|
गुजराती
ऊष्मा
इन गीतों में, कविताओं में
शब्दों
में, विरामों में
आश्चर्यों
में
तुम ही हो
तुम न
होते तो
शायद ये
शब्दों का समूह
आघातों के
झंझावातों में कहीं
घिर गया
होता
तुम रवि
की
प्रथम
किरण की ऊष्मा बन
मेरे
इर्द-गिर्द लिपट जाओ
मेरे कवच
बन ताकि ये मध्यान्ह
मुझे गला
न सके
और रजनी
की गहराई
मुझे न
डुबा सके
मूल
रचनाः
दिव्या रावल
अनुवादः
चितरंजन रावल

बांग्ला
विश्व जब निद्रामग्न
विश्व जब
निद्रामग्न
गगन में
अंधकार
कौन देता
है
मेरी वीणा
के तारों में ऐसी झंकार
नींद छिन
गयी आँखों की
शयन छोड़
उठ बैठा
आँखे मल
कर देखता रहा
किन्तु
नज़र वो न आया
गुंजायमान, गुंजायमान
प्राण
परिपूर्ण हो उठा
नहीं जान
सका कौन-सी
विपुल
वाणी
बजती है
व्याकुल सुर में
कौन-सी
वेदना में
समझ नहीं
पा रहा हूँ रे !
हृदय
अश्रुधार से भरा हुआ है
किसे पहना
देना चाहता हूँ
अपना
कंठहार
मूल
रचनाः
रवीन्द्रनाथ टैगोर
अनुवादः
शिखा दास

सिंधी
मेरे होंठों पर गीलापन
बादल
!
मेरे करीब
मत आओ
तुम्हें
छुए बिना
रह नहीं
पाऊँगी
तुम्हारे
और मेरे बीच का
आसमान
हटाकर
चुमूँगी
तुम्हें
मूल
रचनाः
विम्मी सदारंगाणी
अनुवादः
डा. रेनू हिंगोरानी

ऊर्दू
विलाप
ये कैसा
षडयंत्र है जो प्रवाहित है पवन में
तुम्हारी
स्मृतियों के सारे दीप बुझा के
मैं
स्वप्नों में विचर रहा हूँ
मुझे
पीड़ा से तकता है तेरा प्यार
अभिप्साओं
को वो बुलबुला हूँ
कि
धीरे-धीरे पिघल रहा हँ
मेरी
आँखों में
रेगिस्तान
ये कैसा उभर रहा है
मैं
नृत्यालयों में बुझ रहा हूँ
मधुशालाओं
में जल रहा हूँ
जो मेरे
अंदर स्पंदनरत था
वो
मृत्युमुख में अग्रसर है
मूल
रचनाः
साक़ी फारुक़ी
अनुवादः
सीताराम गुप्त

अफ्रीकी लोक
अपने बच्चे के लिए शेरनी का गीत
उससे डरो
जिसके पास
तेज हथियार है
जो तेंदुए
की खाल का झब्बा पहनता है
वह जिसके
पास सफेद कुत्ते हैं-
ओ छोटे
बालों वाली शेरनी के बेटे !
छोटे-छोटे
कानों वाले मेरे बच्चे !
उस शेरनी
के बच्चे जिसे गोश्त पसंद है
ओ गोश्त
खाने वाले !
उस शेरनी
के बच्चे
जिसके
नथुने अपने शिकार के खून से
लाल है
खून से
सनी नाक वाले बच्चे !
उस शेरनी
के बच्चे जो
पोखर से
पानी पीती है
ओ पानी
पीने वाले मेरे बच्चे !
मूल
रचनाः अफ्रीकी लोक
अनुवादः
नरेन्द्र जैन

बौद्ध (थेरीगाथा)
सुमंगला
मुक्त
हूँ, मैं मुक्त हूँ !
धनकुटे से
पिंड छूटा, देगची से भी
मैं कितनी
प्रसन्नचित्त हूँ !
अपने पति
से मुझे घृणा हो गयी है
उसकी
छत्रछाया को मैं अब
बर्दाश्त
नहीं कर सकती !
इसलिए मैं
कड़कड़ाकर नष्ट करती हूँ
लालच और
नफरत को
और मैं
वगीं स्त्री हूँ
जो एक
पेड़ तले जा बैठती है
और
अपने-आप से कहती है-
“
आह, यह
सूख !”
और करती
है चिंतन-मनन सुखपूर्वक
मूल
रचनाः
थेरीगाथा
अनुवादः
संज्ञा उपाध्याय
छत्तीसगढ़ी
गठरी
आँख में
आग
सपने में
धुँआ
पीछे खंदक
आगे कुँआ
कहाँ जायेगा आखिर
मनुष्य
अपने को
बचाने खातिर
देह के
ठूँठ पेड़ में
भीतर
-ही-
भीतर चढ़ता है
और मनभर
देखता है
जाँगरचोर
मनुष्य
मना रहे
हैं होली-हरेली
और इधर
निर्जला व्रत रखी है माँ कई बच्चों वाली
गरीब के
चोला के लिए
हर दिन
रोज़ा
तब भी
नांगर-बैल थिरकते नहीं
एक ही
रास्ते पर रेंगते हैं, रेंगते चले जाते हैं
इसलिए मैं
अचकचा जाता हूँ
ख़ुद को
इसमें पाता हूँ
थोड़े
सबेरे ही गठियाता हूँ
और उसी को
ही खोलकर बताता हूँ
मूल
रचनाः डा.
बिहारी लाल साहू
अनुवादः
जयप्रकाश मानस

अँगरेज़ी
शर्मीली
प्रेमिका के प्रति
समय
स्पंदन के परों के
तीव्र
स्वर मैं सुन रहा हूँ
पंख
फैलाये हुए जो
आ रहा है
पीठ पीछे
और देखो
सामने फैले हमारे
समय के
निस्सीम मरुथल
यह मधुरता
और सुंदरता तुम्हारी
ले उड़ेगा
काल निष्ठुर
फिर इसे
वापस नहीं देगा कभी भी
फिर नहीं
गूंजेगी
मेरे
प्रेम-गीतों की प्रतिध्वनि
जो
तुम्हारे मरमरी महराब से
टकरा रही
है
व्यर्थ
वापस आ रही है
और यह
संचित कुँआरापन तुम्हारा
व्यर्थ
बीता जा रहा यौवन तुम्हारा
कब्र की
बेजान मिट्टी में दबेगा
नीच कीटों
का सुखद भोजन बनेगा
इस सुघरता
का तुम्हारा दर्द सारा
और मेरा
प्यार का उत्सर्ग सारा
धूल के
नन्हें कणों में जा मिलेगा
मानता हूँ
कब्र इक एकांत और सुंदर जगह है
पर वहाँ
क्या मनुज कोई गले लगकर सो सकेगा ?
मूल
रचनाः
ऐण्ड्रयू मार्वेल
अनुवादः
प्रेमेंद्र कुमार राय

स्पेनी
चाँद झाँकता है
जब चाँद उगता है
शाम की घंटियाँ
ख़ामोशी में डूब जाती है
और अभेद्य रहस्यमय
रास्ते दीखने लगते हैं
जब चाँद उगता है
समुद्र ज्वार में
पृथ्वी पर छाने लगता है
और हृदय बन जाता है
अनन्त प्रसार में एक
छोटा-सा द्वीप
.....................................
.....................................
जब चाँद उगता है
हज़ार हज़ार यकसाँ
बिम्बों में
तो थैलियों में से
रुपहले सिक्के
ग्लानि से रो देते हैं
मूल रचनाः फेडरिको
गार्सिया लोर्का
अनुवादः धर्मवीर भारती

|