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गुरुदेव और बापू |
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विष्णु प्रभाकर |
गुरुदेव और बापू दोनों का लक्ष्य एक ही था परंतु मार्ग उनके भिन्न-भिन्न थे।
इस भिन्नता को समझने के लिए एक उदाहरण देना पर्याप्त होगा। उस
बार गाँधीजी को शांति निकेतन जाना था। गुरुदेव ने इनके स्वागत
के लिए जोरदार तैयारी की। उलके ठहरने के कमरे को बड़े कलात्मक
ढंग से सजाया, ऐसा कि उसका सौंदर्य, देखने वाले को मुग्ध कर
देता था।

गाँधीजी आये। साथ में खादी प्रतिष्ठान के सतीश बाबू आदि और भी साथी थे। सभी
का स्वागत प्रचीन वैदिक पद्धति
से किया गया। गुरुदेव ने स्वयं अपने हाथ से गाँधीजी के भाल पर
चंदन और कुंकुम का टीका लगाया
और फिर ले चले सबको उनके आवास-स्थल की ओर। गाँधीजी ने अपने
कमरे की सजावट पर एक दृष्टि डाली और बड़े जोर से हँस पड़े।
बोले, ‘यह
सब क्या है ?
आखिर मुझे इस सुहाग कमरे में क्यों लाया गया
?’
गुरुदेव भी कम विनोदप्रिय नहीं थे। कहा,
‘आप
यह न भूलें कि यह एक कवि का आवास है।’
गाँधीजी ने पूछा, ‘अच्छा, तो फिर वधू कहाँ है
?’
कवि बोले, ‘हमारे ह्रदयों की चिरयुवति रानी शांतिनिकेतन आपका स्वागत करती
है।’
गाँधीजी ने कहा, ‘सच मानो, वह इस खोखले मुँह के बूढे़ भिखारी को मुश्किल से ही
दूसरी बार आँख उठाकर देखेगी।’
गुरुदेव बोले, ‘नहीं, सो नहीं होगा। हमारी रानी ने सदा सत्य को प्यार किया है
और इस लंबी अवधि में उसी की पूजा की है।’
गाँधीजी हँसे, ‘तब तो इस खोखले मुँह के बूढ़े आदमी के लिए भी यहाँ कुछ आशा है।’
दुसरा दिन आया। गुरुदेव मेहमानों की सुख-सुविधा की देखभाल के
लिए मेहमानघर पहुँचे। देखते हैं सब लोग कभी के उठकर अपने-अपने
काम में लग चुके हैं प्रार्थना हो चुकी है। सतीश बाबू
लड़के-लड़कियों की एक टोली को हाथ के पींजन से
कपास
धुनना सिखा रहे हैं। पींजन का स्वर जैसे संगीत का स्वर हो।
गुरुदेव को यह स्वर बहुत प्यारा लगा।
वहाँ से पहुँचे वे गाँधीजी के कमरे में। चकित रह गए। कमरे का
सारा श्रृंगार उतार दिया गया था। गाँधीजी का पलँग खिली छत पर
पड़ा हुआ था। चारों ओर फाइलें थीं, चरखे थे। विनोदप्रय गुरुदेव
बोले, ‘हरे राम, हरे राम !
भला इस सुहाग के कमरे का क्या हुआ
?
देखता हूँ कि दुलहिन जहाँ की तहाँ है, पर क्या दूल्हा भाग गया
है ? ’
गाँधीजी भी जोर से हँस पड़े। उत्तर दिया,
‘मैं
तो पहले ही चेतावनी दे चुका था कि दुलहिन बिना दाँत के बूढ़े
आदमी को गाँठने वाली नहीं है।’
इस विनोदप्रिय घटना के पीछे इन दोनो महापुरुषों के चिंतन और
कर्म में जो अंतर दिखाइ देता है, उसको इन दोनो के संपर्क में
रहने वाले स्वर्गीय गुरुदयाल मल्लिक के इन शब्दों में व्यक्त
किया जा सकते है, ‘गाँधीजी की दृष्टि में यह जगत् प्रभु का एक कार्यालय
था। गुरुदेव की दृष्टि में यह जगत् भगवान् का एक बगीचा था; परंतु दोनों ने अविरत कार्य में अपना जीवन बिताया। एक का काम
था आनंदमय करना और दूसरे का काम था आनंद उत्पन्न करना।
‘एक
ने यह माना कि जीवन संगमरमर का एक ढेर है पर दूसरे ने यह माना
कि जीवन प्रेम का अभिसार है। इसलिए गाँधीजी ने उस अनगढ़ ढेर
में से मूर्तिकार के समान मूर्ति गढी़, दूसरे ने फूल बीने और
अपनी प्रिया की वेणी का श्रृंगार किया; पर दोनों ने जीवन को स्वीकार दिया। एक ने सेवक के रुप में और
दूसरे ने संगीतकार के रुप में। एक ने दासी के रुप में और दूसरे
ने कुमारी के रुप में।’
गाँधीजी कर्मयोगी थे, गरुदेव कवि थे। गाँधीजी ने कहा,
‘दर्द
मनुष्य को पवित्र करता है। बिना दर्द से पवित्र हुए किसी देश
का उत्थान नहीं हुआ।
जननी इसीलिए दर्द सहती है कि उसके बच्चे जीवित रह सकें। ‘मैंने
सदा एक ऊँचा शूद्र-मानवता का सेवक-बनने की आकांक्षा की है।’
कवि ने कहा है, मुझे यह तारों से भरा-पुरा अंधकार बहुत अच्छा
लगता है। जब दुनिया के झगड़े-रगड़े मिट जाएँगे, तब भी इन तारों
की सत्य-साक्ष हमेशा की तरह वैसी रहेगी जैसी कि हजारों वर्ष से
रहती आयी है। वे तो हमेशा शांत, शिव अद्वैत का गीत गाते रहते
हैं।’
कवि ने जो कुछ कहा, वह भी प्रेम ही है। प्रेम के अभाव में
काव्य जन्म नहीं लेता है। प्रेम न हो तो कोई
सेवा कैसे करेगा ? अहिंसा प्रेम ही तो है और ईश्वर-वह सत्य भी है, सर्वोत्तम
सौंदर्य भी है और सर्वोच्च प्रेम भी और सबसे गरहा दर्द भी।
दर्द न हो तो कोई कवि हो सकता है, न कर्मयोगी।
दोनों के विचारों की मूल आत्मा को समझें तो वहाँ यही दर्द
कुण्डली मारे बैठा है। तभी तो दोनों जीवन-भर कोलाहल में संगीत
पैदा करते रहे। जड़ को चेतन करना, संघर्ष में से सहयोग जुटाना,
बुराई में से भलाई उपजाना भी तो कोलाहल में संगीत पैदा करना
है।
फिर भी उनके जीवन में ऐसे अवसर आए जब दोनों के चिंतन की धारा
दो विपरीत दिशाओं में बहती दिखाई दी। सन् 1934 के बिहार भूकंप
को गाँधीजी ने हमारे पापों का दण्ड घोषित किया था तब कवि ने
जोरदार शब्दों में इस अंधविश्वास का प्रतिवाद किया। उससे भी
बहुत पहले सन् 1921 में कवि ने गाँधीजी के असहयोग के सिध्दांत
को खण्डन और निराशा का सिध्दांत कहकर उसका विरोध किया था। तब
बड़े जोरदार शब्दों में गाँधीजी ने इसका प्रतिवाद करते हुए
प्रतिवाद करते हुए कहा था,
‘हम
लोगों ने ‘नहीं’
कहने की शक्ति बिलकुल गँवा दी है। सरकार के किसी काम में
‘नहीं’ कहना पाप और अराजकता गिना जाने लगा था। जिस तरह से कि बोने से
पहले निराई करना बहुत जरुरी है, उसी तरह से सहयोग करने के पहने
जान-बुझकर, पक्के इरादे के साथ, असहयोग करना हम लोगों ने जरुरी
समझा है।’
कवि का चरखे में भी वैसा विश्वास नहीं था। तब गाँधीजी ने कहा
था, ‘मैं
यह नहीं चाहता कि कवि अपना संगीत छोड़ दे, किसान अपना हल, वकील
अपने मुकदमे और डॉक्टर अपना शल्य-शालक्य। मैं तो उनसे सिर्फ
तीस मिनिट रोज कातने का त्याग चाहता हूँ। मैंने भूखे मर रहे
बेकार स्त्री-पुरुषों को गुजारे के लिए और अधपेट रहने वाले
किसानों को अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए और अधपेट रहने वाले
किसानों को अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए चरखा कातने की सलाह जरुर
दी है।’
उन्होंने कवि को लिखे,
अपने एक पत्र में जैसे अपनी आत्मा उँड़ेल दी है, जैसे वे भी
कवि हो उठे हैं । उन्होने लिखा
‘अपने
काव्य के प्रति सच्चा रहकर यदि कवि आगामी कल के लिए जिंदा रहता
है और दूसरों को भी इस कल के लिए जीवित रहने का आदेश देता है।
वह हमारे चकित चक्षुओं के सामने उन सुंदर चिड़ियों के सुंदर
चित्र खिंचता है जो उषा के आगमन पर महिमा के गीत गाती हुई
शून्य में अपने रंगीन पंखों से उड़ान भरती हैं। ये चिड़ियाँ
दिन-भर का अपना भोजन प्राप्त करती हैं और रात के आराम के बाद
अकाश में उड़ती हैं। उनकी रगों में पिछली रात नए रक्त का संचार
हो चुका है, पर मुझे ऐसे पक्षियों को देखने से वेदना भी हुई है
जो निर्बलता के कारण अपने पंख फड़फड़ाने का साहस भी नहीं कर
सकते। भारत के विस्तृत आकाश के नीचे मानव पक्षी रात को सोने का
ढ़ोग कर सकते। भूखे पेट उसे नींद नहीं आती और जब वह सुबह
बिस्तर से उठता है तो उसकी शक्ति पिछली रात से कम हो जाती है।
लाखों मानव-पक्षियों को रात-भर-प्यास से पीड़ित रहकर जागरण
करना पड़ता है अथवा जाग्रत स्वप्नों में उलझे रहना पड़ता है।
यह अपने अनुभव की, अपनी समझ की, अपनी आँखों देखी अकथ दुःख
पूर्ण अवस्था और कहानी है। कबीर के गीतों से इस पीड़ित मानवता
को सांत्वना दे सकना असंभव है। यह लक्षावधि भूखी मानवता, हाथ
फैलाकर, जीवन के पंख फड़फड़ाकर, कराहकर, केवल एक कविता माँगती
है, ‘पौष्टिक
भोजन’।’
इसीलिए कवि ने दो शब्दों में उनके लिए कहा थी,
‘वह
विचारों से नहीं, मनुष्य से प्रेम करते हैं।’
मतभेद एक दूसरे को समझने में रुकावट नहीं होते। दोनों ने
एक-दूसरे को अच्छी तरह पहचान लिया था। तब की बीत है जब गुरुदेव
शांतिनिकेतन के लिए धन-संग्रह करने निकले थे। वह बहुत वृद्ध हो
चुके थे, फिर भी स्वयं मंच पर आते थे। गाँधीजी को यह सब अच्छा
न लगा। क्या यह हमारे लिए लज्जा की बात नहीं है-वे बार-बार
सोचते। उनसे रहा नहीं गया। उन्होंने महादेव देसाई को बुलाया।
कहा, ‘महादेव
! तुम्हें पता है कि गुरुदेव दिल्ली आए हुए हैं। वह अपनी संस्था
के लिए धन संग्रह करना चाहते हैं। इसके लिए वह देश–भर में नाटक खेलेंगे।’
महादेव देसाई ने उत्तर दिया,
‘हाँ बापू, मुझे मालूम है।’
एक क्षण बाद महादेव देसाई ने फिर कहा,
‘आपको
याद है बापू कि दक्षिण अफ्रीका से लौटकर जब आप गुजरात में
आश्रम स्थापित करना चाहते थे तब पूना में गोखले ने अपने सहायक
को बुलाकर कहा था कि आपको जितने रुपयों की जरुरत पड़, वह देता
जाए। कितने उदार थे गोखले।’
गाँधीजी तुरंत बोल उठे,
‘तुमनें ठीक याद दिलाया। अच्छा तुम अभी गुरुदेव के पास चले जाओ
और उनसे पूछो कि उन्हें कितने रुपयों की आवश्यकता है। उसके बाद
तुम श्री अमुक के पास चले जाना। मैं पत्र लिख दूँगा। वह
गुरुदेव के लिए उतना रुपया गुप्तदान के रूप में दे देंग ।’
और गुरुदेव को जितना चाहिए था, उतना रुपया मिल गया। वह
शांतिनिकेतन लौट गए।
यह सब इसीलिए तो संभव हुआ कि गाँधीजी गुरुदेव को सचमुच पहचानते
थे। उनके मानव-प्रेम को उन्होंने प्रत्यक्ष देखा था तभी तो वे
लिख सके थे, ‘गुरुदेव
ने जो रोशनी फैलाई वह आत्मा के लिए थी। सूरज की रोशनी जैसे
हमारे शरीर को फायदा पहुँचाती है वैसे ही गुरुदेव की फैलाई
रोशनी ने हमारी आत्मा को ऊपर उठाया है। वह एक कवि थे। यही
क्यों, वह एक ऋषि थे। उन्होंने कवि के नाते ही नहीं, ऋषि की
हैसियत से भी लिखा है। वह एक कलाकार थे, नृत्यकार थे और गायक
थे। बढ़िया से बढ़िया कला में जो मिठास और पवित्रता होनी चाहिए
वह सब उनमें और उनकी चीजों में थी। नई-नई चीजें पैदा करने की
उनकी ताकत ने हमको शांतिनिकेतन, श्री निकेतन और विश्व भारती
जैसी संस्थाएँ दी है। उनके रचे कौमी गीत को आप सुन चुके हैं।
हमारे देश के जीवन में इस गीत की एक जगह बन गई है। यह सिर्फ
गीत ही नहीं है, बल्कि भक्ति-भाव से भरा भजन भी है।’
गाँधीजी गुरुदेव की प्रतिभा का सम्मान करने से कभी नहीं चुके
और गुरुदेव तो, उस समय जब गाँधीजी ने सांप्रदायिक निर्णय को
लेकर आमरण अनशन करने का निश्चय किया तो भाव-विभोर होकर पुकार उठे थे,
‘मैं
इस जन्म में भी और उस जन्म में भी उनका अनुसरण करूँगा।’ उन्होंने काले वस्त्र पहनकर शांतिनिकेतन की एक सभा में उपवास
के महत्तव पर प्रकाश डाला और श्रोताओं को कमर कसकर अस्पृश्यता
निवारण के काम में जुट जाने को उद्बोधित किया। उपवास शुरु करने
से पूर्व गाँधीजी ने गुरुदेव को लिखा था,
‘...यदि आपकी अंतरात्मा मेरे कार्य की निंदा करे तो भी आपकी
आलोचना को बहुमूल्य समझूँगा। आपका यदि मेरे कार्य को पसंद करे
तो मैं आपका आशिर्वाद चाहता हूँ। उससे मुझे सहारा मिलेगा।’
पर गुरुदेव तो पत्र मिलने से पूर्व ही तार दे चुके थे,
‘भारत
की एकता और सामाजिक अविच्छिन्नता के लिए बहुमूल्य जीवन का दान
श्रेयस्कर है। हम लोग ऐसे ह्रदयहीन नहीं हैं कि इस राष्ट्रीय
वज्रपात को चरम सीमा तक पहुँचने दें। हमारे व्यथित ह्रदय आपकी
लोकोत्तर तपश्या को श्रद्धा और प्रेम से निहारते रहेंगे।’
उन्होंने ‘मृत्युंजय’
शीर्षक से एक लंबी कविता लिखी है। उसमें वे जैसे भविष्यवाणी कर
जाते हैं गाँधीजी के बलिदान की और उनके संदेश के पुनर्जीवित
होने की।
‘मृत्युंजय’ को उनके अधीर शंकालु साथी ही समाप्त कर देते हैं और फिर रोते
हैं –
रो पड़ी औरते धाड़ मार, दल पुरुषों के हो गए दीन।
कुछ ने चुपचाप चले जाने की कोशिश की, गति मिली नहीं,
उनको शहीद मे बाँध रही थीं जो कड़ियाँ वे हीली नहीं।
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आपस में पूछ रहे हैं अब
‘पथ
हमको कौन दिखाएगा ?’
बोला पूरब का वृद्ध जिसे मारा है वही दिखाएगा।
सब मौन और नतशिर, बूढे़ ने फिर से कहा-जिसे हमने
संशयवश त्यागा और क्रोधवश हत्या की यदी आज उसे
हम करें प्रेम से ग्रहण, न क्यों वह महाप्राण
हम सबके जीवन में होगा संजीवित, वह है मृत्युंजय।
सब खड़े हो गए, कण्ठ मिलाकर गाया-जय जय मृत्युंजय।
यह कविता किसी टिप्पणी की अपेक्षा नहीं करती। वस्तुतः गुरुदेव और बापू के
संबंध भी किसी टिप्पणी की अपेक्षा नहीं करते। समझ और स्नेह से
पुर्ण वे संबंध इस बात को प्रमाणित करते हैं कि दोनों मनुष्य
जाति के प्रति प्रगाढ़ प्रेम से प्रतिबद्ध थे। एक ने उसके दुखी
दिल को दिलासा दिया तो दूसरे ने उसे आत्मा का आनंद दिया।
एक बार फिर श्री गुरुदयाल मल्लिक के शब्दों में कहें,
‘गाँधीजी
मानते थे कि व्यक्तिगत समस्या जगत् की समस्या है, गुरुदेव
मानते थे कि जगत की जो समस्या है वही व्यक्तिगत समस्या है;
पर दोनों जानते थे कि जीवन एक सीधी लकीर नहीं है, एक वर्तुल
है।’
यह जानना ही सत्य है। शेष सब ऊहापोह है; क्योंकि संगीत का आनंद और किसी वस्तु के निर्माण का
आनंद एक ही है। कल्पना और कर्म, स्वप्न और सत्य, मनुष के विकास
और पूर्णता के लिए दोनों अनिवार्य है। इसलिए ईश्वर को सत्य ही
नहीं, सौंदर्य और प्रेम के रुप में भी पहचाना जाता है। इसीलिए
कवि ने स्वयं एक दिन कहा था,
‘शांतिनिकेतन आनंदमय सत्य का प्रतीत है, साबरमती तपोमय सत्य का।’
अर्थात् गुरुदेव सत्य को आनंद के माध्यम से प्राप्त करते थे और
बापूजी तप के द्वारा। अंतर साधन का था, साध्य का नहीं।

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