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सृजन-गाथा
रचनात्मक
संस्कारों का अनुसमर्थन |
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बचप न
सीताराम गुप्त के शिशुगीत
प्रेरक प्रसंग/
वाणी का महत्व/
प्रगति
बाल कविता-
वर्षा का आनंद उठायें,
नाना जी के आँगन में
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सीताराम गुप्त के शिशुगीत
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सड़क और
पत्ता
उड़
बोला पीपल का पात,
चाहूँ तो
पहुँचूँ गुजरात ।
कहने को
तू सड़क बड़ी
पर बरसों
से यहीं पड़ी ।
बोली
सड़क- न शेखी मार
मैं तो
जाती कोस हजार ।

आज खिलादो
केक
टल्लू
बात टाल देते थे,
यह आदत थी
खोटी
।
मम्मी
बोली- टल्लू बेटी,
आज टाल दो
रोटी ।
टल्लू
बोले- ठीक बात है,
मगर शर्त
है एक ।
रोटी चाहे
कल दे देना,
आज खिलादो केक ।
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कोयल
और कौवा
कौवा
कोयल के घर पहुँचा,
मुझे
सीखा दो गाना ।
जिससे
बात-बात पर दुनिया
मुझे
न मारे ताना ।
कोयल
बोली- करो न चिंता ,
दुनिया से क्या डरना ।
दुनिया अपना काम करेगी,
हमको
अपना करना ।

मुखर
मेंढ़की
मुखर
मेंढ़की चतुर बड़ी,
शहर
घूमने निकल पड़ी ।
केले
पर जो पाँव पड़ा,
बीच
सड़क में फिसल पड़ी ।

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।। बाल कवियों से।।
आप अपनी बाल
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विपत्ति से
बढ़कर अनुभव सिखाने वाला कोई विद्यालय नहीं -
महात्मा गाँधी |
आपकी प्रतिक्रिया |
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संपादकः
जयप्रकाश मानस
संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा,
डॉ.सुधीर शर्मा, आदेश ठाकुर
चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा
तकनीकः
प्रशांत रथ |
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