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संस्मरण

अमेरिका में हिंदी भाषाः संस्मरण-नीरजा द्विवेदी

गये तब से कितने युग बीत-डॉ. बल्देव

ग़ालिब की हाज़िरजवाबी व विनोदवृति-प्रदीप कुमार शर्मा

 
 

गये तब से कितने युग बीत

डॉ. बल्देव

 

       हाकवि सुमित्रानन्दन पंत की शीतल छाया में जेठ की भरी दोपहरी का भरपूर आनन्द उठा लेने के बाद, बिदा लेते हुए मैंने इनसे महादेवी वर्मा जी से मिलने की इच्छा व्यक्त की । उन्होंने तुरन्त नंबर डायल किया देवी जी, आपके एक भक्त बिलासपुर से पधारे है, आपके दर्शन की इच्छा रखते हैं ,देवी जा का उत्तर था -आज हमारे परिवार में बहुत सारे मेहमान आए हुए हैं, कल आ सकें तो इतमीनान से बातें हो सकेंगी । अगले ही दिन वापसी थी। मन की इच्छा मन में ही रह गई शायद सत्य सनेहू के अभाव में तुलसी की तुरते ताही मिलहीं नहीं संदेहू की भविष्य वाणी फेल हो गई...पर इच्छा बराबर बनी रही जो सोलह साल बाद पूरी हुई ......

 

       हुआ यों मैंने देश के बड़े पुस्तकालयों की खाक छानकर मुकुटधर पाण्डेय के कुछ अमूल्य बिखरे रत्न बटोरे थे उसी के प्रकासन के सिलसिले में दो बार बन्द्रह-पन्द्रह दिनों के लिए इलाहाबाद प्रवास पर रहा सभी क्षेत्रों में यहाँ पण्डों का वर्चस है, अस्तु मुझे जैसे देहाती का ठगी का शिकार हो जाना, कोई बड़ी बात नहीं थी । मैं उत्तम गोस्वामी के मैत्रेय पथ में डेरा डाला हुआ था। बहुत भटकने के बाद पं. रामकृष्म त्रिपाठी (निराला जी के सुपुत्र) कें निर्देश पर विश्व बोध(काव्य संग्रह) तथा छायावाद एवं अन्य श्रेष्ठ निबंध बड़े सज-धज के साथ एकेडमी प्रेस से प्रकाशित हुई थी । महादेवी जी को पुस्तकें भेंट करने की तीव्र तम इच्छा थी, पर योग नही बन पा रहा था। अगला दिन निराला जयन्ती का था । कविवर जगदीश गुप्त और अम्बसेश्वर त्रिपाठी (निराला जी के पौत्र, एव.ए. फायनल के छात्र) ने कार्यक्रम में शामिल होने का विशेष आग्रह किया था, इसलिए इलाहाबाद में एक दिन और रूक जाना हुआ । शाम को 1 फरवरी 1984 को एक शोध छात्र को लेकर टेक्सी से अशोक नगर पहुँचा । देवी जी के निवास को ढूँढने में जरा भी दिक्कत नही हुई जिससे भी भेंट हुई, उसी ने श्रद्धा की दृष्टि से हमें देखा और पेड़ पौधों, बगीचों से घिरे एक बंगले की ओर इशारा या । हमें गेट पर खड़ा देखकर घरेलू नौकर दौड़ा । आने का कारण पूछा,ह मने बताया,व ह बोला आइए और बरामदे में ले जाकर बोला-यहीं ठहरिये । वह अन्दर गया और प्रो.रामजी पाण्डेय बाहर निकले। नमस्कार चमत्कार के बाद उन्होने अन्यमनस्क भाव से पूछा क्या आपने समय ले लिया था, मैंने अपना परिचय देते हुए उन्हीं का पत्र का हवाला दिया, तो वे झेंप से गए, बोले बैठिए क्या आप रायगढ से आए हैं - हाँ । देखिए देवी जी अस्वस्थ हैं डॉक्टर भीतर है, वे सीढ़ी से गिर पड़ी थीं, हाथ और पैर में मोच है, बिजली से सिंकाई हो रही है। हम उठे....मैंने कहा कोई बात नहीं हम चलते हैं, फिर कभी भाग्य में बदा होगा तो दर्शन होंगे । हम दोनों की बातचीत शायद इलाज करा रही महादेवी जी सुन रहीं थीं उन्होंने पाण्डेय जी को भीतर बुलाकर जानकारी ली, फिर वही से बोली–“पाण्डेय जी उन्हें बैठाइए मैं थोड़ी देर बाद आ रही हूँअधीरता और नैराश्य से राहत मिली हम पुनः बरांडे में रखी कुर्सीयों पर बैठ गए....

 

       पन्द्रह-सोलह मिनट बाद अन्दर से बुलावा आया भीतर घुसते ही हमने देका समूचा कमरा अलंकरणो से, प्रतीक चिन्हों और बेशकीमती उपहारों से सजा हुआ है। आलमारियों ओर रेक में किताबें करीने से रखी गयी है । एक बड़ी सी चौकी पर सफैद चादर बिछी है, बगल से झूले पर स्वर्णिम गोपाल-कृष्ण अपनी मंद मुस्कान से चतुर्दिक आभा बिखरे रहे है हैं । एक कोने पर बाग्देवी की कॉस्यमूर्ति, ट्यूबलाईट के प्रकाश को सुरमई उजास में तब्दील कर रही है। दो तीन मिनट बाद शुभ्रवसना महागरीयसी महादेवी जी प्रकट हुई । उनकी एक झलक पाते ही हृदय में दीप शिखा प्रज्वल्लित सी हो गई और मैं नीर भरी दुख की बदली जैसी अमर पंक्ति को ओव्हर टेक करती प्रिय शान्त गगन, मेरा जीवन जैसी गीत पंक्ति मानस में कौंध गई । ऐसे विराट व्यक्तित्व के सामने हमारा क्या बजूद । सिन्धु को क्या परिचय दें, देव । क्षणान्त हम सम्भले उनकी चरण धूलि मस्तक पर ली, उन्होंने मस्तक पर हाथ रखकर अशीषा, हम धन्य हुए, जीवन सफल हुआ.....

 

       मैंने अपने द्वारा संपादित पद्मश्री मुकुटधर पाण्डेय की सद्यः प्रकाशित किताबें, विश्वबोध और छायावाद एवं अन्य श्रेष्ठ निबन्ध की एक-एक प्रति भेंट की । पंडित मुकुटधर पाण्डेय का नाम सुनते ही महादेवी जी बेहद खुश हुईं । लगा वे क्षण भर के लिए शारीरिक कष्टों से मुक्त हो गईं । पुस्तक हाथ में लेकर मस्तक पर रखी नमन करती हुई आत्म विभोर की सी अवस्था में बोल पड़ीं, ये हमारे गुरूजनों में से हैं,  पाण्डेय जी छायावाद के प्रर्वतक कवि हैं । जब मैं..... इन्टर की छात्र थी, सरस्वती में प्रकाशित इनकी कविताएँ पढ़कर प्रेरणा लेती थी।  आपने इन पुस्तकों को प्रकाशित कर हिन्दी साहित्य का बड़ा हित किया है, आप धन्यवाद के पात्र हैं.....मैं इन पुस्तकों को जरूर पढ़ूँगी कहकर गोद में रख ली । फिर सेवक को आवाज लगायी-देखो भाई ये लोग बड़ी से आए हैं, रायगढ़ छत्तीसगढ़ से आए हैं । इन्हें जलपान कराओ, फिर हमारी ओर मुखातिब हुई, तो मेरे बगल में बैठे शोध छात्र ने डायरी निकाली और प्रश्न के ऊपर प्रश्न शुरू कर दिए । मैंने इशारा करके रोका पर सब बेकार, वह बड़ा ही वाचाल हो उठा था, अपने को सम्हाल नही पा रहा था। कहाँ बैठा है, किसके सामने बैठा है, वह समझ नही पा रहा था। महादेवीजी ताड़ कर बोली, बलदेव जी ये आपके छात्र हैं या मित्र, मैंने कहा दोनों हैं, ये भी पाण्डेय जी की छत्तीसगढ़ी में अनुदित रचना मेघदूत छपाने आए हैं । इसके बाद भी वह शोध छात्र गंभीरता छोड़ चंचल हो रहा था, मैंने चिकोटी काटी,चुप रहने का इशारा किया । इतनी बड़ी हस्ती के सामने बचकाना और औपचारिक प्रश्न हम दोनों को रास नही आया । देवी जी इनके प्रश्नों का क्या उत्तर दें, वह भी इस उम्र में । मैं भीतर ही भीतर टूट रहा था, संकुचित हो रहा था।

 

       यह कहना कठिन है कि महादेवीजी का कवि बड़ा है या गद्य लेकक ? (रहस्य के झीने आवरण में समूचे हिन्दी काव्य को आवृतकर लेने वाली महादेवीजी ने हिन्दी गद्य को भी अपने रेखा चित्र संस्मरण और निबन्धों से काफी हद तक समृद्ध गिया है।)

लेकिन भ्रम की गुंजाइश रह जाती है कि इन दोनों से उनकी समाज सेविका का रूप बड़ा । विराट है....

 

       हम लोगों के साथ नाश्ता कर लेने के बाद अब वे स्वस्थ व प्रसन्न नजर आ रही थीं । देवीजी ने आज के आए हुए पत्रों में से एक पत्र उठाया । यह पत्र किसी अग्नि दग्धा से संबंधित था । देवीजी बड़ी संयत भाषा में बोली, पुरुष बड़े निर्दय होते हैं । देखो न दहेज की लालच  में परिवार वालों ने अपनी बहू को जला दिया है । पत्र-लेखक ने मदद माँगी है, ज्ञानपीठ  से मिली सम्पूर्ण पुरस्कार राशि में अन्य सभी जमा पूंजी लगाकर मैंने एक न्यास की स्थापना कर दी है सिफारिश सहित मैं यह पत्र उनके सामने रख दूँगी । उन्होंने फिर एक दूसरा पत्र उठाया,  नजरें दौडा़ई और उत्पीडित हो बोल उठीं- ये बेचारी परित्यक्ता है, इन्हें भी मदद की जरूरत है। सहारनपुर से यह किसी बालिका का पत्र है, वह उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए मदद चाहती है महादीवी जी पत्रों को सहेचती हुई बोली हमारे देश में महिलाओं का बुरा हाल, हमारे समाज ने उसे निरीह बना दिया है, अबला बना दिया है, उनके ऊपर आए दिन अत्याचार हो रहे हैं, आप लोगों को इसे रोकना चाहिए।

 

       हमें पन्द्रह मिनट का समय मिला था, पच्चीस मिनट हो गए प्रोफेसर पाण्डेय हमें ही ताके जा रहे थे..... समय खत्म हो गया, यह इशारा उनका था, देवीजी इस बात को ताड़ गईं बोली-अरे पाण्डेय जी ये लोग दूर से आए हैं, म.प्र रायगढ. से आए हैं । मुकुटधर पाण्डेय जी हमारे गुरू जनों में हैं ....ये अभी और बैठेंगे... नाश्ता कब आया, नाश्ते में क्या-क्या था, कब खत्म हुआ, हमें इसका भान ही न हुआ हो, हमारे आँख कान, जिव्हा से ज्यादा सक्रिय थे हम उनके शब्द पकड़ लेने को समुत्सुक थे। महादेवी बताने लगीं में बिलासपुर हो आयी हूँ वहाँ भरतेन्दु साहित्य समिति ने मेरा वर्षों से पहले सम्मान किया था। प्यारे लाल गुप्त, द्वारिका प्रसाद तिवारी, जैसे साहित्यकारों का आयोजन था। सहसा ही उन्हें कुछ स्मरण सा होने लगा-बोलीं पाण्डेय जी कैसे हैं, अब अस्सी पार कर गये होंगे । मैंने कहा नब्बे पार कर चुके हैं । फिर वे एक-एक बातें पूछने लगी, चल फिर सकते हें, पढ़ते हैं । और पत्रों का तुरन्त जबाव देते हें । मैंने यह भी बतलाया, उनके पास भी कई याचकों के पत्र आते रहते हें । और वे भी आप जैसे यथासंभव मदद करते रहते हैं । फिर महादेवीजी मुकुटधर पाण्डेय के अग्रज पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय द्वारा संपादित कविता कुसुम माला के चौथे संस्करण (1933) की चर्चा करती हुई बोली यह हिन्दी का पहला काव्य संकलन था, जिसमें नये पुराने कवियों की रचनाएं एक साथ रखी गई है । मैने कहा चौथे संस्करण में तो आपकी भी रचना है। यह बात सुकर वे प्रसन्न हो गई। बोली देखो बाहर वर्षा हो रही है, एक-एक काफी और पी लो, वर्षो थम जाए तब जाना तुरन्त काफी आ गई कप उठातेउठाते उनकी एक कविता मुखर होने को बेताब हो रही थी, मैने भीतर ही भीतर गूंजने दिया,बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी-

 

घोर तिमिर छाया चारों ओर

घटाएं घिर आई घनघोर ।

वेग मारुत का है, प्रतिकूल

हिल जाते है पर्वत

गरजता सागर बारम्बार

कौन पहुँचाएगा उस पार

 

       कृतज्ञ भाव से हमने महादेवी जी से विदा लेना चाही तो उन्होंने अन्ततः पूछ ही लिया, तुम भोपल नही चल रहे हो परसों मेरी फ्लाईट है चलना चाहो तो साथ चल सकते हौ। मैने अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी । दरअसल महादेवी जो मुझे कोई चर्चित लेखक समझ रही थी शायद इसीलिए यह आग्रह कर बैठी वरना अपनी क्या हस्ती उनके बगल में बैठकर हवाई यात्रा करें । संकोचवश ही मैने असमर्थता व्यक्त की थी। दरअसल बड़ों के साथ बैठने की योग्यता बहले ही हासिल कर लेनी चाहिए वर्ना बड़ों के आशीर्वाद को ही जीवन का पाथेय समझ संतोष कर लेना चाहिए। महादेवी जी की रचनाएं जब भी बढ़ता हूँ उनका सौम्य मुखमंडल आँखों में उदीप्त हो उठता है-

 

गये तब से कितने युग बीत  

हुए कितनी दीपक निर्वाण

नहीं पर मैने पाया सीख

तुम्हारा सा मन मोहन गान  

 

 

 

संस्मरण

जो मरता है वह सबल है जो भय करता है वह निर्बल है - यशपाल

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