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आम आदमी के अंदाज़ में रचा गया क्लासिक

प्रकाशन :शनिवार, 8 अक्टूबर 2011
अतुल कनक

श्रीलाल शुक्ल पर लिखने का अवसर मिला है तो मुझे अपनी किशोर वय की एक घटना याद आ जाती है। उन दिनों में दसवीं या ग्यारहवीं कक्षा का विद्यार्थी था। उम्र में मुझ से करीब पाँच साल बड़ी एक लड़की मेरे प्रति आसक्ति भाव रखती थी। इस आसक्ति के स्पंदन से मैं अछूता था, यह कहकर मैं सत्य के साथ अन्याय करूँगा। वह लडकी भारतीय शास्त्रीय संगीत की छात्रा थी और मुझे पता था कि राग ‘दरबारी कान्हड़ा’ उसके पसंदीदा रागों में एक था। उन्हीं दिनों उसका जन्मदिन आया। जन्मदिन पर कोई महत्वपूर्ण तोहफा देने की ललक जेब की  सामर्थ्य से संघर्ष कर रही थी। तभी शहर में मौजूद किताबों की एक दूकान पर मुझे ‘राग दरबारी’ नाम की एक किताब दिखी। हालाँकि किताब शास्त्रीय संगीत पर आधारित नहीं थी, यह तो मुझे दो चार पन्ने पलटने से पता चल गया था, लेकिन फिर भी ‘उस’ की पसंदीदा राग को आधार बनाकर कथावस्तु को बढ़ाया गया होगा, मैनें सोचा और किताब खरीद कर उसे जन्मदिन पर भेंट कर दी।

क़रीब सप्ताह भर बाद उस लड़की ने वह किताब मुझे देते हुए कहा, अतुल, हालाँकि ऐसी किताबों में मेरी रूचि पहीं थी, लेकिन तुम्हारी दी इस किताब को पढ़ कर मज़ा आ गया। मैं जानती हूँ कि इस किताब को तुमने भी अब तक नहीं पढ़ा होगा। इसलिये ये किताब तुम्हें दे रही हूँ। इसे पढ़ना और फिर अपने पास रख लेना। जब भी आसपास की बातों से मन खिन्न होने लगे, इस किताब को पढ़ना। परेशानी में मज़ा लेने लगोगे।

....और इस तरह पढ़ा मैनें ‘राग दरबारी’ नामक वह उपन्यास जिसे हिन्दी साहित्य के सबसे महत्वपूर्ण उपन्यासों में एक माना जाता है। बाप रे, क्या बिंदास अंदाज़ था कहने का और किस बारीकी से रचनाकार ने अपने आसपास के परिवेश को किस्सागोई शैली में गुदगुदी चलाते हुए छुआ था! मैनें पढ़ना शुरू किया तो फिर पूरा खतम किये बिना नहीं उठ सका। एक बार, दो बार नहीं, बार-बार पढ़ा और हर बार शिवपालगंज के चरित्रों के माध्यम से देश दुनिया के चरित्रों का नंगापन एक नये मुहावरे के साथ जाना। ‘राग दरबारी’ की यही विशेषता है। वह बार बार पढ़े जाने के बावजूद बोरियत पैदा नहीं करता। महाभारत में कहा है कि ‘अति परिचयाद् अवज्ञा भवति।’

लेकिन राग दरबारी से परिचय ज्यों ज्यों गहरा होता जाता है, वो विसंगतियों को परखने और सच्चाई को समझने का नया आयाम सौंपता जाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि श्रीलाल शुक्ल ने हिन्दी में इस कृति की रचना की थी, तब शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि एक पूरा उपन्यास ही व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति को आधार बनाकर लिखा जा सकता है। यही कारण रहा कि शुरू में कई आलोचकों ने इस रचना को नकारा भी। ‘कहानी’ के तत्कालीन संपादक श्रीपत राय ने इसे ‘ऊब का महाग्रंथ’ करार देते हुए घोषणा की थी कि यह अतिशय उबाने वाली कुरूचिपूर्ण और कुरचित कृति अपठित रह जायेगी। नेमीचंद जैन ने भी इसे ‘असंतुष्ट, क्षुब्ध व्यक्ति की बेशुमार शिकायतों और खीझ भरे आक्षेपों का अंतहीन सिलसिला’ करार दिया था। बहरहाल, समय ने आलोचकों के दुराग्रहों को खुद ही उजागर कर दिया। जिस रचना पर यह तोहमत मँडी गई कि अपठित रह जाना ही उसकी नियति है, वही रचना बाद में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली कृतियों में शामिल हुई।

राग दरबारी श्रीलाल शुक्ल की पहली कृति नहीं थी। सन् 1925 में लखनऊ जनपद के अतरौली ग्राम में जन्में श्रीलाल शुक्ल की पहली कृति ‘सूनी घाटी का सूरज’ एक उपन्यास के रूप में सन् 1957 में प्रकाशित हुई। अगले वर्ष ही उनका व्यंग्य संग्रह ‘अंगद का पाँव’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। बहरहाल, राग दरबारी ने उन्हें जो कीर्ति दी, वह अद्भुत है। बाद में ‘मकान’, ‘विस्रामपुर का संत’, पहला पड़ाव नामक उनके अन्य उपन्यास छपे और चर्चित भी रहे लेकिन स्वयं रचनाकार राग दरबारी के तेवर के आगे जाता नहीं दिखा। यहाँ तक कि उनके व्यंगय संग्रहों, उमरावनगर में कुछ दिन, अगली शताब्दी का शहर, जहालत के पचास साल आदि में भी कलम की तुर्शी राग दरबारी के आयामों के आगे निलती नहीं दिखी। दरअसल, राग दरबारी एक क्लासिक कृति है और किसी भी क्लासिक कृतियों के आगे तक का सफर तय कर पाना रचनाकार के लिये भी अक्सर दुष्कर प्रतीत होता है। यही कारण है कि अन्य कई रचनाओं और उपन्यासों के प्रकाशन के बावजूद ‘राग दरबारी’ श्रीलाल शुक्ल के सृजन का आयाम माना जाने लगा।

लेकिन श्रीलाल शुक्ल ही क्या, राग दरबारी तो हिन्दी व्यंग्य लेखन के लिये भी एक मापदण्ड की तरह प्रतिष्ठित है। पिछले कुछ सालों में हिन्दी में व्यंग्य उपन्यासों का लेखन अपेक्षाकृत बढ़ा है। ज्ञान चतुर्वेदी और यशवंत व्यास जेसे रचनाकारों के व्यंग्य उपन्यास चर्चित भी हुए हैं लेकिन सबकी सामर्थ्य को तोलने के लिये तराजू के दूसरे पलड़े पर ‘राग दरबारी’ ही रखा जाता है। राग दरबारी का प्रकाशन मेरे जन्म के अगले साल ही हो गया था, लेकिन आज देखता हूँ तो पाता हूँ कि इतने बरस बीत जाने के बाद इस उपन्यास का व्यंग्य अधिक प्रांसगिक और अधिक असरकारक हो गया है। ‘‘ पुनर्जन्म के सिद्वांत की ईजाद दीवानी अदालतों में हुई है ताकि वादी और प्रतिवादी इस अफसोस को लेकर ना मरें कि उनका मुकदमा अधूरा ही पड़ा रहा। इसके सहारे वे यह सोचते हुए चैन से मर सकते हैं कि मुकदमे का फैसला सुनने के लिये अभी अगला जन्म तो पड़ा ही है’’ जेसी पंक्तियाँ हमारी न्याय प्रणाली पर आज भी असरकारक प्रहार करती हैं।

‘‘गुरू किस सोच विचार में पड़ गये? सोचना काम चिडि़मार का है।’’ या ‘‘वर्तमान शिक्षा पद्वति रास्ते में पड़ी हुई वह कुतिया है, जिसे कोई भी लात मार सकता है।’’ या ‘‘ड्राइवर साहब, तुम्हारा गियर तो बिल्कुल अपने देश की हुकूमत जैसा है... एसे चाहे जितनी बार टाप गियर में डालो, दो गज चलते ही फिसल जाती है और लौटकर अपने खांचे में आ जाती है’’ जैसे वाक्य आज भी व्यंवस्था की विसंगतियों के चिथड़े उठाते प्रतीत होते हैं। किसी उपन्यास की प्रासंगिकता उसके प्रकाशन के पैतालीस वर्ष बाद भी बने रहना रचनाकार की दूरदृष्टि को साबित करती है या समाज की ढीटाई को प्रतिबिम्बित करती है, यह आधुनिक व्यंग्यकारों और आलोचकों के लिये चर्चा का विषय हो सकता है।

श्री लाल शुक्ल को पढ़ना जीवन को उसकी संपूर्णता में जानने के प्रयास की तरह लगता है। इसीलिये लगता है कि हमस ब भाग्यशाली हैं जो श्रीलाल शुक्ल जैसा रचनाकार हमारे समय में हुआ। ज्ञानपीठ ने आधुनिक हिन्दी की सबसे महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक के रचनाकार को अपना पुरस्कार दिया। ज्ञापनीठ को साधुवाद और श्रीलाल शुक्ल के प्रशंसकों को बधाई। रहा सवाल श्रीलाल शुक्ल का, तो उन राग दरबारी को मिली लोकप्रियता और हिन्दी के सामान्य से पाठक की भी सराहना से बड़ा किसी और पुरस्कार की प्रतीक्षा उन्हें शायद ही रही होगी।

  अतुल कनक
3ए 30, महावीर नगर-विस्तार,
कोटा-324009 (राजस्थान)
मो.- 9414308291
atulkanak@yahoo.com
 
         
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