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भाषांतर

कहानी

पेरेन्ट्स डेः अनुवाद एन. एस. रामकृष्ण

 

कविता

जर्मनी-निष्ठा पाकिस्तानी-आखरी पहर इजरायली-बम का व्यास

चीनी-लोकगीत संगहक मराठी-इंतजार   गढ़वाली-सूर्यग्रहण

पंजाबी-अंदर की आवाज़ उड़िया-गर्भगृह

 

 

जर्मनी

 

निष्ठा

मेरी आँखे निकाल दो फिर भी मैं तुम्हें देख लूँगा;

मेरे कानों में सीसा उड़ेल दो पर तुम्हारी आवाज़ मुझ तक पहुँचेगी

 

पगहीन मैं तुम तक पहुँचकर रहूँगा

वाणीहीन, मैं तुम तक अपनी पुकार पहुँचा दूँगा

तोड़ दो मेरे हाथ, पर तुम्हें मैं फिर भी घेर लूँगा

और अपने हृदय से इस प्रकार पकड़ लूँगा जैसे उँगलियों से

 

हृदय की गति रोक दो और मस्तिष्क धड़कने लगेगा

और अगर मेरे मस्तिष्क को जला कर ख़ाक कर दो

 

तब अपनी नसों में प्रवाहित रक्त की बूँदों पर मैं तुम्हें वहन करूँगा ।

 

मूल रचनाः रेनर मरिय रिल्के

अनुवादः धर्मवीर भारती

 

 

पाकिस्तानी

 

आख़री पहर

कोई ऐसी बात तो नही थी जिससे इतनी बाँते निकल आईं

वह व़क्त क्या था और पहर ने कौन-सा रंग पहना था

क्या सब कुछ किसी सोचे-समझे तरीके पर हुआ था

वह रिवायती आँखों में आँखे धुल जाना

चेहरे पर गुलाबी रंगत खिल जाना

आहिस्ता-आहिस्ता एक दूसरे की ओर बढ़ना

कुछ था तो नहीं पर हुआ था

फिर क्या हुआ था कि इतनी बाँतें नहीं लिखी थी

कभी बातचीत की आरज़ू में होंठ नहीं कंपकपाए थे

कभी मौसम ने तुम्हें बेकाबू नहीं किया था

मेरे अंदर तो एक समन्दर था

जिसमें बातें ही बातें, सपने ही सपने

मुँह बंद सीपियाँ ही सीपियाँ थीं

मेरे समंदर के बाहर रेत थी और दूर एक दरवाजा था

तुम उस दरवाजे तक आते तो मेरे अंदर की मुँह बंद सीपियाँ

खुल जाती थी, मोतियों के ढेर लग जाते थे

मगर यह सब मेरे सपने थे

वैसे कुछ तो भी नहीं हुआ था

अब भी मेरे अंदर समन्दर है

मगर मुँह बंद सीपियाँ नहीं हैं

लम्स के दायरे में घूमता व़क्त नहीं है

सपने रेत पर सफर करते हुए कहीं गुम हो गए हैं

दरवाजा अभी तक वहीं है

मगर अब उस दरवाजे पर बुलाने की चाहत नहीं है

दिन का आखरी पहर है

लम्स की ढ़लती शाम है

यह कोई ऐसी बात तो नहीं है

जिससे इतनी बातें निकल आएं !

 

मूल रचनाः किश्वर नाहीद

अनुवादः कासिम नदीम

 

इजरायली

 

बम का व्यास

तीस सेंटीमीटर था बम का व्यास

और इसका प्रभाव पड़ता था सात मीटर तक

चार लोग मारे गए, ग्यारह घायल हुए

इनके चारों तरफ एक और बड़ा घेरा है

दर्द और समय का -  दो हस्पताल और एक

कब्रिस्तान तहस-नहस हुए । लेकिन

वह युवा औरत जो दफनाई गई शहर में

वह रहने वाली थी सौ किलोमीटर से आगे कहीं की

-        वह बना देती है घेर को कहीं बड़ा

और वह अकेला शख़्स जो

समुंदर पार किसी देश के सुदूर किनारों पर

उसकी मृत्यु का शोक कर रहा था

समूचे संसार को ले लेता है इस घेरे में ।

और मैं अनाथ बच्चों के उस रुदन की जिक्र तक

नहीं करूंगा जो पहुँचता है ऊपर

ईश्वर जो एक और घेरा बनाता है

बिना अंत का और बना ईश्वर का

 

मूल रचनाः येहूदा अमीरवाई

अनुवाद- पहल

 

किर्गीज़

यह आवाज़ चक्कर काटती है

 

यदि काट डाले गये हों पाँव

और पाँव के निशान दहक रहे हैं बर्फ में

याद आयेंगे बचपन के दिन और अपना घर

याद आयेंगे कदम-कदम पर

याद आयेगा अतीत का एक-एक क्षण

कविता में न आ पाये उस प्रेम के रूप में

जिसकी आवाज़ उड़ती रहती है

झुर्रियों से भरे माथों की पहाडियों के ऊपर ।

 

यह आवाज़ चक्कर काटती है तुम्हारे सिर के ऊपर

मृत्यु और अंतरिक्ष को अपने वश में करते हुए ।

पूरे संसार को खून सने पाँव से रोंदते हुए

अंतिम घड़ियों में शायद तुम याद कर सको :

 

अपना वह समय जिसे जिया नहीं तुमने,

सफेद हो जाना सिर के बालों का

बोझिल उम्र की धुंध के बीच

देख सको कि अब तुम रह गये हो अकेले ।

 

यह सिर्फ आकाश होगा

जिसे याद रहेंगी तुम्हारी आँखे,

यह सिर्फ जंगल होगा खामोशी में

जो तुम्हारा स्वागत करेगा,

जहाँ प्रकट होती है आटे की तरह धरती

मूर्ख हृदय के प्रदेश के ऊपर ।

 

मूल रचनाः अल्तिनाई तेमीरोवा

अनुवादः वरयाम सिंह

 

चीनी

 

लोकगीत संग्रहक

लोकगीत संग्रहक का काम

हुआ करता था

लोकगीतों का संकलन

लोगों को देना निमंत्रण

कि वे निर्भय होकर कहें जो चाहे मन

और सुनिश्चित कर सकें इस तरह

शिखर से खाई तक के विचारों का अंतर्प्रवाह

और पारस्परिक संतुलन

 

यह एक प्राचीन परंपरा थी

पुराने व़क्तों की आज़मायी हुई

लेकिन जू के पतन के बाद

और किन-शी-हुआंग से लेकर

सुई काल तक

संग्रहक का कोई पद सृजित नहीं हुआ,

और यह परंपरा, आने वाले दस राजवंशों के दौरान

कभी पुनर्जीवित नहीं हुई

 

अब वेदियों पर गाये जाने वाले तमाम गीत

सम्राट के यशगान और कसीदे होते हैं,

उसी को महिमामंडित करते हैं,

उसी के चरण धोते हैं

रही नेक सलाह और आलोचना

सो ऐसी चीजों का तो अब अस्तित्व ही न रहा !

 

मशविरा देने के लिए नियुक्त अफ़सरान

होंट सिये खड़े रहते हैं,

कुछ नहीं करते, कुछ नहीं कहते

जिसे बजा कर कोई भी

अपने लिए इन्साफ़ की माँग कर सकता था

वह नगाड़ा

आम पहुँच से बाहर हो चुका, कभी का

 

आमंत्रित ऐसे लोगों को, जो

आलोचना में निपुण हों,

और अपनी सोच कर सकें प्रस्तुत

कविताओं में कर के समाहित

 

मूल रचनाः बाइ जूई

अनुवादः प्रियदर्शी ठाकुर ख़्याल

 

मराठी

इंतजार

 

माँ, तू आ, बेधड़क आ ।

पैरों की आवाज़ किए बिना आ

क्या कांटों ने कभी सिर नवाया है ?

तू खुद-ब-खुद आ, माँ तू आ ।

इसकी राह देखने में बंगला, बाग

कुछ भी लगने वाला नहीं

लुटेरे ही लुट गए हैं

अब आँचल का दूध लुटने वाला नहीं ।

माँ तू आ, माँ तू आ ।

हमेशा की तरह, स्वस्थ मन से

सूखी रोटी लेकर

उनकी पंगत कबकी उजड़ चुकी है

अब बाल भी बांका होने वाला नहीं

माँ, तू आ ।

मूलः रमेश थेटे

अनुवादः डॉ.राजकुमार सौमित्र

 

गढ़वाली

सूर्यग्रहण

अँधेरे से भागते हुए लोग

सूरखमूखी होना चाहते हैं

रोशनी से बेखबर

जो धूप की तरफ पीठ करके

चुपचाप कर रहे हैं अपना काम

उन पर लगा हुआ है

सूर्यग्रहण

 

मूलः देवेश जोशी

अनुवादः मधुसूदन थपलियाल

 

पंजाबी

 

अंदर की आवाज़

एक

मेरे अंदर से आई एक आवाज़

तू उठ कर क़लम थाम तो सही

क्या होगा जो तू कुछ लिखेगी नहीं

तू उठ कर लिखना सीख तो सही

तेरे भीतर कितने भंडार भरे हैं

तू काग़ज पर उसे उतार तो सही

सच बोलने से घबराना नहीं

हिम्मत करके क़लम तू उठा तो सही

दिल किसी का दुखे

ये अपराध कभी करना नहीं

क्या होगा तुझे जो दुख मिले

 

दो

हर समय दिल दरिया नहीं बनता

हर समय दिल दुखाए नहीं जाते

झूठ कभी न कभी बाहर आता है

हर समय झूठ छिपाए नहीं जाते

आँख हर समय रो सकती नहीं

हर समय आँसू छिपाए नहीं जाते

कोई-कोई ही होता है

हमदर्द अपना

हर किसी को अपने दुख

सुनाए नहीं जाते

 

मूलः मनजीत कौर

अनुवादः डॉ. सुश्री शरद सिंह

 

उड़िया

 

गर्भगृह

इतना अंधकार क्यों है घर के भीतर

क्यों है इतना अँधकार ?

सुबह भी तो है यहाँ रात जैसी

खंभे से टिककर खडे होने का

वही एक धारदार अंदाज़

उसी एक काले चीथड़े से

मुख और मयूख पुँछ जाने का

भय सब जगह,

दूर से किसी के पुकारने जैसा

सुन पड़ा है नाद

लग चुका हर पत्थर जैसा

सुन पड़ा है नाद

लग चुका हर पत्थर के

माथे पर लहू का टीका

तब भी,

इतना अँधकार क्यों है घर के भीतर

क्यों है इतना अंधकार ?

 

मूल रचनाः हर प्रसाद दास

अनुवादः राजेन्द्र प्रसाद मिश्र

 

 

 

 

 

भाषांतर

अभिलाषा सब दुखों का मूल है-बुद्ध

आपकी प्रतिक्रिया

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा चित्रकारः मृत्युंजय मिश्रा

तकनीकः प्रशांत रथ

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