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व्हेनसांग, चीन, नागर्जुन और छत्तीसगढ़ |
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डॉ. सुधीर शर्मा |
छत्तीसगढ़
और चीन का संबंध हजारों साल पुराना है। न केवल व्यापार अपितु
कला, संस्कृति और धर्म के मामले में छत्तीसगढ़ और चीन का
दोस्ताना संबंध रहा है।
छत्तीसगढ़
में बौद्ध धर्म की समृद्ध परंपरा और उसके पुरातत्व के प्राचीन
अवशेष इस बात के साक्षी हैं । व्हेनसांग की यात्रा से इस संबंध
की पुष्टि होती है। व्हेनसांग की यात्रा का मार्ग छत्तीसगढ़ से
होकर गुजरा और यह बताता है कि छत्तीसगढ़ से चीन तक पैदल मार्ग
था जिसके माध्यम से अनेक बौद्ध भिक्षु धर्म-प्रचार के लिए यहाँ
आते रहे हैं । इस यात्रा के प्रमाण सिरपुर, रायगढ़ के चीनी
शैलचित्रों आदि में आज भी मिलते हैं ।
छत्तीसगढ़ की प्रकृति और उसकी ऐतिहासिक महत्ता ने अनेक विद्शी
विद्वानों को आकर्षित किया है। अँग्रेज तो यहाँ शासक बन कर आए
औऱ छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक संपदा पर मुग्ध हो गए लेकिन कुछ
विद्वानों ने इस अंचल से होकर यात्राएँ की । इन यात्राओं में
चीनी-यात्री व्हेनसांग भी था जिसने छत्तीसगढ़ को दुनिया के
इतिहास के पन्नों में अपनी
जिस यात्रा-वृतांत के माध्यम से दर्ज
कर दिया । व्हेनसांग की यात्रा का संक्षिप्त किन्तु महत्वपूर्ण
लाभ यह हुआ कि उन्होंने नागार्जुन को दक्षिण कोसल का वताया और
दक्षिण कोसल छत्तीसगढ़ का प्राचीन नाम है।
व्हेनसांग का असली नाम युवान चांगस था। उस की भीरत यात्रा पर
थामस वार्टस आन युवान चांग्स ट्रेवल्स ट्रेवल्स इन
इंडिया नामक पुस्तक प्रकाशित हुई थी । इसके द्वितीय भाग
में व्हेन सांग की यात्रा से यह तथेय उजागर हुए कि भगवान बुद्ध
के चरण भी छत्तीसगढ़ की धरती पर पड़े थे। व्हेन सांग के
यात्रा-वृतांत में श्रीपुर यानी आज के सिरपुर का महत्वपूर्ण
उल्लेख है। यह यात्रा यह भी साबित करती है कि चीन की संस्कृति
के कुछ अंश इस अंचल में भी विद्यमान रहे । छत्तीसगढ़ के अनेक
कंदराओं- गुफाओं में शैल चित्र उकेरे गए हैं जो चीन में पाए गए
शैलचित्रों के समतुल्य हैं ।
ऐतिहासिक पुस्तक के तथ्य बोलते हैं कि व्हेन सांग ने यहाँ 100
संघाराव (बिहार) एवं 1000 महायानी बौद्ध भिक्षुओं को निवास
करते देखा था । सिरपुर उत्खनन से प्राप्त मूर्तियों के विशाल
भंडार जिन पर बज़यानी पथियों का प्रभुत्व दिखाई देता है तथा ये
मूर्तियों तंत्रवाद का प्रतिनिधित्व करती हैं। इससे प्रमाणित
होता है कि व्हेन सांग श्रीपुर ही आया था। उसने श्रीपुर के
दश्रिण को ओर एक पुराने विहार एवं अशोक स्तूप का वर्णन किया है
यहाँ भगवान बुद्ध ने शास्त्रार्थ में विद्वानों को पराजित कर
अपनी अनौकिक शक्ति का प्रदर्शन किया था। इतिहासकार यह भी कहते
हैं कि यह एख ऐतिहासिक सत्य है कि जिन-जिन स्थानों को भगवान
बुद्ध ने अपने चरणों से पवित्र किया था उस पर अशोक ने स्तूप का
निर्माण कराया था। व्हेने सांग का यात्रा वृतांत जो इस तथ्य को
सत्य के नजदीक लाता है।
इतिहास प्रसिद्ध चीनी यात्री व्हेनसांग ने संसार को प्रकाशित
करने वाले चार सूर्यों का उल्लेख किया है। उनमें से एक
नागार्जुन थे , शेष थे अश्वघोष कुमार लब्ध तथा आर्य देव ।
निःसंदेह एक विचारक के रूप में नागार्जुन की भारतीय दर्शन के
इतिहास में तुलना करने वाला दूसरा नहीं है। टी.वार्टस ने
नागार्जुन को
उत्तरकालीन बौद्ध धर्म का एक महान आश्चर्य और
रहस्य कहा है। चीनी विवरणों के अनुसार नागार्जुन एक
खगोलशास्त्री, ज्योतिषविद, जीवशास्त्री, खनिजविद,
रसायनशास्त्री और प्रख्यात चिकिस्सक थे। तिब्बती में नागार्जुन
के लिए कल्स ग्रब शब्द का उपयोग किया गया है।
व्हेनसांग की छत्तीसगढ़ यात्रा इस मायने में महत्वरूर्ण हो
जाती है कि उन्होंने न नागार्जुन का संबंध दक्षिण कोसल की धरती
सो जोड़ा । अत्यंत उच्चकोटि के व्यक्ततत्व के स्वामी नागार्जुन
एक महान दार्शनिक थे, उन्होंने बौद्ध दर्शन के माध्यमिक
संप्रदाय का प्रवर्तन किया तथा बौद्ध धर्म के महायान शाखा के
वे संस्थापक माने जाते हैं । उनके द्वारा प्रस्तुत दर्शन
“शून्यवाद”
विश्व में विख्यात हुआ । माध्यमिक कारिका या माध्यमिक शास्त्र
तथा प्रज्ञापारमिता उनके महान दार्शनिक ग्रंथ हैं। इन्हीं
ग्रन्थों में उन्होंने महायान के क्रांन्तिकारी तथा प्रगतिशील
सिद्धांतों का अत्यंत तर्क-संगत एवं अत्यंत सूक्ष्म दृष्टि से
प्रतिपादन किया है।
चीनी प्रवासी कुमार जीव नामक विद्वान ने नागार्जुन के संस्कृत
चरित का अनुवाद चीनी भाषा में सन् 405 ई. में किया था । बौद्ध
धर्म 2500 वर्ष नामक ग्रथ्थ में कुमार जीवन के जीवनी के
साक्ष्य के आधार पर नागार्जुन का परिचय इस प्रकार दिया गया
है-नागार्जुन के जीवनी के अनुसार जिसका अनुवाद कुमार जीव ने
सन् 405 ईं. में किया । नागार्जुन के जीवनी के अनुसार जिसका
अनुवाद कुमार जीव ने सन् 405 ईं. में किया । नागार्जुन का जन्म
दक्षिण भारत में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था लेकिन युवान
च्वांग अर्थात् व्हेन सांग का कहना है कि उनका जन्म दक्षिण
कोसल या प्राचीन विदर्भ (बरार) में हुआ था।
इतिहास को जीने वाले स्व. हरिठाकुर की मान्यता थी कि व्हेनसांग
द्वारा नागार्जुन को स्पष्ट रूप से श्रीपुर (जिला रायपुर) का
निवासी होना बताये जाने पर भी कुछ इतिहासकार क्यों नागार्जुन
को आंध्र या विदर्भ का निवासी सिद्ध करने पर दृढ़ हैं, यह समझ
में नहीं आता । व्हेनसांग कलिंग से दक्षिण कोसल क्यों आए
?
कोसल में उसकी राजधानी श्रीपुर (जिला रापयुप) क्यों आये
?
वस्तुतः नागार्जुन के संबंध में व्हेनसांग ने चीन में ही पढ़
लिया था। नालंदा आने पर नागार्जुन के जन्म स्छान आदि की
विस्तृत सूचनाएं एकत्र की होंगी । व्हेनसांग के लिए नागार्जुन
देवपुरुष थे । वे नागार्जुन को संसार को प्रकाशित करने वाला
सूर्य एवं बोधिसत्व से संबोधित करते हैं । व्हेनसांग बौद्ध
धर्म के महायान शाखा के अनुयायी थे और नागार्जुन इन शाखा के
संस्थापक माने जाते हैं। अतः यह स्वाभाविक है कि सैंकड़ों कष्ट
उठाकर चीन से भारत भ्रमण के लिए आने वाले नाना प्रकार की
जिज्ञासाओं से भरे व्हेनसांग अपने अपराध नागार्जुन के जन्म
स्थान और निवास स्थान में आए । श्रीपुर (जिला रायपुर )
व्हेनसांग के लिए तीर्थ स्थान था क्योंकि वहाँ भगवान बुद्ध के
चरण स्पर्श हुए थे और नागार्जुन
यहाँ निवास करते थे।
चीनी यात्री व्हेनसांग सर्वप्रथम दक्षिण कोसल जनपद की सही
स्थिति और सीमा का निर्देश करते हैं । उसने दक्षिण कोसल जनपद
क्षेत्र का भ्रमाण 639 ई. में किया था। चीनी यात्री कलिंग से
होता हुआ उत्तर पूर्व में पर्वतीय और वन्य क्षेत्रों को पार
करता हुआ, लगभग 600 कि.मी. की यात्रा के बाद दक्षिण कोसल
पहुँचा था । उसके अनुसार दक्षिण कोसल जनपद या राज्य का विस्तार
1775 किलोमीटर की परिधि में था । चीनी यात्री के इस विवरण से
कई विद्वानों ने दक्षिण कोसल जनपद की सीमाएँ निर्धारित की है।
प्रसिद्ध चीन यात्री व्हेनसांग ने सन् 618 में दक्षिण
कोसल पद की यात्रा की थी। उसने इसकी सीमाओं के संबंध में जो
बाते लिखी है वे यर्थाथता के
बहुत निकट जान पड़ती हैं। उसके
अनुसार दक्षिण कोसल का विस्तार लगभग 2000 मील के वृत्त में था।
इसके मध्य भाग में रायपुर, दुर्ग,
बिलासपुर, रायगढ़ तथा
संबलपुर जिला का अधिकांश भाग आ जाता था । उत्तर में इसकी सीमा
अमरकंटक को पार कर गई थी। अमरकंटक जो नर्मदा नदी का उद्-गम
स्थान है मेकल पहाड़ की श्रेणियों के अंतर्गत आता है । ये
श्रेणियाँ रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़ और सरगुजा जिलों की ईशान
कोण में फैली हुई उसकी सीमा बन जाती हैं। पश्चिम में इसकी सीमा
दुर्ग तथा रायपुर जिलों के
शेष भाग को समेटती हुई सिहावा तक चली जाती थी और बैनगंगा को
पार कर बरार की सीमा को छूने लगती थी। दक्षिण में इसका विस्तार
बस्तर तक चला गया था जबकि पूर्व में यह महानदी की उत्तरी
घाटियों को समावेशित करती हुई सोनपुर तक चली गई थी जिनसे पटना,
बामड़ा, कालाहंडी (उड़ीसा) आदि भी इसके अंतराल में आ जाते थे,
जहाँ से सोमवंशी राजाओं की प्रशस्तियाँ भी प्राप्त हुई थी ।
चीनी यात्र व्हेनसांग ने दक्षिण कोसल की तत्कालीन, राजधानी
सिरपुर का जिस समय प्रवास किया था, उस समय सोमवंशी राजा
महाशिवगुप्त बालार्जुन वहाँ राज्य करता था। इसके पूर्व सोमवंशी
राजा त्रिवरदेव ने, सिरपुर में स्थित हो, राजिम और सिहावा की
प्रशस्तियाँ उत्कीर्ण कराई थीं जिनमें उसे कोसलाधिपति अंकित
किया गया हैं।
इधन व्हेनसांग अपने यात्रा-विवरण में लिखते हैं-
“
मौर्य राजा अशोक ने दक्षिण कोसल की राजधानी में स्तूप तथा अन्य
इमारतों का निर्माण कराया था ।”
चीनी यात्री का यह उल्लेख गलत नहीं है। अशोक के समय के
धर्मलेएख सरगुजा जिले में रामगढ़ की सीताबोंगरा और जोगीपारा
नामक गुफाओं में पाये गये हैं । कई विद्वानों ने मेघदूत में
कालिदास द्वारा वर्णित
“रामगिरी”
इसी रामगढ़ को माना है।
व्हेनसांग भारत की
इस अद्भुत यात्रा में छत्तीसगढ़ को स्पर्श कर इतिहास रच गए आज
का छत्तीसगढ़ इतिहास के शौर्य और उसकी विशेषता को दुनिया के
सामने रखने लालायित है ऐसे में व्हेनसांग उसे स्मरण आता
है ।
आज भारत और चीन के
संबंध मजबूत होते जा रहे हैं । दोनों देश वैश्विक संस्कृति और
बाजारवाद के प्रकोप से जूझ रहे हैं। छत्तीसगढ़ में चीन के
सामान बिक रहे है और यहाँ चीन के उद्यमी पूंजी भी लगाने तत्पर
हो सकते हैं । छत्तीसगढ़से चीन का रास्ता एक नया रास्ता बन
सकता है भारत और चीन के संबंधों के लिए । व्हेनसांग और न जाने
कितने यात्रियों का देखा सपना सच हो सकता है। हमारे रिश्तों की
आवश्यकता हमें समान रूप से है इसलिए दोस्ती के हाथ भी एक-दूसरे
गर्मजोशी से मिलाने तत्पर हैं।

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