा कि प्रेमचंद स्वयं
साहित्य-परिदृश्य के महानायक हैं। वे गद्य के
कवि लगते हैं। साहित्य का केन्द्र आज भटक गया है, ऐसे दौर में
प्रेमचंद साहित्य का पुनर्सृजन होना चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार
बसंत तिवारी ने कहा कि युवा पीढ़ी को प्रेमचंद के साहित्य का
पाठ अवश्य करना चाहिए। डॉ. शोभाकांत झा ने प्रेमचंद की
प्रासंगिकता की व्याख्या की। डॉ. उर्मिला शुक्ल ने कहा कि फाइव
स्टार होटलों में बैठकर गाँवों पर लिखा जा रहा है। आज प्रेमचंद
की युगीन परिस्थितियाँ भयावह होती जा रही हैं।
गोष्ठी में डॉ. मधुलता केरकेट्टा, डॉ. शैल
शर्मा, माधुरी कर, बसंत दीवान, चंदूभाई रायचुरा, के.के. सिंह,
चेतन भारती, पी. अशोक शर्मा, डॉ. तृषा शर्मा, भारती बंधु,
जागेश्वर प्रसाद, रामेश्वर शर्मा, डॉ. शोभाकांत
झा, आदेश ठाकुर, जल कुमार मसंद, एच.एस.ठाकुर, डॉ. जे.आर.सोनी,
रामनारायण भट्ट, सुश्री रूमा जोशी आदि शामिल थे। राम पटवा ने
संचालन और जयप्रकाश मानस ने आभार प्रकट किया।

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