सृजन-गाथा

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अंक-4,सितंबर, 2006   

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतर संस्कार पुस्तकायन

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छंद

 

।। पाकिस्तानी ग़ज़ल ।।

 परवीन शाकिर इफ़्तिख़ार आरिफ़   हिमायत अली शायर बाक़ी सिद्दीकी

क़तील शिफ़ाई अनवर शऊर फ़ारिग़ बुखारी

 

 

 

 

 

तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा

 

बिछड़ा है जो एक बार तो मिलते नहीं देखा

इस जख़्म को हमने कभी सिलते नहीं देखा

 

इस बार जिसे चाट गई धूप की ख्वाहिश

फिर शाख पे उस फूल को खिलते नहीं देखा

 

यक लख्त गिरा है तो जड़े तक निकल आईं

जिस पेड़ को आँधी में भी हिलते नहीं देखा

 

काँटों में घिरे फूल को चूम आयेगी तितली

तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा

 

किस तर्ह मेरी रूह हरी कर गया आख़िर

वो ज़हर जिसे जिस्म में खिलते नहीं देखा

 परवीन शाकिर

 

 

जिस मकान में रहता हूँ उसको घर कर दे

 

मेरे ख़ुदा मुझे इतना तो मोतबर कर दे

मैं जिस मकान में रहता हूँ उसको घर कर दे

 

ये रोशनी के तआक़ुब में भागता हुआ दिन

जो थक गया है तो अब उसको मुख़्तसर कर दे

 

मैं ज़िंदगी दुआ माँगने लगा हूँ बहुत

जो हो सके तो दुआओं को बे-असर कर दे

 

सितारा-ए-सहरी डूबने को आया है

ज़रा कोई मेरे सूरज को बा-ख़बर कर दे

 

क़बीला-वार कमानें कड़कने वाली हैं

मेरे लहू की गवाही मुझे निडर कर दे

 

मैं अपने ख़्वाब से कट कर जियूँ तो मेरा ख़ुदा

उजाड़ दे मेरी मिट्टी को दर-ब-दर कर दे

 

मेरी ज़मीन मेरा आख़िरी हवाला है

सो मैं रहूँ न रहूँ इसको बार-वर कर दे

इफ़्तिख़ार आरिफ़

 

 

काँटों का ताज सिर पे सजाए रहेंगे हम

 

जब तक ज़मीं पे रेंगते साए रहेंगे हम

सूरज का बोझ सिर पे उठाए रहेंगे हम

 

खुलकर बरस ही जाएँ कि ठंड़ी हो दिल की आग

कब तक ख़ला में पाँव जमाए रहेंगे हम

 

झाँकेगा आईनों से कोई और जब तलक

हाथों में संगो-ख़िश्त उठाए रहेंगे हम

 

इक नक़्शे-पा की तरह सही इस ज़मीन पर

अपनी भी एक राह बनाए रहेंगे हम

 

जब तक शाख़-शाख़ के सिर पर हो ताजे-गुल

काँटों का ताज सिर पे सजाए रहेंगे हम

 हिमायत अली शायर

 

 

आग शहर की अब आ गई है गाँव में

 

ख़बर कुछ ऐसी उड़ाई किसी ने गाँव में

उदास फिरते हैं हम बेरियों की छाँव में

 

नज़र-नज़र से निकलती है दर्द की टीसें

क़दम-क़दम पे वो काँटे चुभे हैं पाँव में

 

हर एक सम्त से उड़-उड़ रेत आती है

अभी है ज़ोर वही दश्त की हवाओं में

 

ग़ूमों की भीड़ में उम्मीद का वह आलम है

कि जैसे एक सख़ी हो कई गदाओं में ।

 

अभी है गोश-बर-आवाज घर का सन्नाटा

अभी कशिश है बड़ी, दूर की सदाओं में

 

चले तो हैं किसी आहट का आसरा लेकर

भटक न जाएँ कहीं अजनबी फ़ज़ाओं में

 

धुआँ-धुँसा-सी है खेतों की चाँदनी बाक़ी

कि आग शहर की अब आ गई है गाँव में

बाक़ी सिद्दीकी

 

 

काम आ गई दीवानगी अपनी

 

तुम्हारी अंजुमन से उठ के दीवाने कहाँ जाते

जो वाबस्ता हुए,तुमसे,वो अफ़साने कहाँ जाते

 

निकलकर दैरो-काबा से अगर मिलता न मैख़ाना

तो ठुकराए हुए इंसाँ खुदा जाने कहाँ जाते

 

तुम्हारी बेरुख़ी ने लाज रख ली बादाखाने की

तुम आँखों से पिला देते तो पैमाने कहाँ जाते

 

चलो अच्छा काम आ गई दीवानगी अपनी

वगरना हम जमाने-भर को समझाने कहाँ जाते

 

क़तील अपना मुकद्दर ग़म से बेगाना अगर होता

तो फर अपने पराए हम से पहचाने कहाँ जाते

क़तील शिफ़ाई

 

*

 

कैसे-कैसे शहर मिट्टी में मिला देती है आग

 कुछ लकीरें रोज़ नक़्शे से मिटा देती है आग

कैसे-कैसे शहर मिट्टी में मिला देती है आग

 

दिल जो अब इस दर्जा वीराँ है कभी आबाद था

इश़्क है इक आग, क्या से क्या बना देती है आग

 

जो कली खिलती है क्यारी में जला देती है धूप

जो दिया जलता है धरती पर बुझा देती है आग

 

जिंदा रहना जलते रहने के बराबर है मगर

ज़िंदगी इक आखग है कुंदन बना देती है आग

 

एक बच्चा भी मिला झुलसे हुए अफ़राद में

पेड़ के हमराह गुल-बूटे जला देती है आग

 

याद अव्वल तो अब आती ही नहीं उसकी शऊर

और आती है तो सीने में लगा देती है आग

 अनवर शऊर

 

 

 

चेहरे उगाने को आईने हैं बहुत

 मुहब्बतों के सफ़र में जतन किए हैं बहुत

हवा की हमक़दमी में भी हम चले है बहुत

 

मुसाफिरों के लिए मंजिलें उदास न हों

अभी जुनूँ की मुसाफ़त में काफ़िले हैं बहुत

 

वो मो़ड़ लफ़्ज जहाँ साथ छोड जाते हैं

जुनूने-इश़्क में हमने भी तै किए हैं बहुत

 

भटक भी जाएँ मुसाफ़िर तो खो नहीं सकते

कि तेरे प्यार की मंज़िल के रास्ते हैं बहुत

 

अभी तो वक़्त की मुट्ठी में इतने जुगनू हैं

अभी तो चेहरे उगाने को आईने हैं बहुत

 

सभी से यूं तो दिले-ज़ार को शिकायत है

तुम्हारी कम-निगाही से मगर गिले हैं बहुत

 फ़ारिग़ बुखारी

 

 

 

 

 

विश्व को यदि आप उत्कृष्ट चीज देंगे तो आपको उत्कृष्ट प्रतिदान मिलेगा। - अनाम

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, आदेश ठाकुर चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

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