
|
‘रामचरितमानस’
में शक्ति-भक्ति
का संगम |
|
विवेकी राय |
गोस्वामी
तुलसीदस के ‘मानस’
में शक्ति और भक्ति
का कलात्मक संगम है । शक्ति के प्रभाव से उसके
भीतर दूसरों को झुकाने वाले तत्त्व प्रभावी दृष्टिगोचर होते
हैं और भक्ति के प्रभाव से दूसरों के सामने झुकने की विनय,
विनम्रता के भाव दृष्टिगोचर होते हैं । यह शक्ति का ही प्रकाशन
होता है कि ‘रामचरितमानस’
में गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि जिस कविता को बुधजन आदर
नहीं देते हैं अथवा प्रबुद्ध सहृदयों की दृष्टि में जो कविता
आदरणीय नहीं होती है उस कविता के नादान स्रष्टा व्यर्थ ही
परिश्रम करते हैं । ठीक उसके विपरीत भक्तिभाव के प्रभाव से
गोस्वामी जी अपने बारे में घोषित करते हैं कि मैं न तो कवि
हूं, न मुझे काव्य-रचना का ज्ञान है और मेरे पास कोई एक भी
काव्य-कला नहीं है । आगे वे बहुत जोर देकर कहते हैं कि मैंने
जो कुछ भी लिखा है वह केवल कोरा कागज है । इस प्रकार भक्तिभाव
के प्रभाव में और विनम्रता के प्रदर्शन में वे अपनी काव्यकला
की उत्कृष्टता को नकार तो देते हैं किन्तु उनकी यह
नकार पाठकों
की स्वीकारात्मक आस्था को और अधिक प्रौढ़ करती है ।
इस शक्ति और भक्ति का प्रभाव अनेक आयामों में प्रकाशित
होकर व्यक्ति को और समाज को प्रभावित और उत्प्रेरित
करता है । स्वयं कवि में इसकी रंगत का एक संकेत ऊपर दिया जा
चुका है। विस्तृत रूप से वह कवि की भाषा और उसके शिल्प में घुल-मिलकर
कुछ और ही भाव और विचार-तरंगों में गहरी संक्रमणशीलता के साथ
प्रस्फुटित होता है । इसका एक तीसरा महत्त्वपूर्ण आयाम जनसमुदाय
पर पड़नेवाले प्रभावों से सम्बद्ध है । यह एक निर्विवाद तथ्य
है कि किसी एक ग्रन्थ ने भारतीय जनमानस को उतनी दूर तक और उतनी
देर तक प्रभावित नहीं किया है जितना
‘रामचरितमानस’
ने । बीतते हुए समय के साथ और यहां तक कि आधुनिक विज्ञान
प्रभावित बुद्धिजीविता की शताब्दी में भी उसकी प्रासंगिकता को
पूर्णतः नकार देना असम्भव है
। भक्त में छिपी शक्ति और शक्ति में निहित भक्ति की
समझ यद्धपि नये युग के खाते से लगभग
खाली है;
फिर भी संस्कार रूप से जातीय जीवन और सांस्कृतिक समूह-मन में
उक्त दोनों की अवधारणाएं
तथा उनके प्रति सम्मान-भाव अभी भी बना
हुआ है । इस
एक सूत्र के सहारे आन्तरिक स्तर पर
‘रामचरितमानस’
की प्रेरक भाव की अवशिष्ट स्थिति को स्वीकार करना पड़ता है। एक
दिन एक नया चौंकाने वाला तथ्य एक ग्रामीण ने बताया । प्रसंग
गांव की शान्ति और
अशान्ति का था । उसने बताया कि पुराना गांव
गरीब वा लेकिन शान्ति और सद्भाव में जीता था । नये गांवों में
अपेक्षाकृत अधिक समृद्धि तो आयी है परन्तु इसी के साथ यहाँ पर
अशान्ति भी पैर तोड़कर बैठ गई है । आगे इस स्थिति का कारण बताते
हुए उसने कहा कि पुराना गांव तुलसीदास के
‘रामचरितमानस’
अर्थात् रामायण के शासन की छत्रछाया में जीता
था । घर-घर में उसकी पूजा होती थी । चौपालों में उसकी
चौपाइयाँ गूंजती रहती
थीं । रामायण का भक्त तुलसी का भक्त होकर अनायास राम का भक्त
हो जाता था और यह भक्ति अपने आप में सम्पूर्ण रूप से एक सामूहिक
शान्ति का वातावरण बन जाया करती थी ।
उस ग्रामीण का कथन झूठ नहीं था । उसकी सच्चाई में मैं
इतना और जोड़ देना चाहता हूँ कि तब गांवों में तुलसी की
राम-कथा का शासन ही नहीं बल्कि उसका प्रभाव एक आन्तरिक अनुशासन
के रूप में व्यपाक रूप से विकसित रहता है और अब तो जैसे
रामायण का प्रचार-प्रभाव अथवा पठन-पाठन पूर्णतः समाप्त हो गया
है। कुछ बातें बहुत चकित करती हैं । चर्चाओं
में गांव के वे पुराने लोग जो रामायण के भक्त थे और अपने
जीवन में उसे जीते
थे जब उभरते हैं । तो ऐसा लगता है कि वे लोग सचमुच शान्तिदूत
थे । उन्होंने अपने चारों ओर
प्रेम, सेवा, त्याग, सहयोग, सहकार, न्याय, समत्व और
भाईचारे आदि का
एक बहुत ही जीवंत परिवेश बना दिया था । इस प्रकार
‘रामचरितमानस’
का भक्ति तत्त्व गांवों में स्वतः में स्फूर्त
वैयक्तिक-सामाजिक अन्तरानुशासन के रूप में विकसित रहा । इसी
सूत्र के सहारे उसके शक्ति-तत्त्व को भी
अन्वेषित करने की
चेष्टा करें तो हमें निराश नहीं होना पड़ेगा ।
गांवों का सूक्ष्म रूप से अध्ययन करने वाले लोगों को
नये और पुराने गांवों में एक दूसरा महत्तवपूर्ण अन्तर और भी
दिखाई पड़ता है । पुराने ग्रामीण खुले मन-मस्तिक वाले लोग हुआ
करते थे । वे जिस खुले मन से मिल-जुलकर रहते थे उसी मुक्त-मन से
झगड़े और मारपीट भी किया करते थे । वे क्रोध को छिपाकर बैर के
रूप में पालते-पीसते नहीं थे बल्कि चटपट सिर-फूटौवल करके निकाल
डालते थे । उनमें सहज और निष्कपट शक्ति होती थी, जिसके प्रभाव
से अपने मारपीट और झगड़े को विद्वेषपूर्ण अलगाव में नहीं परिणत
होने देते थे । देखा जाता था कि आज ही झगड़े की चोट-चपेट में वे
घायल हुए, हाथ-पैर टूटा, अथवा सिर फूटा और दूसरे ही दिन यदि
भोजभात पड़ा तो पत्तल पर साथ-साथ बैठकर हंसते-बोलते हुए
लक्ष्मीनारायण कर रहे हैं, जैसे कल कुछ हुआ ही नहीं । उक्त
परिस्थितियों में अगर मामला अदालत में गया तो यह भी देखा जाता
कि वे साथ-साथ प्रेमपूर्वक बात करते शहर में जाते हैं, एक साथ
खाते-पीते हैं, सुरती
तमाखू भी साथ-साथ चलता है, लगता है कचहरी
नहीं, किसी बरात में आए हैं और पुकार पड़ने पर उसी प्रकार
मुक्त मन से हाकिम के सामने अपने-अपने
वकीलों को लेकर खड़े हो
जाते हैं । आज के आदमी के भीतर ऐसी सहज-शक्ति ढूंढने पर भी नहीं
मिलेगी ।
यह बात यहां पूरे विश्वास के साथ कही जा सकती है कि
ग्रामीणों में तब की उस मुक्तमनतापूर्ण शक्ति का स्त्रोत वह
भक्ति हुआ करती थी जो रामायणी परिवेश से उपजती थी । आज का
ग्रामीण तो निश्चित रूप से
बहुत ही शक्तिहीन
है क्योंकि वह मुक्त
मन एकदम नहीं रह गया है । युगीन राजनीतिक परिवेश ने और
बहुआयामी अवमूल्यन की स्थितियों ने उसके मन को परत-दर-परत
छल-छद्म और तिकड़मों से विषाक्त कर दिया है ।
अब वह लाठियों से
मारपीट-झगड़ा भी नहीं कर रहा है और न ही कहीं वैसी सिर-फुटौवल
दिखाई पड़ती है । नवयुग का ग्रामीण और-और तरह के भीतरघात के
चक्कर में रहता है अथवा अन्यान्य साधनों से कायरता पूर्वक
क्रूर प्रहार करता है । झगड़े में उनकी सहज शक्ति का प्रदर्शन न
होकर छल-बल ही अधिक
प्रकाशित होता है । भक्ति का सर्वहारा स्वतः
शक्ति का सर्वहारा बन जाता है । राजनीति पतन के गर्त में चाहे
जितने गहरे ढकेल दे, अभ्युदय के सूत्रघार राम का स्थान कैसे ले
सकती है ?
सो भी, गाँवों के
ऊपर अधकचरी राजनीति की छाया भर पड़ती है ।
कहाँ यह राजनीति की छाया-माया और कहां माया-पति राम के
चरित-मानस का प्रभाव
?
राम को तुलसी ने भक्ति और शक्ति के अनन्य स्रोत के रुप
में चित्रांकित कर भारतीय जीवन को वह संजीवनी दी है जिसके
प्रभाव से वह अनन्त काल तक जीवंत बना रहेगा । समय-चक्र में
अवमूल्यन की स्थितियां तोड़ती अवश्य है । परन्तु महाकाव्य के
शाश्वत प्रभाव की लहरें अनुकूल समय पर अपना प्रभाव दिखाये बिना
नहीं रहेंगी । इसका अर्थ यह नहीं कि पुराना समय अपने मुल रुप
में लौट आएगा । गया वक्त लौटता नहीं है
। लेकिन वक्त से ऊपर उठा
कोई कालातीत महाकाव्य तुलसी के
‘रामचरितमानस’
जैसा समाधि-भाषा का देवकाव्य, अवश्य ही न कहीं जाता है और न
लौटता है । अनुपस्थित बस हम होते हैं । वह दिन कितनी धन्यता से
पूर्ण होगा जब हमारी अनुपस्थिति की श्रृंखला टूटेगी और हम
‘रामचरितमानस’
की शक्ति और भक्ति को आत्मसात कर मनुष्य बन सकेंगे । तात्विक
रुप में शक्ति और भक्ति एक-दूसरे की पूरक हैं । भक्ति के भीतर
जो कमी होती है वह शक्ति से पुरी है और शक्ति के भीतर जो
अधिकता होती है वह भक्ति को द्वारा समायोजित होती है । दोनों
तत्व एक-दूसरे से मिलकर एक-दूसरे को सम्पूर्णता और सार्थकता
प्रदान करते हैं ‘रामचरितमानस’
को जीवन की इसी सम्पूर्णता और सार्थकता के
प्रदाता महाकाव्य के
रुप में रेखांकित करना उचित होगा
। यह तर्क कि ऐसा करना प्राचीनता की ओर लौटना होगा,
अर्थहीन है क्यों कि काव्य-कला प्राचीनता और नवीनता दोनों से ऊपर
जीवन के मूलभूत शाश्वत सत्यों से जुड़ी हुई होने पर ही अमरत्व
प्राप्त करती है । अगर
‘रामचरितमानस’
के अमरत्व में हमें सन्देह नहीं है तो उसके भीतर जीवन के
शाश्वत सत्यों के निहित होने का तथ्य भी हमें दुविधाहीन होकर
स्वीकारना होगा ।
इसी के साथ इस बात को भी स्वीकारना होगा कि
‘रानचरितमानस’
सम्पूर्ण रूप में मात्र भक्ति ग्रन्थ नहीं है । वास्तव में वह
भक्ति के साथ-साथ शक्ति-ग्रन्थ है । वह केवल निवृत्ति औरर
वैराग्य का ही सन्देशवाहक नहीं है बल्कि वह बहुआयामी
जीवन-संघर्ष अथवा जीवन-युद्ध का संदेशवाहक भी है ।
यह कितना उत्साहवर्धक तथ्य है कि भारतीय जन-मानस में
सर्वाधिक समादृत दो ग्रन्थ,
‘श्रीमदभगवदगीता’
और ‘रामचरितमानस’
हमें जीवन-युद्ध
में स्थितप्रज्ञ होकर जूझने के लिए ललकारते हैं, उत्प्रेरित करते
हैं और इसी का ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं । राम-कथा का
युद्ध महाभारत-युद्ध से बहुत अधिक रोमांचक, भयावह और
ध्यानाकर्षक इस अर्थ में है कि वह सैन्य-साधन-हीन
और सैन्य-साधन-संपन्न के बीच होता है । इसकी मु्ख्य प्रतिज्ञा
‘रामचरितमानस’
के बालकाण्ड में उस जगह पर द्रष्टिगोचर होती है जिस जगह पर
ऋषि-मुनियों की ठठरियां देखकर राम के द्वारा
धरती को निशाचरहीन करने की प्रतिज्ञा की जाती है । बहुत से लोग
इस मुख्य प्रतिज्ञा को उस दोहे के रूप में स्थापित करना चाहते
हैं जिसमें तुलसी इस बात पर खेद प्रकट करते हैं कि जो
हरि-भक्ति –
पथ श्रुति-सम्मत है तथा जो विरति-विवेक से संयुक्त है उसे
छोड़कर मोहवश लोग अनेक पंथों की कल्पना करते हैं । इस प्रकार
उनके द्वारा भक्ति को
‘मानस’
का बीज कहा जाता है। किन्तु प्रश्न यह है कि
‘रामचरितमानस’
और रामकथा का मुख्य कार्य यदि रावण-वध है तो फिर उसके भीतर
मुख्य तथ्य अथवा उसका बीज शक्ति तत्त्व हुआ न कि भक्ति
?
इसका अर्थ यह नहीं है कि भक्ति की महत्ता कम है । वह
तो अखिल शक्ति के स्त्रोत से जीव को जोड़ देती है और तब
सामान्य जीव भी प्रभुसत्ता से सम्पन्न हो जाता है । इसीलिए
समर्पण की शक्ति सर्वोपरि है । अर्जुन में यथार्थ रूप में
शक्ति का जो स्त्रोत था वह उनका कृष्ण के प्रति समर्पण था।
‘रामचरितमानस’
की लोकमंगल-सिद्धि के भीतर भी उक्त दोनों का समायोजन मूल में
है । तुलसी के द्वारा अंकित लक्ष्मण-परशुराम वाला पूरा प्रकरण
शक्ति और भक्ति के समायोजन का उदाहरण है । मंथरा और कैकेयी को
छोड़कर इसके हर पात्र में यह समायोजन मिलता है
।
जिस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास
‘रामचरितमानस’
में सारे जगत को सीताराममय देखते हैं उसी प्रकार इस ग्रन्थ के
रसज्ञ भावकों द्वारा इसे सीताराममय देखने में सन्तुष्टि होती
है । उन्हें सीता में भक्ति-तत्त्व के साक्षात्कार से अनुपम
आनन्द मिलता है। न केवल वस्तुतत्त्व में ही बल्कि इसके
शिल्पतत्त्व में भी कुछ ऐसी ही स्थिति है । इसके भीतर निहित
संस्कृत भाषा और शास्त्रीयता की सम्पदा में यदि शक्ति है तो
लोकभाषा और लोकतत्त्व में भक्ति का आर्द्र रामतत्त्व निहित है
।
इसी प्रकार ‘मानस’
में घुला अद्वैतवाद आदिशक्तितत्त्तव है तो उसमें मिलने वाला
विशिष्टाद्दैतवाद भक्ति की विजयवैजयंती को फहराता दृष्टिगोचर
होता है ।
इसके मुख्यरसो में वीररस यदि शक्ति को तो शान्त रस
भक्ति को प्रकाशित करता है । इसका महाकाव्य-तत्त्व शक्ति को
लेकर सृष्ट होता है
तो पुराण-तत्त्व उसमें भक्ति की भांति जुड़ता है ।
वास्तव में रामराज्य की जो कल्पना है और उसका जो
मेरुदण्ड है वह शक्ति और भक्ति का समन्वित रूप ही है । प्रजा
को दुखारी करने वाला निरंकुश राजा नरक-अधिकारी होगा क्योंकि
उसमें भक्ति-रहित शक्ति और नीति-रहित राज की स्थिति होगी
। ‘रामचरितमानस’ में परिकल्पित –‘नहिं
दरिद्र कोऊ दुखी न दीना’
वाला रामराज्य को वास्तविक अर्थ में प्रजातन्त्र है क्योंकि
प्रजा यदि भक्ति-रूप है तो तन्त्र शक्ति-स्वरूप है । दोनों के
तालमेल में ही सार्वजनिक जीवन की समरसता सुरक्षित रह सकती है ।
वर्तमान काल में इसी समरसता के खंडित होने का वह परिणाम
है कि चतुर्दिक अव्यवस्था, अराजकता, मूल्यहीनता, अनिश्चितता,
संकट-बोध, वैषम्य और विद्रोह-विस्फोट की स्थितियां दृष्टिगोचर
होती हैं । रामतत्त्व ऐसा लगता है कि दब गया है और रावणतत्त्व
उस पर पूरी तरह प्रभावी हो गया है। यहां स्मरणीय है कि राम की
परिकल्पना में भक्ति का आधार है तो रावण में शक्ति का ।
रामभक्ति (सीता)-सहित है और रावण स्वयं शक्ति तो है लेकिन वह
भक्ति (मन्दोदरी)-रहित है । वह जीवन के हर सर्वाधिक
महत्त्वपूर्ण मोड़ पर मन्दोदरी(भक्ति) की पूर्णतः अनसुनी करता
है। वह शक्ति के अहंकार में भक्ति को उपेक्षित कर घोर पराभव की
स्थिति को प्राप्त होता है।
वास्तव में हर प्रकार की निरंकुश (भक्तिहीन) शक्ति की
यही गति होती है। अगर वह भक्ति अथवा नीति से नियंत्रित नहीं है
तो अहंकार-उदधि में डूबा करता है। आज विज्ञान की शक्ति का
विकास भी कुछ ऐसे ही सन्दर्भों से जुड़ गया है और वर्तमान विश्व
की वैज्ञानिक सभ्यता जिसमें शक्ति के अहंकार का निरंकुश
चरमोत्कर्ष दृष्टिगोचर होता है, विनाश के कगार पर पहुँच गई है ।
प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस विज्ञान ने विश्व के
बुद्धिजीवियों को इस रूप में प्रभावित किया है कि उनके लिए यह
प्रत्यक्ष प्रवृत्यात्मक भौतिक जगत और जीवन ही सब कुछ हो गया
है । आज का बुद्धिजीवी निवृत्ति, प्रणति, अध्यात्म और अपरोक्ष
सत्ता की आर्द्र अनुभूतियों से रहित हो गया है ओर यही उसका
अभिशाप है।
इस अभिशाप से उसे आधुनिक विज्ञान, राजनीति, भौतिकवादी
दर्शन और अर्थतन्त्र आदि से मुक्ति पाने में सहायता नहीं मिल
सकती है । इस कार्य के लिए उसे समयचक्र-परिवर्तन के अन्तर्गत
जैसे कि आरम्भ में संकेत किया जा चुका है काव्य-कला और
अध्यात्मवादी दर्शन की शरण में जाना पड़ेगा और तभी शक्ति और
भक्ति की सामंजस्यपूर्ण समरसता का जीवन में उदय होगा । ऐसे ही
उदय को लोकमंगल के रूप में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने तुलसीदास
और उनके काव्य ‘रामचरितमानस’
में देखा है । इस समष्टिगत लोगमंगल को व्यष्टिगत जीवन-मंगल के
रूप में हम ‘रामचरितमानस’
के सहारे उतार सकते हैं ।

|