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कुछ उगाने की चाहत-सहज कविताओं की अनुगूंज / समीक्षक: संजीव ठाकुर /  कवि: संजीव बक्शी

 

कुछ उगाने की चाहत-सहज कविताओं की अनुगूंज

संजीव ठाकुर

        ब्बे के दशक में कवि के दूसरे कविता संग्रह का प्रकाशन इस बात को इंगित करता है कि कवि में लगातार जिंदा है। उनका दूसरा कविता "संग्रह भित्ती पर बैठे लोग" पाठकों के सम्मुख है। उनकी कविताओं का मूलतः मुख्य स्त्रोत ग्राम्य जीवन एवं सहजता, सरलता और सौम्यता है। ग्राम्य भोलापन जितना सीधा है उतनी सीधी कविताओं का विन्यास भी कवि ने अपनी रचना के माध्यम से पिरोया है, शायद पिरोया नहीं, कवि, कविता को रखता गया है, ओरिजिनेलटी की खास बात इस काव्य मीमांसा में अंर्तजीवित है जो शहरी दमघोंटू वातावरण में जी रहे मानव को झकझोरती है और गाँवों की ओर ललक पैदा करती है। कविता की हमजोलियां उन्हें सदा देती है कि आओ इस भोलेपन में, भीतर देखो,

सोचता हूँ

कि तब ही

रूक जाती है यकायक,

जंगल से लौटती

बकरियाँ और गाएं

सिर उठाकर देखती हैं

सोचता हूँ

मैंने भी देखा था

एक बड़े वृक्ष को

रूक कर

खुली-खुली आंखों से ।

        कवि के काव्य कर्म और काव्य संसार की पैमाईश की जाए तो यह साफ है कविता का कर्म मूल मार्मिकता है । ग्रामीणों के भोलेपन को केनवास पर उतारकर कवि ने उन्हें अलग-अलग बिम्बों में उकेरा है । कविताएं बेहद मार्मिक तरीके से एक के बाद एक सहजता से रखी गई हैं । हम जिसे ज़मीन कहते हैं अभी, शायद वह ज़मीन नहीं है। वह भ्रम हो सकता है । हम सब लगे हैं। तिलस्म की फसल उगाने में ।

 

        स्पष्ट है सहस्त्रब्दि की शुरूआती दौर और शताब्दी के अंत में शहरीकरण की अंधड़ जोरों पर है और ग्रामीण संस्कृति को समेटे डाल रहा है। सब कुछ धीरे-धीरे धूमिल होता जा रहा है। परिणाम स्वरूप पाठकों के मध्य एक स्पष्ट छवि कौंधती है ग्रामीण परिवेश की, सरलता की, अनगढ़े, अन अनुत्त्रित ग्राम्यजीवन की, उस मूल शैली की जिसके गाँवों के लोग आदि है जीने को ।

जंगल में, मंगल । जंगल में गांव,

गांव में घर । घर-घर भित्ती

भित्ती पर बैठे हैं। गाँव के लोग

        यह अच्छी बात है कवि ने कविताओं में कहीं-कहीं लेखनी और रास्ते में बदलाव के चिन्ह भी परोसे हैं महज भावनात्मक स्तर पर ही न जाकर, वर्तमान शैली को पकड़कर लेखक आगे बढ़ा है जो काव्य की पंक्तियों के बीच ग्रामिण अनुरामात्मक लयता को भी जन्म देता है।

कोई बातचीत नहीं, मेरे और मेरे जीवाणुओं के बीच ।

कोई नहीं दुभाषिया, न झाड़ । न जंगल,

न आग न पानी । न मैं दोषी हूँ इस मामले में

न मेरे जीवाणु दोषी ।

 

        काव्य की सहज सरल पंक्तियों में से होते हुए उन्हें आप, छंद, विन्यास, आवेग, आक्रोश से मुक्त एक स्वतंत्र वातावरण में पायेंगे । जो उनकी अपनी वयबद्ध मौलिक शैली है। कविता का सौंदर्य कभी अडिग पहाड़ों से गुजरता है तो कभी कल-कल करती निश्छल नदियों में या फिर पेड़ों के सरसराते पत्तों से । नर्म दूब की छाँव में सुस्ताती कविताओं से भी बरबस मुलाकात हो सकती है। उन्हें सहज पठन कर याद भी किया जा सकता है। शिल्प पर नियंत्रण कवि की प्रौढ़ता का परिचायक है। कविताएं गढ़ी नहीं गई, वह लेखनी से बहती रही है कवि के अंतस्तल में -

वह अच्छा भला था, फल के भीतर

पता नहीं क्यों ढकेल दिया गया । बाहर,

और वह सांसारिक हो गया था।

      कविता में शब्द से सजीवता ऐसे गढ़ते हैं। एकदम सामने, मानों शब्द खुद ब खुद निकल आयेंगे पन्नों से दिमाग में आँखों के जरिये समाजाने को, और परिणामतः कवि सफल होता है अपने प्रयास में, पाठक के दिल में एक कोना मिलना शुरू होता है उसकी कविताओं को -

कहा जब उसने,

बहुत ऊँचा है उनके घर का छत,

कि वह

आसमान को छू सकता है

मुझे नहीं हुआ आश्चर्य

कि.....इनता ऊँचा है उनका मकान

और न कि, आ गया आसमां

क्या । इस बदर नीचे ।

       

        कवित के पास ग्राम्य स्मृतियों और अनुभूतियों का विस्तृत संसार मौजूद है वहाँ उनके पास भागता हुआ लड़कपन, पिता, धात्री, बहनें और स्मृतियों में मिलते हैं बातें करते हैं, और शायद गोष्ठी भी आयोजित कर गुजरते हैं । कविताओं में उद्धत जीवन ग्रामीण परिवेश का है उनकी ग्राम्य संवेदना में कृषक का जन-जीवन है, ग्रामीण संघर्ष की पूरी-पूरी झलक है।

औरों के लिए यह एक खेल है, मेरे लिए । एक परीक्षा की घड़ी है।

सबकी नजरें मेरी ओर टिक गई है।

मुझे अपने आपको पेड़ साबित करना है।

        दरअसल कवि आम आदमी को किसी  फंसाती में नहीं उलझाना चाहते । वे साधारण लोगों के साधारण जीवन के बीच जन-जागरण के पक्ष में निरंतर कहते रहना चाहते है। पेड़, पौधों, जंगल, पहाड़ इसलिए नहीं आती उनकी कविताओं में कि उससे कविताओं में प्रकृति झिलमिलाती है बल्कि इसलिए आती हैं कि साधारण लोगों का जीवन वहीं से आदि है और अंत भी । ये कविताओं केवल ब्यौरों और बयान की कविता नहीं है। दिल से उतरकर दिलों में झांकती आम आदमी की सीधी सच्ची कविताएं हैं ।  विद्रोही तेवर भी है तो वह प्रकृति का सत्य है। संजीव एक बार जरुर पढ़े जा सकते हैं । 

 


n       समीक्षक: संजीव ठाकुर

n       संकलन: भित्ति पर बैठे लोग

n       लेखक: संजीव बक्शी

n       प्रकाशक: ताक्षी-प्रकाशन, रायपुर, छत्तीसगढ़.

n       मूल्य: 80/-


 

 

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