|
श्रृंगारिक गीतों का मोहक संकलन |
|
डॉ. ब्रह्मजीत गौतम |
गीत
ने अपने परंपरागत मिज़ाज़ से लेकर वर्तमान नवगीत तक आते-आते एक
लम्बा सफ़र तय किया है। उसकी यह यात्रा अनेक प्रकार के अवरोधों से
संपृक्त रही है। उसने तरह-तरह के आरोप-आक्षेप झेले हैं । कभी उसे
आधुनिक जीवन की खुरदरी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के लिए सर्वथा
अनुपयुक्त समझा गया तो कभी कोरे वायवी और काल्पनिक संवेगों का वाहक
निरूपित किया गया । यहाँ तक कि उसे
‘मृत’
तक घोषित करने में कोई हिचक नहीं बरती गयी । लेकिन गीत ने हार नहीं
माना । उसकी जिजीविषा अक्षुण्ण रही और उसके साथ ही उसकी यात्रा भी।
संस्कारधानी जबलपुर के वरिष्ठ काव्यशिल्पी श्री मणि
‘मुकुल’
द्वारा संपादित गीतों का संकलन
‘गीत
हमारे अर्थ तुम्हारे’
इसी यात्रा का अगला पड़ाव है।
डॉ. कुँवर बेचैन, चन्द्रसेन विराट, प्रो. भागवतप्रसाद मिश्र
‘नियाज़’,
आचार्य भगवत दुबे, निर्मला जोशी बटुक चतुर्वेदी, डॉ. अनंतराम मिश्र
‘अनंत’,
डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी, भगवान दास जैन, डॉ.रामसनेही लाल शर्मा
‘यायावर’,
भानुदत्त त्रिपाठी
‘मधुरेश’,
ज्ञानेन्द साज़, डॉ. गार्गीशंकर मिश्र
‘मराल’
जैसे अनेक वरिष्ठ और कुल पैंसठ कवियों की सरस रचनाओं से गुम्फित इस
संकलन का मुख्य स्वर श्रृंगारिक है, जो
‘गीत’
का प्रिय विषय रहा है। डॉ. हरिवंश प्रसाद शुक्ल
‘मधुकर’
जहाँ
‘सुधियों
के द्वार’
खोल कर प्रेयसी को अपने
‘अतीत
की छवि’
दिखाना चाहते हैं, तो के. एल. नेमा ने भी
‘आलिंगन-स्मृति’
के माध्यम से रात की सारी घटना बयान कर दी है। इधर डॉ. अनंतराम
मिश्र
‘अनंत’
सोमरस पीना छोड़ कर
‘यौवन
रस’
पीने की सलाह देते हैं
–
निरंतर यौवन रस बरसे
छोड़ सोमरस का पीना अब छक ले सुदा अधर से
डॉ. संध्या जैन
‘श्रुति’
का अनुभव है कि ज़िन्दगी में सुख का सबेरा तभी आता है, जब निगाहों
में प्रेम उत्पन्न होता है-
प्रीत न आकर किया जब से निगाहों में बसेरा
बस तभी होने लगा था ज़िन्दगी का सुख-सबेरा
चन्द्रसेन
‘विराट’
का मानना है कि प्यार की सौगात हर किसी को नहीं मिलती । प्यार करने
वाला और प्यार महसूस करने वाला हृदय किसी
‘भाग्यवान’
को ही नसीब होता है-
मिलता है बस भाग्यवान को/सब को प्यार कहाँ मिलता है
कुछ को मिलता हृदय, सभी को/ यह उपहार कहाँ मिलता है
लगता है, उमाश्री को यह सौभाग्यशाली हृदय मिला है। कदाचित् इसलिए
वे एक बार फिर से अंग-अंग पर काम समीक्षा लिखना देना चाहती हैं-
संस्पर्शों के वल्कल पहने /मिली हंसिनी रातें
आज चलो चरितार्थ करें हम/वात्सायन की बातें
अंग-अंग पर काम-समीक्षा फिर से लिख जाये
अशोक गीते प्राकृतिक उपमानों का सहारा लेकर अपने प्यार का चित्र इस
प्रकार खींचते हैं।
हो किरण तुम सूर्य की /चढ़ती मुंडेर की धूप हो
चन्द्रमा की चाँदनी में /ज्यों नहाया रूप हो
रोज़-रोज़ की आपाधापी और नोंन-तेल-लगड़ी के झंझटों से ऊबे हुए डॉ.
रामसनेही लाल शर्मा
‘यायावर’
की इच्छा है कि
‘आओ
साथी
!
रस घट पीलें/ फिर से कुछ मोहक क्षण जी लें’
। दूसरी ओर अपना प्रणय निवेदन स्वीकृत कराने के लिए आचार्य भगवत
दुबे रूप की प्रशंसा में कहते हैं
–
कटि की एक झलक पर झरते अगणित हरसिंगार द्वार पर
सूरज-चाँद निछावर होते उभय उरोजों के उभार पर
डॉ. अनिल गहलौत ने अपने भावपूर्ण गीत में अपनी पुरानी यादों को
ताज़ा किया है। न जाने क्या हुआ कि उनका प्रिय उनसे अनायास ही रूठ
गया और कल तक जहाँ हरा-भरा उपवन लहरा रहा था, आज वहाँ पतझड़ खड़ा
है—
अनायास क्या हुआ न जाने मन को तुम जो रूठे
पतझड़ खड़ा हुआ है कल तक सारे पात हरे थे
इसी प्रकार इब्राहीम
‘अश्क’
ने भी अपने गीत में विरह की तीव्र अनुभूति को अभिव्यक्ति दी है
–
आँगन,द्वार तकूँ मैं राहे/ध्यान न टूटे मेरा
गहराए जब रात अँधेरे / धीरज छूटे मेरा
मणि ‘मुकुल’
ने अपने प्रियतम के अधरों की तुलना की तुलना में उपमानों की झड़ी
लगा दी है। बीस पंक्तियों के गीत में अठारह उपमाएँ देकर उन्होंने
‘एक
लड़की को देखा तो ऐसा लगा’
नामक सिने गीत की याद ताज़ा कर दी है। गीत की शुरूआत देखिये
–
अधर तुम्हारे जैसे मुकुलित कचनारों की दो कलियाँ
अधर तुम्हारे जैसे मिलतीं गाँव द्वारे दो गलियाँ
संकलन में कुछ कवि ऐसे भी हैं, जिन्होंने मांसल सौंदर्य के स्थान
पर प्राकृतिक सौंदर्य-चित्रण को अपने गीतों का आधार बनाया है। ऐसे
कवियों में बटुक चतुर्वेदी, मुकुट सक्सेना,कुँवर बैचेन आदि के नाम
उल्लेखनीय हैं । चंद उद्धरण दिखिये
–
फागुन लगा, बजाती साँकल, पुरवैया द्वारे की
मींठी-मींठी नींद करवटें लेती भुनसारे की
अशोक गीते प्रकृतिक उपनानों का सहारा लेकर अपने प्यार का चित्र इस
प्रकार खींचते हैं-
हो किरण तुम सूर्य की /चढ़ती मुंडेर की धूप हो
चन्द्रमा की चाँदनी में/ज्यों नहाया रूप हो
n
समीक्षक:
डॉ.
ब्रह्मजीत गौतम
n
संकलन:
गीत हमारे अर्थ तुम्हारे
n
संपादक:
मणि मुकुल
n
प्रकाशक:
गुंजन कला सदन, जबलपुर, म.प्र.
n
पृष्ठ:
70
n
मूल्य:
100/-