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शर्मसार हुई है कालिदास की नगरी |
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अशोक रहाटगांवकर |
पिछले
दिनों मध्यप्रदेश के उज्जैन शहर में एक प्रोफेसर की मौत हो गई
। मामला वहां के प्रसिद्ध कालेज माधव कॉलेज का है । इस कॉलेज
में छात्रसंघ चुनाव होने थे जिसके प्रभारी प्रोफे. हरभजन सिंह
सब्बरवाल थे । छात्रों के दो गुट में तू तू मैं-मैं हुई ।
एकाएक प्रोफे.
सब्बरवाल से भी छात्रों ने मारपीट की और इस हादसे में उनकी
मौत हो गई । उनका दोष सिर्फ इतना था कि किसी बात पर उन्होंने
छात्रसंध चुनाव रद्द कर दिया ।
छात्रों के दो गुट यू. एन एस आई. और अखिल भातीय विद्यार्थी
परिषद की आपसी जोर आजमाईस का शिकार हुए सब्बरवाल ।
चूंकि उनकी मौत प्राकृतिक नहीं
बल्कि मारपीट के कारण हुई इसलिये
इसे हत्या का मामला माना गया । म.प्र.के मुख्यमंत्री
ने भी
संवेदना जताते हुये इसे महज एक हादसा बताया । वे इसे हत्या का
मामला मानने तैयार नहीं थे। दोनों छात्र संगठन अपने-अपने दावे-प्रतिदावे प्रस्तुत कर रहें थे । यह विदित है कि म.प्र. में
भाजपा की सरकार है और इस हत्या में जिस छात्र संगठन पर आरोप
लगा है वह भाजपा की ही एक शाखा है । जाहिर है पुलिस मूकदर्शक बनी रही।
जन आक्रोश बढ़ा । शिक्षकों ने एक जुट होकर आवाज उठाई तब जाकर
आरोपी पकड़े गये । परंतु पुलिस, शासन और प्रशासन के ढील-ढाले
रवैये के कारण कोई भी चश्मदीद गवाह बनने तैयार नहीं हुआ ।
शिक्षकों और कर्मचारियों को टी-व्ही-चैनलों पर ये कहते
दिखाया गया था कि उन्होंने प्रोफे. के साथ मारपीट करने वालों
को देखा है । वे उन्हें पहचान सकते हैं परतुं दूसरे ही क्षण
दहशत के कारण उन्होंने भी धीरे-धीरे इस सच्चाई से अपने आपको
दूर करना शुरू कर दिया । प्राचार्य से लेकर सहयोगी प्राध्यापक. तक
सच्चाई बयान करने में हिचकने लगे । कौन अपराधी कौन निर्दोष यह
तय करना अदालत का काम है। अदालतें हमेशा साक्ष्य पर न्याय करती
हैं पर दहशत के कारण यदि कोई साक्ष्य ही नहीं देगा तो निःसंदेह
अपराधी छूट जायेंगें । एक बात तय है कि प्रोफे. सब्बरवाल की
मौत हो चुकी है। अब वे कभी भी इस दुनियां में वापस नहीं आयेंगे
। मौत चाहे जिन कारणों से हुई हो परंतु विद्या के पवित्र
प्रांगण में हत्या जैसा घृणित कार्य निंदनीय ही कहा जावेगा ।
कहाँ खो गई है हमारी गुरू-शिष्य परम्परा । सिर्फ गुरूपूणिमा और
शिक्षक दिवस पर उन्हें सम्मान दर्शाकर बाक़ी दिनों में इस
प्रकार का बर्ताव क्या क्षम्य है
?
निशिच्त ही महाकवि कालिदास की नगरी इस जघन्य कृत्य से शर्मसार
हुई है। जिस महाकवि ने उज्जैन की माटी से जुड़कर मेघदूत और
कुमार संभव जैसी रचना का निर्माण किया उसकी ही नगरी में हत्या
वो भी एक शिक्षक की,
शर्म से सार होने वाली बात है। हम क्यों
भूल जाते हैं कि इसी उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में रहकर भगवान
श्रीकष्ण और सुदामा जैसे गरीब ब्राम्हण ने दीक्षा प्राप्त की थी
। ‘यदा
यदा ही धर्मस्य’
का आश्वासन देने वाले युगपुरूष भी इस कलियुग में हारे से लगते
हैं।
हम क्यों भूल जाते हैं कि यहां
‘महाकालेश्वर’
का वास है। जिसे देखकर काल भी भाग जाता है। ये वही नगरी हैं
जहाँ अत्यंत न्यायप्रिय राजा
विक्रमादित्य जनता के साथ सच्चा
न्याय करते थे। ये वही शिप्रा है जिसके पावन जल में सुदामा और
श्रीकृष्ण स्नान किया करते थे आज इस शिप्रा का जल लहू के रंग
में रंग गया है । सहसा विश्वास नहीं होता कि भारती संस्कृति की
धरोहर उज्जैयनी में इस प्रथा की घटना घट सकती है। कैसे समझायें
आज की इस युवा पीढ़ी को कि सम्मान किसे कहते हैं
?
सम्मान कैसे पाया जाता है और कैसे दिया जाता है
?
पहले तो
एकलव्य जैसे शिष्य गुरू दक्षिणा में अपना अंगूठा भी काटकर दे
दिया करते थे परंतु हाय ये कलयुग आज के शिष्य
‘गुरू’
की जान ले रहे हैं । क्या पाना चाहते हैं
?
क्या साहस हुआ ऐसे घृणित कृत्य से । भले ही वे साक्ष्य के अभाव
में बरी हो जायें परंतु
ऊपर वाले की अदालत उन्हें इस घृणित कुत्य के लिये कभी माँफ नहीं करेगी ।
क्या वे अपनी आत्मा के बोझ से मुक्त हो सकेगें । शायद जीवन भर
नहीं ।
इस युवा पीढ़ी को सम्मान ही करना सिखना है तो सीखे पूर्व
प्रधान मंत्री
चौधरी चरण सिंह से जिन्होंने शाला के कार्यक्रम
में जब अपने गुरू देव को जमीन पर अपने सामने वैठे देखा
तो वे
स्वयं मंच से उतर गये और चरण
छूकर ससम्मान उन्हें अपने साथ मंच
पर ले आये । सम्मान और आचरण सिखना है तो सीखें उस ईश्वर चंन्द
विद्यासागर से
जो अंग्रज अतिथि का सामान उठाने के लिये स्वयं कुली बन गये ।
सम्मान देना भी या पाना भी सबकी तकदीर में
नहीं होता।
इस युवा पीढ़ी को यदि मानवता ही देखनी
वह सीखनी है तो देखे-सीखे
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से कि जब
उन्होंने महाकवि निराला से किसी संदर्भ में मुलाकात करनी चाही
और महाकवि ने उनका आमंत्रण करेगी
?
दोष उनका भी नहीं है। जब चाहें ओर कलि का नंगा नाच चल रहा हो
वो भला कोई ऐसा सहद्धयता दिखाने का साहस कैसे कर सकता है ।
इसिलिये भगवान श्रीकृष्ण ने कवि से निवेदन किया था कि
धर्मरक्षणार्थ कम से कम भक्त को भगवद नाम से मत रोकना ।

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