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मिथ्या मंजिल / श्री अशोक रहाटगांवकर/ कथाकार :अशोक मनवानी /

भाषा और व्यक्तित्व पर पठनीय किताब / समीक्षक: अशोक रहाटगाँवकर / लेखक: डॉ.चित्तरंजन कर

श्रृंगारिक गीतों का मोहक संकलन /   समीक्षक: बटुक चतुर्वेदी /  संपादक: मणि मुकुल

कुछ उगाने की चाहत-सहज कविताओं की अनुगूंज / समीक्षक: संजीव ठाकुर /  कवि: संजीव बक्शी

 

भाषा और व्यक्तित्व पर पठनीय किताब

अशोक रहाटगाँवकर

        चित्त रंजन कर की नई पुस्तक व्यक्तित्व-निर्माण में भाषा की भूमिका अभी हाल ही में पढ़ने को मिली । उन्होंने इस पुस्तक में भाषा को आधार मानकर कुल अठारह तत्व बताये हैं जो व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारने के लिये आवश्यक एवं पर्याप्त हैं । बहुत दिनों के पश्चात लिखने को मन आनंदित हो उठा । यह पुस्तक डॉ.कर के नाम के अनुरूप ही चित्तबोधक है । वैसे तो डॉ. कर मूलतः भाषा विज्ञान के प्राध्यापक हैं परंतु हिंदी और अंग्रेजी का पर्याप्त ज्ञान भी इस पुस्तक में देखने को मिला है। इस पुस्तक के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित चित्र ही स्वयं व्यक्तित्व का बखान करता है ।

 

         व्यक्ति की सुंदरता का आभास उसके व्यक्तित्व से हो जोता है । काया गोरी हो या काली, आकृति उभरी हुई हो या साधारण, जब तक व्यक्तित्व नहीं निखरता उसका आकर्षण पता नहीं चलता । आज परिभाषित होता है कि किसी भी इंसान का परिधान यदि ठीक न हो तो उसका व्यक्तित्व उभरकर नहीं दिखता । इक्कीसवी सदी में कदाचित् यह धारणा ठीक भी हो सकती है परतुं कुछ उदाहरण इसे झूठलाने के लिये पर्याप्त साबित हो सकते हैं । जैसे महात्मा गांधी का परिधान क्या था ? एक लंगोटी स्वामी विवेकानंन्द का परिधान क्या था ? एक सन्यासी का चोला नहीं, उसकी ओजस्वी वाणी ने, उनकी भाषा ने हमारे बीच अपने व्यक्तित्व की अमिट छाप छोड़ी है।

 

        व्यक्तित्व के निर्माण में भाषा की भूमिका को रेखांकित करने वाली यह पुस्तक एक पीढ़ी का अनुभव दूसरी पीढ़ी को हस्तातंरित करने में काफी सहायक सिद्ध होगी । ऐसे हस्तांतरणों में लोग अपने साहित्यिक वैज्ञानिक, प्रौद्योगिक, वाणिज्यिक, सामाजिक एवं धार्मिक विकास के साथ विश्वबंधुत्व की कल्पना भी साकार करने में सफल होते हैं। हर आदमी चाहता है कि वह बड़ा और अच्छा कहलाये परंतु सिर्फ चाहने से ये सब हासिल नहीं हो सकता । उसके लिये बड़ी मेहनत की आवश्यकता होती है। डॉ. कर ने जिस अंगरेज़ी कहावत का ज़िक्र इस पुस्तक में किया है वह बहुत सोच-समझकर किया है। उनका मानना है कि प्रतिभा जन्म जात नहीं बल्कि अर्जन से होती है। क्योंकि निन्याबे प्रतिशत परिश्रम और एक प्रतिशत प्रेरणा का फार्मूला उपयुक्त माना गया है । तभी तो हमारे भारतीय कवियों का मन भी करत करत अभ्यास के जड़ मति होत सुजान पर आधारित है। व्यक्तित्व विकास में भाषा के साथ वाणी की मधुरता भी आवश्यक है । जो दिन रात परिश्रम करता है वह स्वयं से लड़ता है । वही अंततोगत्वा विजयी होता है। शायर इकबाल के ये शेर देखें -

              मंजिल-ए-गम से गुजरना तो आसां है इकबाल

              इश्क है नाम खुद अपने से गुजर जाने का ।।

 

         इंसान की दुर्बलता यह है कि वह खुली आँखों से जो कुछ देखता है उसे ही पूर्ण मान बैठता है। वह यह नहीं जान पाता कि खुली आँखों की देखने की क्षमता सीमित होती है जब कि बंद आँखों से साथ ब्रह्मांड नज़र आता है। यही कारण है भगवत भक्ति में भक्त अपनी आँखें बंद रखता है।

 

            शिक्षा आज के प्ररिप्रक्ष्य में उच्च पदों को पाने का साधन मात्र बन गई हैं । शिक्षा आत्मविश्वास का प्रथम सोपान है। शिक्षा का अर्थ है अपनी क्षमताओं को पहिचानना । और वे गुण तभी विद्यामान होंगें जब व्यक्ति स्वयं प्रयास करेगा, स्वयं संघर्ष करेगा । अभाव सबसे बड़ी शिक्षा है । वह मनुष्य को सही शिक्षा देता है । बड़े वैज्ञानिक, आविष्कारक इसी अभाव के कारण अपना नाम अमर कर गये हैं । कठिनाईयाँ और संघर्ष से जो विचालित हो गया वह समझो हार गया । जैसे प्रचलित है डर गया मर गया । भय मनुष्य के आत्मविश्वास को खोलला बना देता है।

 

       भाषा के अंतर्गत शब्द आते हैं जिसे वाणी के माध्यम से हर आदमी उसका उपयोग करता है। शब्दों की क़ीमत कोई नहीं चुका सकता । शेख सादी सउदी अरब के जाने माने शायर थे। जब वे 90 वर्ष के हुए तो सुल्तान ने एक बेशक़ीमती हीरा भेजा और लिखा कि इस हीरे की क़ीमत की कोई कविता हो तो मुझे अवश्य भेजो । सादी ने जवाब में लिखा कि मेरी कविता का एक शब्द तु्म्हारे इस हीरे से अधिक क़ीमत का है । मनुष्य के पास भाषा, वाणी, शब्द इन सबसे परे हटकर और भी जो गुण चाहिये जो इस प्रकार है :- हँसी जो स्वास्थ्य के लिये आवश्यक है । प्रसन्नता, जीने के लिये आवश्यक तत्व है। वह तो संजीवनी है। विनोद प्रियता भी आवश्यक है । और सबसे आवश्यक है - कृतज्ञता,  यही मनुष्य का व्यक्तित्व उजागर करती है। भाषा का महत्व तो है ही । परन्तु ये तत्व यदि नहीं रहेंगें तो व्यक्तित्व प्रभावी नहीं लगेगा । जिस प्रकार भाषा का ज्ञान होकर भी प्रस्तुतीकरण के समय ये गुण न रहे तो भाषा का प्रभाव भी कमजोर लगने लगता है।

 

       नन्हा सा बालक अपने माता पिता से बोलना तो सीख लेता है परंतु भाषा का ज्ञान उसे स्कूल जाने के बाद ही होता है। जिस मनुष्य के जैसे संस्कार और विचार होंगे, चिंतन और भावनायें होंगी वैसी ही उसकी भाषा होगी । इसीलिये भाषा को संस्कृति की वाटिका भी कहा गया है । संसार में अनेक भाषायें होती हैं परंतु मातृभाषा को हम श्रेष्ठ मानते हैं। अन्य भाषा के प्रयोग में हमें अधिक सावधानी बरतनी पड़ती है। प्रत्येक मनुष्य के जीने की अपनी शैली होता है, जिसे दृष्टिकोण कहते हैं । कहा भी गया है। जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि कुछ लोग बहुत कुछ पाकर भी अंसतुष्ट रहते हैं और कुछ लोग थोड़ा पाकर ही संतुष्ट रहते हैं । कबीर इसके नायाब उदाहरण हैं । अपनी कविता में वे कहते हैं -

साईं इतना दीजिये जामे कुंटुब समाय ।

मैं भी भूखा न रहूँ, साधु भी ना भूखा जाय ।।

 

       उनकी वाणी में प्रतिपल संतुष्टि झलकती है । कहने का तात्पर्य यह है कि भाषा और वाणी मनुष्य के व्यक्तित्व को स्थापित करने वाले दो आधार स्तंभ हैं। डॉ. कर की यह 96 पृष्ठों की और 75 रूपये कीमत की पुस्तक युवा पीढ़ी के व्यक्तित्व को गढ़ने में काफी सहायक सिद्ध होगी । डॉ. कर इसके लिये बधाई के पात्र हैं। बिना व्यक्तित्व के मनुष्य का जीवन मुर्दा-लाश की तरह है।


n       समीक्षक: अशोक रहाटगाँवकर

n       संकलन: व्यक्तित्व-निर्माण में भाषा की भूमिका

n       लेखक: डॉ.चित्तरंजन कर

n       प्रकाशक: वैभव प्रकाशन, रायपुर, छत्तीसगढ़.

n       पृष्ठ: 96

n       मूल्य: 75/-


 

 

 

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