जब हम यह कहते हैं कि हमें विश्वव्यापी मानवी संकट की वेदना को आत्मसात् करना चाहिए, तो इसके पीछे केवल यही तर्क नहीं है कि विज्ञान ने समस्त विश्व के विस्तार को कम कर दिया है बल्कि यह भी है कि मानव की अंतरात्मा अविभाजित है और उसके किसी अंश में यदि पक्षाघात है, उसके कोष्ठकों में उष्ण प्राणदायी रक्त नहीं पहुंच रहा, तो दूसरे अंश का दायित्व है कि अपने साथ-साथ वहां भी रक्त पहुंचाए, उसे जीवन-दान दे। इसी दृष्टि से अभी तक पश्चिम और पूर्व में जो मानव-विरोधी संबंध कायम था, जिसने मिथ्या मूल्यों को प्रश्रय दे रखा था, उसके स्थान पर हम सहज मानवीय धरातल पर अपने संबंधों को पहचानें और ऐतिहासिक वेदना एवं नियति में सहभागी हों तथा मानवीय गौरव की व्यापक प्रतिष्ठा करें।
मानवीय गौरव की व्यापक प्रतिष्ठा करने की प्रक्रिया में हम यह पहचान सकेंगे कि यदि कहीं किसी भी मनुष्य के गौरव की क्षति होती है तो वह मनुष्य मात्र के गौरव की क्षति है। यहां पर यह बात समझ लेनी आवश्यक है कि लेखन के इस विशिष्ट दायित्व में राष्ट्र कोई निरपेक्ष इकाई नहीं है, राष्ट्र भी व्यापक मानव-नियति के प्रसंग में सार्थकता पाता है। साहित्य में राष्ट्र-निर्माण को व्यापक मानवीय नियति की पृष्ठभूमि में समझना श्रेयस्कर होता है। तभी यह संभव हो पाता है कि हम उस उच्च कोटि के राष्ट्रीय साहित्य का निर्माण कर सकें, जो मानव मात्र की संवेदनाओं का स्पर्श कर सके। अक्सर लोग इसे भुलाकर केवल अपना राष्ट्र, अपनी जाति, अपनी परंपरा की बात कठमुल्लेपन के स्तर पर करने लगते हैं, तब वे वस्तुत: राष्ट्र निर्माण के मौलिक प्रतिमान को ही भुला देते हैं।
भारतीय साहित्यकार आज जब मानवीय नियति से संबद्ध अपने दायित्व का निर्वाह करने के लिए तैयार होता है, तो उसे कुछ और कठिनाइयां महसूस होती हैं। उनका समाधान खोजना एक जटिल कार्य है। मध्ययुग में साहित्यकार मानवीय नियति से अपना लगाव और उसके प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए जिन माध्यमों का आश्रय ग्रहण करते थे वे माध्यम उनके लिए भी उतने ही सार्थक थे, जितने जनता के लिए। अत: उन्हें अपने दायित्व की दिशा खोजने और उसे जनता तक पहुंचाने में उतनी कठिनाई का अनुभव नहीं होता था। वे माध्यम थे वीरपूजा या धर्म, या तो उनका नायक कोई ऐसा महापुरुष होता था, जो समस्त मूल्यों और मर्यादाओं को निज में समाहित किए रहता था, जनता उसे आदर की दृष्टि से देखती थी और उसी के सुख-दुख से अपनी नियति को अनिवार्यत: आबद्ध मानती थी, या फिर धर्म को पीठिका के रूप में ग्रहण किया जाता था। प्रभु को जाति की नियति के प्रति संवेदनशील दिखाकर, उनके किसी अवतार के माध्यम से मर्यादाओं का विधान होता था, मूल्यों की नवस्थापना होती थी। आज वीरपूजा का महत्व नहीं रहा, नायक विघटित हो चुके, धर्म के विषय में संदेह उत्पन्न हो गए। जहां धर्म को ग्रहण भी किया गया, वहां उसके नये मानवपरक अर्थ को खोजने का प्रयास किया जाता रहा, उसे सफलता मिली या नहीं, यह बात और है।
चुके, धर्म के विषय में संदेह उत्पन्न हो गए। जहां धर्म
कोग्रहण भी किया गया, वहां उसके नये मानवपरक
अर्थ को खोजने का प्रयासकिया जाता रहा, उसे
सफलता मिली या नहीं, यह बात और है।"
वीरपूजा या धर्म के संदर्भ में जो प्रतिमान विकसित हुए थे, जिनका आश्रय इन आधुनिक धर्म के चिन्तकों ने भी ग्रहण किया है, उनके मिथ्या पड़ जाने के अन्य कारणों में से एक कारण यह भी है कि वे या तो असामान्य, विशिष्ट मनुष्य को अपना केन्द्र-बिंदु बनाते थे, या वे समस्त मानवीय नियति की चरम उपलब्धि लोकोत्तर सुख को मानते थे। सामान्य मनुष्य और उसका लौकिक जीवन उतना महत्वपूर्ण नहीं माना गया। वैसे मध्ययुग में संतों और भक्तों ने इस बात का अवश्य प्रयास किया है कि वे दिव्य को भी मानवीय के धरातल पर खींच लाएं, पर सीमाएं उनकी भी थीं।
सहज साधना पद्धति का सारा गुणगान करने के बावजूद संत वैराग्यवाद के घोर समर्थक रहे हैं और योग की जटिल साधनाओं के बिना वे मनुष्य को अपरिशोधित मानते थे। उनके कारण धीरे-धीरे भारतीय समाज में अंधविश्वास, पाखंड, आडंबर और चमत्कारों को ही प्रश्रय मिला। भक्तों का संकट तो और भी गहरा था। उन्होंने संतों द्वारा तिरस्कृत शास्त्रीय रूढ़ियों को भी मान्यता दे रखी थी। उसका परिणाम यह था कि जब ऋषियों की तपस्या में राक्षस बाधा पहुंचाते थे, तब राक्षसों के विनाश के लिए प्रभु को अवतरित होना पड़ता था, पर जब वही तपस्या शुद्र द्वारा होने लगती थी, तब प्रभु को स्वत: उसका विनाश कर तपस्या भंग करनी पड़ती थी। तपस्या महत्वपूर्ण नहीं थी, महत्वपूर्ण थी तपस्या करने वाले की जाति। इस प्रकार मनुष्य और मनुष्य में भेद था। मनुष्य या उसकी नियति अपने में सार्थक नहीं थी। उसे सार्थकता तब मिलती थी, जब उसे उच्च वर्ण का प्रमाण पत्र मिला हो। इस प्रकार इस आध्यात्मिकता में वह मनुष्य-पूजा भी थी, जो हमारी सांस्कृतिक परंपरा की श्रेष्ठतम उपलब्धि है और मनुष्य की वह अवमानना भी थी जिससे सारा मध्ययुग बहुत प्रयास करने पर भी छुटकारा नहीं पा सका था।
इस प्रकार आधुनिक भारत को मध्ययुगीन भारत में विरासत में एक ओर तो यह असंगति और अंतर्विरोधों से भरी हुई आध्यात्मिकता मिली और दूसरी ओर मिली शताब्दियों पुरानी गुलामी, तीसरी ओर आधुनिक भारत का संपर्क पश्चिम से हुआ, जहां विज्ञान और भौतिक उन्नति ने मध्ययुग की अधिकांश मान्यताएं ध्वस्त कर दी थीं। ऐसे विचित्र से धरातल पर खड़े होकर हमारे साहित्यकारों ने पहली बार अपनी नियति के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए पूछा था- “हम कौन थे, क्या हो गये हैं और क्या होंगे?” जब यह प्रश्न पूछा गया, तब से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक हमारा देश जिस राष्ट्रीय आंदोलन में संलग्न रहा, उसने निःसंदेह हमारे साहित्य के पूरे स्वर को प्रभावित किया। यह प्रभाव केवल विषय-वस्तु के चुनाव तक ही सीमित नहीं था, बल्कि जिन आदर्शों, मूल्यों, मानव-नियति की जिन प्रक्रियाओं को साहित्य में उठाया गया, वे बहुत कुछ ऐसी प्रवृत्तियों को प्रतिबिंबित करती हैं, जिनका उद्गम हमारे राष्ट्रीय आंदोलन की विभिन्न धाराओं और उपधाराओं में पाया जा सकता है। यह दशा केवल भारत की ही हो, यह बात नहीं है। पश्चिम में भी यही दशा थी।
समस्त संसार में राजनीति ने एक काम किया था- आधुनिकता ने वीरपूजा और धर्म को तिलांजलि दे दी थी, पर मध्ययुगीन वीरपूजा की मान्यता और धर्म का कट्टर भावावेश- इन दोनों को राजनीति ने अपने में समाहित कर लिया था। परिणाम यह हुआ कि राजनीति, वीरपूजा और धर्म का स्थानापन्न बन बैठी और कई देशों में उसने धीरे-धीरे विज्ञान और दर्शन को भी अपना अनुचर बनाने का प्रयास करना आरंभ किया। हमारे देश में महात्मा गांधी ने राजनीति को नैतिक प्रतिमानों से संबद्ध कर जो एक नया प्रयोग किया, उसकी अपनी विशेष उपलब्धियां, अभाव और सीमाएं थीं। उस युग का जितना साहित्य है, उसकी उपलब्धियां और उसके अभाव आश्चर्यजनक रूप से उस गांधीवादी राजनीति की उपलब्धियों और अभावों से मेल खाते हैं, लेकिन पिछले दस वर्षो में, न केवल विदेशों में, वरन भारत में भी राजनीति का महत्व घटा है। “मानव नियति को केवल राजनीति की परिभाषाओं में ही समझा जा सकता है” सत्य इसके विपरीत ही सिद्ध हुआ है।
राजनीति
की कई चिंतनधाराओं ने बीसवीं शताब्दी के आरंभ में यह दावा पेश किया था कि वे मानव मुक्ति को ही लक्ष्य बनाकर चल रही हैं। उन्होंने जिन व्यवस्थाओं को स्थापित किया, उनको `जनतंत्र´ नाम तो अवश्य दिया, पर अधिकांश व्यवस्थाओं में तंत्र औरों के ही हाथों में रहा, `जन´ तो ज्यों का त्यों दास बना रहा। यह बात केवल विदेशों पर लागू नहीं होती, दुर्भाग्यवश यह कटु सत्य हमारे देश पर भी लागू होता दिख रहा है। इसीलिए आज भारत में भी जो साहित्यकार मानव नियति के संदर्भ में राष्ट्र के नवनिर्माण के प्रति अपना दायित्व अनुभव करता है, उसके लिए सबसे प्रमुख चिंता हो जाती है-`सामान्य जन की मुक्ति´। भारत की स्वतंत्रता जब तक सार्थक नहीं है, तब तक सामान्य जनतंत्र नहीं है। सामान्य जन के स्वतंत्र होने का अर्थ यही नहीं है कि उसे भरपेट भोजन और जरूरत के मुताबिक कपड़ा मिल जाए। उसके मानस में जो अंध रूढ़ियां हैं, कुठाएं हैं, अविवेक है, मृत परंपराएं आदि प्रवृत्तियां हैं-जिनके कारण यह युग-युग से दास बनता चला आया है- उनसे भी मुक्त कराना है। इस दृष्टि से स्वातंत्र्य न केवल एक बाह्य परिस्थिति है,वरन् एक आंतरिक मूल्य भी है और जब साहित्यकार सामान्य जन के स्वातंत्र्य का दायित्व लेता है, तो वह सम्पूर्ण बाह्य और आंतरिक जटिल मानवीय यथार्थ की पृष्ठभूमि में उसे ग्रहण करता है, केवल सीमित राजनीतिक अर्थ में नहीं।
यह नहीं है कि उसे भरपेट भोजन और जरूरत के
मुताबिक कपड़ा मिल जाए। उसके मानस में जो
अंधरूढ़ियां व कुठाएं हैं, अविवेक है,मृत परंपराएं
आदि प्रवृत्तियां हैं-जिनके कारण यह युगों से दास
बनता चला आया है- उनसे भी मुक्त कराना है।"
सामान्य जन के प्रति उसका यह दायित्व और मानवीय यथार्थ की समस्त जटिलता में ग्रहण करने का उसका यह प्रयत्न अनिवार्य रूप से राजसत्ता के समर्थन में ही हो, यह आवश्यक नहीं है। वैसे तो जनतंत्र में प्रत्येक राजनीतिक दल और प्रत्येक राजसत्ता का दावा यही होता है कि वह भी सामान्य जन की मुक्ति के लिए यत्नशील है, किन्तु राजनीति का मार्ग साहित्यकार के मार्ग से अभिन्न ही हो, यह आवश्यक नहीं। यही नहीं, बल्कि राजसत्ताओं के द्वारा अनुमानित और प्रचारित जनहित की धारणा वही हो, जो साहित्य की है, यह आवश्यक नहीं। इसीलिए हर हालत में राजसत्ता के समक्ष लेखक को अपनी स्वतंत्र स्थिति बनाए रखनी चाहिए, चाहे इसके लिए उसे जो भी मूल्य चुकाना पड़े। उसका दायित्व सामान्य जन के प्रति है, राजसत्ता के प्रति नहीं। वह प्रजातंत्र का, जनतंत्र का जागरूक लेखक है, राजसभा का उदघोषक नहीं।
का दावा यही होता है कि वह भी सामान्य जन की मुक्ति
के लिए यत्नशील है, किन्तु राजनीति का मार्ग साहित्यकार
के मार्ग से अभिन्न ही हो, यह आवश्यक नहीं।… राजसत्ता
के समक्ष लेखक को अपनी तंत्रस्थिति बनाए रखनी चाहिए,
चाहे इसके लिए उसे जो भी मूल्य चुकाना पड़े। उसका
दायित्व सामान्य जन के प्रति है, राजसत्ता के प्रति नहीं।
वह प्रजातंत्र का, जनतंत्र का जागरूक लेखक है, राजसभा
का उदघोषक नहीं।"
काव्य संबंधी भ्रांतियों में से एक यह भी रही है कि कवि सामान्य जन से बहुत ऊपर एक असाधारण प्राणी होता है, मनीषी होता है। यह मनीषी केवल उसी की नियति है, सामान्य जन उससे वंचित है। यह धारणा उस मानसिक कैशोर्य का आश्रय लेकर और भी पनपी, जो छायावाद-युग का प्रमुख भावस्तर रहा है। उसका परिणाम यह हुआ कि उसने अपनी नियति को सामान्य जन की नियति से पृथक् माना, सामान्य जन का जो भी हो, वह तो अपने साधना-कक्ष में सीधे असीम या अवतरित होती हुई दिव्य चेतना से अपने हृदय के तार जोड़कर पूर्णत्व की उपलब्धि कर लेता है। पूर्णत्व की प्राप्ति हुई हो या न हुई हो, पर समवेत मानवीय नियति से अपना एकात्म न स्थापित करने से उसका संबंध सूत्र मानवीय यथार्थ से बुरी तरह कट गया।
छायावाद युग के इस अनुभव के बाद भी अक्सर रहस्यवाद की आवाज फिर उठते हुए सुनाई पड़ती है। इधर एक महत्वपूर्ण वक्तव्य देखने में आया कि `देश स्वतंत्र हो गया, अब पटह रखकर सुरली उठा लेनी चाहिए और भौतिकता से आक्रांत विश्व को रहस्यवाद का संदेश देना चाहिए।´ बड़ा आश्चर्य हुआ, पर फिर सोचने पर लगा, इसमें आश्चर्य की बात नहीं, यह थकान का स्वर है। जहां लेखक ने सामान्य जन की नियति से अपनी नियति को पृथक किया कि यथार्थ का सूत्र उसके हाथ से छूटा और जब जन के, प्रजा के यथार्थ से वह विच्छिन्न ही हो गया, तब उसके लिए दो रास्ते बचे- राज्याश्रय या रहस्यवाद। रहस्यववाद में जन की लोकनियति से आपको क्या लेना-देना, आप तो सीधे लोकोत्तर का साक्षात्कार करना चाहते हैं। राजाश्रय में आपको प्रजा से क्या- राजा की कृपा मिलनी चाहिए। मध्यकाल में राजाश्रय और रहस्यवाद में वैषम्य माना जाता था-‘संतन कहा सीकरी सन काम’, लेकिन पंचवर्षीय आध्यात्मिक प्रगति ने इस अंतर को भी मिटा दिया है। रहस्यवाद अब एक सुविधाजनक आरामदेह साधना है।
आंतरिक मूल्यों की बात तो समझ में आती है, सामान्य जन की आंतरिक मुक्ति की बात कही भी जा चुकी है, पर यह रहस्यवादी आध्यात्म, यह लोकोत्तर की साधना एक यथार्थ काल्पनिक स्वप्नजाल का ही आभास देती है। वास्तव में इस `लोक´ के परे कुछ है या नहीं, इसका निरूपण योगी और साधक करें, पर साहित्य-सर्जना का आधार तो मनुष्य का लौकिक यथार्थ ही है। मध्यकालीन साहित्य में भी वही अंश सजीव और सप्राण है, जहां इस लोक का प्राणी बोल उठा है, परलोक का द्रष्टा नहीं।
इस रहस्यवाद की फिर से उठने वाली आवाज का वास्तविक मर्म हम पहचान सकते हैं, यदि हम यह जान लें कि रहस्यवाद का प्रयोग अविवेक के अर्थ में भी किया जाता है। इस विषय में हम पीछे संकेत कर चुके हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हम गांधीयुग की सारी उपलब्धियों और अभावों के समवेत प्रभाव से किसी ऐसे बिंदु पर पहुंच गये हैं, जहां से आगे हमें राह नहीं दिख रही है और अगर राह दिखती भी है, तो हमारा कला-व्यक्तित्व अब इतना समर्थ नहीं रह गया है कि वह उस राह पर बढ़ सके? परिणामस्वरूप हम स्थिति का सामना न करके अविवेक की खोल में छिपने की कोशिश करते हैं और उसे `रहस्यवाद´ और `भारतीय परंपरा´ आदि की बड़ी संज्ञाएं प्रदान करते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि विवेक और साहस के अभाव में हम योजना और निर्माण आदि का नाम तो बहुत लेते हैं, पर वस्तुत: हम अपनी साहित्य चेतना में केवल हाथी-दांत की ऐसी मीनारें निर्मित करते चले जा रहे हैं, जिनमें हम आराम से बैठकर दायित्व, उसके संघर्ष और उसकी पीड़ा से बच सकें?

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