|
बचपन
में बड़ा कौतूहल होता था मन में कि यह सूखी-सूखी विरूप-सी क्या
वस्तु है, होम हो तो, कथा हो, विवाह हो तो, पूजा हो तो जरूर
मँगाई जाती है । तब हरा नारियल नहीं देखा था । उत्तर भारत के
जिस इलाके में मेरा जन्म हुआ था, वहाँ नारियल के पेड़ नहीं थे
। बस, किसी अनुष्ठान के माँगलिक द्रव्यों की सूची बनती थी तब
नारियल उसमें अवश्य लिखा जाता था और तब इसकी सार्थकता विशेष
समझ में नहीं आती थी । कुछ बड़ा हुआ तो विवाह के अवसर पर कानों
में एक गीत पड़ा-
“खाउ
पियउ धना नरियर, बिलसउ धना सेनुर ।”
यह नववधू को आशीष दी गई है कि
‘हे
धन्या, हे अपने प्रिय की प्रिया, तुम नारियल खाओ, पीओ, नारियल
के रस-सरीखे
ऊपर से कठोर और भीतर से सरस जीवन का उपभोग करो ।
तुम सिन्दूर का सौभाग्य, अनुराम के रंगका सौभाग्य बिलसो ।’
उस समय मैं कुछ अचकचाया कि नारियल खाने-पीने के लिए क्यों कहा
जा रहा है, यह कौन-सा अमृत फल है, इसमें कौन-सी विशेषता है
?
उत्तर मुझे बहुत बाद में मिला । मेरे एक उद्यान-विज्ञानी मित्र
मिले, उन्होंने बतलाया नारियल उष्ण कटिबंध का एकदम अपना वृक्ष
है, इसका सिर आग में रहताहै और पैर जल में । जड़े रस में
निरन्तर सिक्त रहती है । शरीर, विशेष रूप से सिर निरन्तर सीधी
कड़ी धूप में उतप्त होता रहता है । यह सिचन, यह तपन दोनों
मिलकर ही तो जीवन है। ताप और रस का एकत्र संयोग ही तो जीवन का
वास्तविक भोग है ।
कुछ और समय बीता । भारवि के काव्य की प्रशंसा में मल्लिनाथ की
एक उक्ति पढ़ी कि भारवि की अर्थ गंभीर वाणी नारियल के फल की
तरह ऊपर से कठोर और भीतर से एकदम रसपूर्ण है । उसी के आसपास
भारवि के प्रदेश में जाना हुआ । पल्लवों के ऐश्वर्य की छाँह
में- तमिलनाडू में- नारियल की पंक्ति से मंडित भारत की तटरेखा
देखने को मिली, कच्चे नारियल का दूध पीने को मिला । तपती
दोपहरी में उस दूध का स्वाद विलक्षण लगा और यह मर्म खुला कि
मंगल या माँगलिक होने का अभिप्राय मधुर होना तो है ही, पर यह
नहीं कि इसमें वह कठोरता न हो तो ताप सह सके, जो इसमें अनेक
प्रकार की कुत्सितदृष्टियों को झेलने के लिए अभेद्य कवच न हों,
साथ ही इसमें एक तीसरी आँख न हो, जिसके नाते इसको त्रयम्बक भी
कहा जाता है । कठोरता के बिना मधुरता सुरक्षित नहीं रहती । ताप
के बिना द्रव नहीं बनता ।
हिन्दुस्तान एक विचित्र देश है, उसकी पहचान नदी से होती है या
वनस्पति से । उसके देशकाल का बोध या तो नदीं कराती है या
वनस्पति कराती है । विशेष रूप से काल का बोध वनस्पति ही कराती
है । उसके ऋतु-चक्र का अवतरण सबसे प्रतिरूप मानता है । सन्तान
को वासूदेव वृक्ष के रूप में देखता, है, कन्या को आँगन की
तुलसी के रूप में देखता है । माँ को दूध-भरे गाछ के रूप में
देखता है । इसीलिए बिना वनस्पति के हिन्दुस्तान का कोई भी
अनुष्ठान सम्पन्न नहीं होता । मनुष्य से मनुष्य का संबंध,
वनस्पति से वनस्पति का संबंध, लता और वृक्ष का संबंध है । एक
तरह से मनुष्य और वनस्पति की यात्रा समानांतर होती है ।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी मनुष्य का विस्तार वंश-वृक्ष बनता है । वंश
शब्द के ही दो अर्थ हैं- बाँस और पुत्र । कोई भी उत्सव होगा,
हरे बाँस की पताका फहराई जाएगी, केले के खम्बे लगेंगे, आम के
पत्तों की बन्दनवार लगाई जाएगी । कलश पर पाँच वृक्षों के पल्लव
रखे जाएँगे, उसके ऊपर नारियल रखा जाएगा । हरा नहीं मिलेगा तो
सूखा या उसके भीतर का गोला रखा जाएगा । सुपारी की पार्वती
बनेगी । दूब से हर देवता को हल्दी छिड़की जाएगी । हर चौक में
कमल के पत्तों की अल्पना रची जाएगी । कोई भी पंचोपचार या
षोडशोपचार पूजन बिना पुष्पाजंलि के पूरा नहीं होगा । कोई भी
होम नारियल की पूर्ण आहुति के बिना संपन्न नहीं होगा । किसी का
भी अभिनंदन करना हो, पान, सुपारी, हल्दी, दूब, नारियल थाल में
जरूर सजेंगे । कोई भी माँगलिक मंडप बनेगा तो पलाश के पत्तों से
बनेगा । हिन्दुस्तान का कोई भी गाँव अगर दूर से पहचाना जा सकता
है तो अमराई, बँसवारी, महुआवारी, सिसवानी, ताड़ खजूरों की
पंक्ति, केले की पंक्ति, नारिलय की पंक्ति, पाकड़ की पंक्ति या
तमाल राजी की क्षितिज रेखा से ही पहचाना जाता है । गाँव के नाम
तक पेड़ों पर होते हैं- पिपरा, बरगदवा, पकड़ी, फुलवरिया,
अमौना, जमुई, तरुकलवा, खजुराहि, सिसवा, वेलपार, इमलिया,
बाँसगाँव, कटहरवा । नदी से जनपद की इकाई का बोध होता है-
गंगापार, जमुनापार, सरयूपार, दशार्ण और वनस्पति से गाँव का, फल
से मनुष्य का । नदी प्रवाह धर्मिता और निरंतरता के कारण हमारे
संपूर्ण जीवन के समानांतर है तो वनस्पति जड़ों से जुड़कर रस
लेते रहने के कारण, निरंतर उससे नए होने के कारण, अवस्थांतर
होने के लिए तैयार होने के कारण, दूसरों के लिए छाया और फल
देने के कारण जीवन की परार्थता और सफलता की प्रतिबिम्ब बनती है
। वनस्पतियों में भी फल वाले पेड़ हमारे सांस्कृतिक जीवन में
एक विशेष महत्व रखते हैं । उनमें भी विशेष रूप से वे फल जो गोद
के गोद फलते हैं जैसे आम, केला और नारियल, सुपारी ।
ये पेड़ हमारी समष्टि चेतना के प्रतीक हैं । एक देह से अनेक
होने की फलवत्ता इनमें दिखाई पड़ती है और अनेक होकर भी एक की
पहचान रखने की अन्विति भी इनमें दिखाई देती है । इन सबका
अलग-अलग स्वाद है, रस है । पर नारियल की बात अलग है । वह
संपूर्ण जीवन है, एक कठोर आवरण में मधुर रस संहत रूप से संचित
करने वाला जीवन है । जो लोकगीत मैंने पहले उद्धृत किया था उसका
यही तो अभिप्राय है कि तुम संपूर्ण जीवन जियो, कठोर भी बनो,
मधुर भी बनो । बिना कठोर हुए, बिना कर्तव्यपरायण हुए करुणा
कहाँ से आएगी । निरी करुणा भी किस काम की, उसमें चारुता और
मंजुता के लिए ताप की पकाई चाहिए । यह जीवन केवल अपने
खाने-पीने की वस्तु नहीं है । यह उपभोक्ता नहीं है । यह
उपभोग्य है। यह उसका सौभाग्य है । सौभाग्य से वंचित भोग अंमगल
है, वैधव्य निरर्थक है । लोक साहित्य में कई बार प्रश्नात्मक
अभिप्राय दुहराया जाता है ।
“कबन
बने फरेला नारियर, कबन बने केसर हे,
सखिया कबन वन चुएला, त चुनरिया रंगाइब हे ।”
सखि, किस वन में नारियल फलता है, किस वन में केसर फूलती है,
किस वन में गुलाब खिलता है, किस रंग से मैं चुनरी रंगाऊँगी ।
उत्तर मिलता है-
“बाबा
बने फरेला नरियर, भैया बने केसर है,
सखिया सेवा बने चुएला गुलाब, च चुनरिया रंगाइब है ।”
पिता के वन में नारियल फलता है, भाई के वन में केसर फूलती है,
प्रिय के वन में गुलाब खिलता है । गुलाब के रंग से चुनरी
रँगाऊँगी । पर चुनरी तो सब कुछ नहीं, छाया भी तो कुछ है और
गहरी जड़ों से ऊपर तक खिंचकर आया हुआ संचित रस भी तो कुछ है ।
पिता का वन ऐसा ही वन है । वह नारियल का वन है, ऊपर बड़ा संयत
और कठोर, भीतर से आर्द्र । ऐसा स्नेह पिता का होता है और भाई
का स्नेह एक सुरभि होता है जो एक रंग भी होता है । माथे पर
लगता है तो माथा दमकता है और महकता भी है । प्रिय का प्यार एक
गहरा रंग होता है । वह पहचान बनता है सौभाग्य का । यहाँ
उल्लेखनीय है कि लोक साहित्य में जिससे पोषण मिलता है वह
नारियल है, वह पिता है, वह दाय है, वह विरासत है । जिस पर सपने
पलते हैं वह भाई का स्नेह है और मन जिससे रँगा जाता है वह
प्रिय का प्यार है, गुलाबों पर काँटों से बिंधा हुआ नारियल को
पिता के प्यार से जोड़ने के लिए पीछे लोकचेतना की गहरी
जीवनदृष्टि है जो अनुशासन को महत्व देती है, अनुशासित वात्सल्य
को महत्व देती है । नारियल की पूर्णाहुति के रूप में अर्पित
करने का यह भी अभिप्राय है कि अनुशासन से सधा पर भीतर रस की
उत्कंठा से दूसरों को सुख देने की कामना से भरा जीवन ही पूर्ण
जीवन है, उसी को अर्पित करके अनुष्ठान पूर्ण होता है । बिना
आत्मसंयम की दीक्षा के कोई भी स्नेह, कोई भी प्यार पूर्ण नहीं
होता ।
कुछ लोक-गीतों में नारियल सन्तान का प्रतीक है । विशेष रूप से
स्वप्न में नारियल देखने का अभिप्राय पुत्र जन्म की संभावना का
संकेत देता है । नारियल का फल यहाँ भी जीवन की संपन्नताका ही
एक बिम्ब है । उसी प्रकार सुपारी का फल स्वप्न में देखना
पुत्री के जन्म का संकेत देता है । एक दूसरे गीत में श्वसुर का
आश्रय स्त्री के लिए नारियल वन के आश्रय के सदृश वर्णित मिलता
है, यहाँ श्वसुर और पिता में तादात्म्य दिखाना प्रयोजित है ।
बिना मुखर उद्-घोषणा किए जो किसी के लिए अपना होता है, जीवन का
वास्तविक पोषण है, वही पितृभाव है ।
नारियल का एक उपयोग देवी या देवता के स्थान पर फोड़ने में होता
है, फोड़ने में ऐसी कुशलता होनी चाहिए चाहिए कि रस छलककर पूरा
का पूरा देवता के चरणों पर पड़े, कहीं अन्यत्र नहीं । यह
फोड़ना आसान नही होता । न यही आसान होता कि अपने जीवन को
उद्-भिन्न करे कि जीवन का समस्त रस अराध्य मूल्यों के लिए
अर्पित होकर विशेष हो जाय । कब किसका ठीक तरह से लक्ष्य सधता
है । नारियल फूटता है तो प्रायः रस इधर-उधर बिखर जाता है ।
जीवन उत्सर्ग होता है और वह जीवन छोटे मूल्यों पर उत्सर्ग हो
जाता है । न तो नारियल फोड़ना मूल्य है न उत्सर्ग अपने आप में
मूल्य है, मूल्य यह पहचानने में है और उस पहचान को एकाग्र रूप
से साधने में है कि उत्सर्ग चरम मूल्य के लिए हो रहा है । रस
केवल देवी के चरणो को सींच रहा है । वैसे तो सभी नारियल चढ़ा
देते हैं । पुजारी सभी को नारियल फोड़-फोड़कर कुछ टुकड़े
प्रसाद के देता है, किन्तु यह पूजा अधूरी पूजा है । अपने हाथों
फोड़ना और सधे हाथों फोड़ना और अर्पित रस की, बची हुई रसकी एक
बूँद पी जाना सार्थक पूजा है । उत्सर्ग को प्रसाद बना लेना
सार्थक उत्सर्ग है ।
सम्मानित व्यक्ति को, अतिथि को, अपने जामाता को नारियल की भेंट
दी जाती है तो उसके पीछे भी यही अभिप्राय होता है कि तुम हमारे
जीवन में अंतर्निहित समूची श्रद्धा भावना ले जाओ । यह नारियल
भाव-बंधन है, केवल ।

|
 |