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हाथ पर आसमान
लोग ऊँची उड़ान रखते हैं हाथ पर आसमान रखते हैं
शहर वालों की सादगी देखो- अपने दिल में मचान रखते हैं
ऐसे जासूस हो गए मौसम- सबकी बातों पे कान रखते हैं
मेरे इस अहद में ठहाके भी- आसुओं की दूकान रखते हैं
हम सफ़ीने हैं मोम के लेकिन- आग के बादबान रखते हैं
कर्फ़्यू का मारा शहर
दोस्ती में अदावत का डर दोस्तो रफ़्ता-रफ़्ता करेगा असर दोस्तो
वो धुआं है तो फिर उड़के खो जाएगा आदमी है तो आएगा घर दोस्तो
मेरे अंदर है बैचेन-सी हर गली मैं हूँ कर्फ़्यू का मारा शहर दोस्तो
भोर का वो सितारा विदा हो गया मेरे हाथों पे रखके सहर दोस्तो
बीच में एक अर्जुन पशेमान था कुछ इधर भाई थे, कुछ उधर दोस्तो
छेद ही छेद उसके सफ़ीन में थे और पानी पे था उसका घर दोस्तो
ख़ुद से मुँह छुपाके
पत्थर उठाके झील में वो फेंकता रहा पानी को छटपटाता हुआ देखता रहा
मत जो कड़ी है धूप, ज़रा छाँव मे ठहर रस्ते का एक पेड़ मुझे रोकता रहा
बारिश में भीगता हुआ बालक गरीब का लोगों की छतरियों को खड़ा देखता रहा
मैं उससे आगे बढ़ गया जिसकी न थी उम्मीद मेरा नसीब पीछे मेरे हाँफता रहा
रोटी है एक लफ़्ज या रोटी है इक खुशी ये प्रश्न अपनी भूख से मैं पूछता रहा
जब ये खबर हुई मुझे मैं आइना भी हूँ तो खुद से मुँह छुपाके कहीं भागता रहा
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अँधेरे की पुरानी चिट्ठियाँ
हाथ में लेकर खड़ा है बर्फ़ की वो सिल्लियाँ धूप की बस्ती में उसकी हैं यही उपलब्धियाँ
आसमा की झोपड़ी में एक बूढ़ा माहताब पढ़ रहा होगा अँधेरे की पुरानी चिट्ठियाँ
फूल ने तितली से इकदिन बात की थी प्यारकी मालियों ने नोंच दीं उस फूल की सब पत्तियाँ
मैं अंगूठी भेंट में जिस शख्स को देने गया उसके हाथों की सभी टूटी हुई थी उँगलियाँ
टूटे हुए पर की बात
कभी दीवार कभी दर की बात करता था वो अपने उज़ड़े हुए घर की बात करता था
मैं ज़िक्र जब कभी करता था आसमानों का वो अपने टूटे हुए पर की बात करता था
न थी लकीर कोई उसके हाथ पर यारो वो फिर भी अपने मुकद्दर की बात करता था
जो एक हिरनी को जंगल में कर गया घायल हर इक शजर उसी नश्तर की बात करता था
बस एक अश्क था मेरी उदास आंखों में जो मुझसे सात समंदर की बात करता था
ददिल्ली शिकागो बन रही है
लड़ाई अब हमारी ठन रही है कि अब दिल्ली शिकागो बन रही है
तुम्हारी ऐशगाहों से गलाज़त बड़ी वेशर्म होकर छन रही है
ग़रीबों की ख़ुशी भी दरहकीकत- नगर के सेठ की उतरन रही है
ये मेरी देह को क्या हो रहा है किसी तलवार जैसी बन रही है
गज़ब किरदार है उस झोपड़ी का जो आँधी के मुकाबिल तन रही है
लहू से चित्रकारी कर रहे हैं ये बस्ती खूबसूरत बन रही है
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