रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001  ई-मेलः srijangatha@gmail.com

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

प्रवासी-कवि

 

 

उषा वर्मा

 

 

 

 

 

मुक्ति का मार्ग

 

 मुक्ति का मार्ग

आओ जीवन की राह खोजें

जिस तर्क का सहारा ले कर

हम आगे बढ़े थे

उसे खा गई

बाज़ार की साख

वक्त का पहिया

क्यों नहीं रुका?

हम धीरे धीरे बनते गए रोबोट

अच्छा, यह तो बताओ

कौन छीन ले गया

हमारी संवेदनाओं को

हमारे प्यार को जो तुम्हारे प्रति समर्पित था

बिना बताए धीरे धीरे

छूट गया वह अतीत

एक चमकती लकीर के पीछे भागा

भागा तो,

पर मिला एकाकीपन

काँपते पारे सा मन का सूनापन

विकल्पों का विस्तार

पर बचा एकरस जीवन

रिश्ते जो रिश्ते नहीं थे

वे थे बाज़ार के लोहे,लोहे के गठबंधन

क्या टूटेंगी ये इस्पात की जंजीरें

ये कर्ण भेदी आवाज़ें

हम फिर ठगे गए

क्या करें पीछे लौट जाएं

आस्थाओं के कोहरे में

सजाने को अपनी अर्थियाँ

जहां आग हो ऊष्मा न हो

फिर पीछे देखना संभव कहाँ

तो चलो

फिर रचें शब्दों के जाल

बहका दें दुनिया को भेड़ चाल

जो न तारे देखते हैं न सूरज न आसमान

चले जाते हैं

अपने पैरों को देखते हुए

पर वे चलते तो हैं

और वे,जो बेनूर ऊपर देखते हैं

चाँद को तारों को सूरज को

पर चलते नहीं। क्या फ़र्क ह

उनमें जो पैरों को देख कर चलते हैं

और वे जो बेनूर

ऊपर देखते हैं

नया क्या है/प्रयोजन क्या है

जीवन के आख़िरी पड़ाव पर

सब कुछ एक ही है

एकाकार, निराकार, बेकार

   

 

कर्ज़ है कविता का

 

कविताएं नहीं बँधती है

 देश की सीमाओं में

वे चली जाती हैं सीमाओं के पार

न देश का नाम, न लोगों का नाम

वे नहीं बँधती हैं

मन के बंधन में

उड़ जाती हैं ऊपर ऊपर

लाँघ कर मन की दीवार

वे बात करती हैं रूहों से, आत्माओं से

वे रहती हैं स्वतंत्र बंधनहीन अनाम

कोई भी उन्हें पढ़ सकता है

इसीलिये लोग लिखते हैं कविता

कि शायद वे किसी का मन छू लें

किसी को बता दें

अपना पता अपना घर

जहाँ कोई पढ़ना चाहे

तो आ-जा सकता है

रह सकता है इन घरों में

यह सुख, कर्ज है कविता का

 

पत्थर सा भारी पड़ा हुआ

 

घबराया मन

पत्थर-सा भारी

पड़ा हुआ

एक दिन और

इसी तरह

पसर गया

खींचे थे पानी से

कितने चित्र

वह दिन भी बिना

कुछ कहे सुने

गुज़र गया

बादल घिरा घना

उमड़ा भी बेहद

फिर क्यों हर बार

बिन बरसे

रह गया

जैसा भी जो जीवन

मिला मुझे

सुख दुःख की धूप-छाँव

बरस दर बरस

निकल गया

इच्छायें आकांक्षायें थी

बहुत बड़ा

धुँधलाया दर्पण

घबराया मन

सहम सहम कर

बिखर गया

 

 

 

प्रवासी-कवि

 मनुष्य ही ऐसा जीव है जो हास्य की शक्ति से संपन्न है - ग्रेविल

आपकी प्रतिक्रिया

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, संजीव ठाकुर

तकनीकः प्रशांत रथ

Google
WWW http://www.srijangatha.com