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“मिथ्या
मंजिल” |
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अशोक रहाटगांवकर |
भोपाल
निवासी श्री अशोक मनवानी का लघुकथा संग्रह
“मिथ्या
मंजिल”
को हाल ही में पढ़ने को अवसर मिला। कथा संग्रह पढ़कर मन में विचार
आया कि क्यों ना इस पर समीक्षा लिखी जाये । और बिना कोई समय खोये
हमने अपनी लेखनी उठा ली और अग्रसर हो गये समीक्षा लिखने । श्री
मुकेश वर्माजी द्वारा लिखी गई प्रस्तावना ने ही हमें यह एहसास
दिलाया कि लेखक ने बिना किसी लाग
लपेट के छोटे-छोटे क्षणों को, जो
प्रत्येक के जीवन में आते हैं, अपनी कलम के द्वारा लोगों के हृदय
में उतारने का सफल प्रयास किया है।
54 कथाओं का यह संग्रह एक आम आदमी के इर्द-गिर्द
घुमनेवाली घटनाओं का एक चश्मदीद गवाह है। जबकि आप की इस इक्कीसंवी
सदी में चश्मदीद मिलते नहीं हैं । रोजमर्या
की ज़िदगी में जो कुछ
होता है उससे सीख लेकर तस्वीरों
को रचना आसान
काम नहीं है। उनका यह मानना भी न्यायसंगत है कि अशोक जी की
लघुकथायें कोई
डर, भय, आतंक या रोमांस नहीं फैलाती । ना ही किसी विवाद या विमर्श को
जन्म देती हैं। अशोक जी की
कथायें इस जगत् में तेजी से हो रहे ‘मूल्यों
के हास’
की ओर इशारा करती है । हमें यह संदेश देना चाहती हैं मानो अब पाठक
प्रेमचंद और सुदर्शन जैसे स्थापित कथाकारों की कहानियों को पढ़ने
में घुटन और उब महसूस करने लगा है।
कथायें तो सभी शिक्षाप्रद है और प्रत्येक इंसान को
रास्ता दिखाने वाली हैं । उनकी छः कहानियों का जिक्र हम अपनी
समीक्षा में कर रहे हैं । उनकी कहानी अंहकार में किस तरह धर्म के
उपदेशक भक्तों को या श्रोताओं को सलाह देते हैं कि मनुष्य को अंहकार
त्यागने की सीख देते हैं परतुं स्वयं ही समापन में अपने स्वयं का
अहंकार प्रदर्शित किये बिना नहीं रहते ।कहना न होगा कि उपदेश पहिले
स्वयं कहने वाले को आचार में लाना होता है और बाद में दूसरों को
देना होता है।
दूसरी कथा का शीर्षक
“पोषण”
है, जिसमें यह बताया गया है कि शहर के एक प्रतिष्ठित होटल में
विदेशी व्यंजनों से भरपूर आयोजन में सम्मिलित प्रतिनिधियों को
चर्चा के लिये जो विषय दिया गया था वह था
“गरीब
तबके के लिए बेहत्तर पोषण प्रबंध”
आज भी हम देखते हैं जो पार्टियां स्वदेशी का सीख जनता को देती हैं
वही पार्टियां पाँच सितारा होटलों में अपनी बैठकें आयोजित का अपनी
करनी और कथनी का अंतर स्वयं ही दर्शा देती हैं ।
तीसरी कहानी “दोपहर
वाले साहब”
आज के कामचोर नौकरशाहों के मुँह पर एक करारा तमाचा है। बिना काम
के पद, सम्मान और सारी सुख-सुविधायें मिलें तो अच्छा होगा, ऐसा
सोचने वालों की संख्या में बहुत तेजी से वृद्धि हो
रही है। पात्र
काल्पनिक है या वास्तविक इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । अशोक जी की
लेखनी ने नौकरशाहों की प्रवृति को बहुत सही ढंग से उजागर किया है।
चौथी कथा । शीर्षक कथा
“मिथ्या
मंजिल”
है। जिसमें ये बताने का प्रयास किया गया है कि ये
दुनिया, इसमें मिलने
वाली सारी सुख सुविधायें मिथ्या हैं । सच है तो मृत्यु । वह अटल
है। इंसान चाहे कितने मंजिल इमारत बना ले परंतु
श्मशान जाते
वक्त उसे सब कुछ त्याग
देना ही होता है ।
पांचवी कथा “उनकी
झल्लाहट”
भी करनी और कथनी का अंतर साफ दर्शाती है। राधेश्याम जी का बस्ती के
लोगों को ये समझाना कि पर्यावरण को बचाना है तो पालिथिन के उपयोग
को रोकना होगा, बहुत ही नेक थी। पर
दूसरे ही क्षण सब्जीवाले से
कहना कि सब्जी का धंधा करते हैं एक पालिथिन नहीं रख सकते उनकी सारी
नेक सलाह को धूल में मिला देता है।
छंठी और अंतिम लघुकथा
‘वेलकम’
है। अंगरेज़ी दासता में हमारा भारतीय परिवेश आज भी कैसा जकड़ा है
यह बताने का प्रयास अशोक जी ने किया है। अपनी मातृभाषा हिन्दी को
बोलने में भारतवासी को वह गौरव प्राप्त नहीं होता जो उसे अंगरेज़ी
बोलने में हासिल होता है। इसीलिये
वह कुछ शब्द रट कर अंगरेज़ीयत
का मुखौटा तो मुखौटा ही होता है वह इंसान की सूरत बदल सकता है उसका
हृदय और संस्कृति नहीं । समय और परिस्थिति का ज्ञान न होने के कारण
ही तो चक्रवर्ती जी को
मात खानी पड़ती है ।
कुल मिलाकर 54 रचनाओं का यह लघुकथा संग्रह एक सामान्य
व्यक्ति को दिशा दिखाने वाला है। एक कदम आगे बढ़कर हम यह कहें कि
प्रत्येक मनुष्य को अपने आसपास घटित होने वाली घटनाओं को देखकर
अपने स्वयं को सुधारने का आगाज करता है तो हम समझते हैं इसमें गलत
कुछ भी नहीं है। हम आभारी है अशोक जी के जिन्होंने अत्यंत छोटी
छोटी सी घटनाओं को लेकर एक आम आदमी ही नहीं बल्कि अमिजात्य वर्ग के
लोगों को भी नसीहत दी है। वे इस प्राथमिक शिक्षा को लागू करने के
लिये बधाई के पात्र है।
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समीक्षक:
अशोक
रहाटगाँवकर
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लघुकथा
संकलन:
मिथ्या मंजिल
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लेखक:
अशोक मनवानी
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प्रकाशक:
अखंड सिंधु संसार,
भोपाल
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मूल्य:
50/-