
सोहन राही
सोहन राही का जन्म करीब 70 वर्ष पहले पंजाब के एक ख़ूबसूरत गाँव
लसाड़ा, ज़िला जालन्धर में हुआ था। माता पिता ने अपने पुत्र का नाम
सोहन लाल रखा था, लेकिन करीब पचपन वर्ष से इनके चाहने वाले इन्हें
सोहन 'राही'
के नाम से जानते और पहचानते हैं।सोहन राही की प्रारंभिक शिक्षा
फगवाड़ा, ज़िला कपूरथला (पंजाब) में हुई। सन् 1950 से इनका शायरी
का सफ़र प्रारम्भ हुआ। प्रेम वारबर्टनी और मौलाना माहिर-उल-क़ादरी
का आशीर्वाद सोहन 'राही'
को मिला। वर्ष 1963 में सोहन
'राही'
ब्रिटेन में बसने के लिये आ गये। सोहन राही ने 1952 में
'नवयुवक
सभा'
और 'बज़्म-ए-अदब'
की नींव फगवाड़ा में रखी। सन् 1976 में
'हल्क़ा-ए-अहल-ए-सुख़न'
की नींव लंदन में रखी और सन् 1977 में अंजुमन तरक्क़ी उर्दू
(ब्रितानियां) की शुरूआत की। इसके पश्चात 1978 में
'इदारा
अदब-ए-लंदन'
की बुनियाद रख कर उर्दू त्रैमासिक पत्रिका
'अदब'
का शुभारम्भ किया।सोहन 'राही'
1971 से 1989 के बीच बी.बी.सी. में सीनियर आर्किटेक्चरल असिस्टेंट
के पद पर कार्यरत रहे।ब्रिटेन एवं भारत में बेशुमार पुरस्कारों एवं
सम्मानों से सुशोभित सोहन राही के अब तक हिन्दी एवं उर्दू में 8
कविता/ग़ज़ल/गीत
संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लिखी 6 पुस्तकें इस समय
प्रकाशनाधीन हैं। शायरी सोहन
'राही'
के लिये शौक़ ही नहीं बल्कि ज़िन्दगी की इबादत है। शेअर-ओ-अदब इनकी
ज़िन्दगी है और गीत इनका ओढ़ना बिछौना है।

क्यों न तेरे द्वार गई मैं
डूब बीच मंझधार गई मैं
आर गई न पार गई मैं
!
मन की चाहत आग बनी है
रात अंधेरी नाग बनी है
साँसों के लम्बे रस्ते पर
जीवन के पग हार गई मैं
डूब बीच मंझधार गई मैं
आर गई न पार गई मैं
!
बीच भंवर तरना न जानूँ
दु:ख
अपना हरना न जानूँ
सीस नवाने दीप जलाने
क्यों न तेरे द्वार गई मैं
डूब बीच मंझधार गई मैं
आर गई न पार गई मैं
!
तू मेरे गीतों का रसिया
तू मेरे आकाश का दीपक, तू चन्दा तू तारा
तू मेरे दिन का सूरज, तू रातों का उजियारा
तू मेरे सपनों की छाया
तू मेरी रातों की छाया
बिन तेरे दिन रात न मेरे
तू मेरी चाहों की काया
तू मेरे तन का साथी, तुझसे जीवन धारा
तू मेरे दिन का सूरज, तू रातों का उजियारा
तू मेरी पूजा का मन्दिर
मैं
'राधा'
तू मेरा 'मधुकर'
तू मेरे गीतों का रसिया
मैं
'मीरा'
तू मेरा 'गिरधर'
मैं हूँ तेरी जोगन
'राही'
तू मेरा इकतारा
तू मेरे दिन का सूरज, तू रातों का उजियारा
आवाज़ों के जंगल में
सुर रेखा कि लहरियों में, आज मुझे यह कहना है
जीवन की कंचन काया का अमर प्रेम ही गहना है।
दु:ख
दर्पण में तेरी मेरी मूरत फिर से उभरी है
फिर बेरंगे लहू की बदली, पातालों से गुज़री है
फिर अपनी चाहों का पूनम बिंदिया बिंदिया बहना है।
चाहे ग़म के चांद उगे हों पात पात के पहलू में
चाहे सातों सागर उमड़ें जीवन के हर आँसू में
आवाज़ों के जंगल में तो हमको चुप ही रहना है।
आशा का सिंदूर जो छीनें, कारे कारे बादल भी
बह जाए जो नैन कंवल से रंग उड़ाता काजल भी
फिर भी जीने के कारण, हर अग्नि बाण को सहना है
