रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001  ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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प्रवासी-कवि

 

 


डा. सत्येन्द्र श्रीवास्तव

जन्म-5 अगस्त 1935 (उत्तर प्रदेश) भारत। शिक्षा-पी.एच.डी.-लंदन विश्वविद्यालय, यू.के. से। अध्यापन-टोरोन्टो विश्वविद्यालय (कैनाडा), लंदन विश्विद्यालय, लंदन, सिटी विश्वविद्यालय, लंदन, 5 वर्षों तक केंब्रिज विश्वविद्यालय में अध्यापन । लेखनकर्म-भारत, थाईलैण्ड, मलेशिया, केनिया, दक्षिण अफ़्रीका, ज़ाम्बिया, रूस, जापान आदि देशों में कुछ लेक्चर और हिन्दी एवं अंग्रेज़ी कविताओं एवं आलेख पाठ । हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में लेखन। महत्वपूर्ण हिन्दी / अंग्रेज़ी साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन। नियमित कॉलम लेखन-धर्मयुग (साहित्य वातायन), नवभारत टाइम्स। लन्दन से सण्डे मेल, लंदन की चिट्ठी, प्रभात ख़बर, आउटलुक, नया सवेरा। प्रसारण ऑल इण्डिया रेडियो, आकाशवाणी, बी.बी.सी. रेडियो और टेलिविज़न। ट्रिनिडाड टेलिविज़न। पुस्तकें-जलतरंग, एक किरण का फूल, स्थिर यात्राएं, मिसेज़ जोन्स और वह गली, सतह की गहराई, कुछ कहता है यह समय (सभी काव्य संग्रह)। टेम्स में बहती गंगा की धार (ब्रिटेन में बसे भारतीयों की संघर्ष गाथा पद्मानंद साहित्य सम्मान से सम्मानित), कन्धों पर इन्द्रधनुष (यात्रा डायरी), शहीद ऊधम सिंह, उनका समय, उनकी क्रान्ति, बेग़म समरू, मिस वर्ल्ड अनडिक्लेयर्ड (सभी नाटक), कहीं क्षितिज कहीं लहरेंTalking Sanskrit to Fallen Leaves, Between thoughts and Another silence (मूल अंग्रेज़ी कविताओं के संग्रह), Sir Winston Knew my Mother (London – 2006)ंपादन-AMBIT अंग्रेज़ी त्रैमासिक के संपादक मंडल के सदस्य।

 

संपर्क : Flat 25, 8 – Newton Street, London WC2B 5EG. Tel: 00-44-2074045489. Mobile: 07952646321.

 

वस्तु:स्थिति

 

सामने जो बुत बनी-सी चुप खड़ी है

वह परीक्षण की घड़ी है।

 

      डेस्क पर रक्खे पड़े हैं कई कोरे पृष्ठ

      अंगुलियों में जड़ हुई सहमीं रुकी पेंसिल

            दृष्टियों में बाढ़ है बीते हुए कल की

      बह रहे हैं धड़ों से अलगा चुके कुछ दिल

 

अर्थियां हैं स्याह क्षितिजों की

लाश किरणों की पड़ी है।

 

      मोह आहत सीढ़ियों पर झुका बैठा दंभ

      चल रही है ग्रीक ट्रेजेडी, गिर रहे स्तम्भ

      संतरी ख़ुद बन गया खलनायकों का नृप

      यहाँ विधिवत हो रहा है नाश का आरम्भ

 

प्यार है अपशब्द जग के कोश में

सुधि परीक्षक की छड़ी है।

 

      फैलती ख़मोशियाँ, हर इंच पीड़ा की दरक

      हर जगह हैं प्रश्न, उत्तर अब न लाते कुछ फ़रक

      सिर नहीं खुजला रहे हम हैं समय को नोचते

      उम्र की जलधार में हर क्षण मगर जाता सरक

 

सृष्ट अपनी बेबसी की श्रृंखला

पीढ़ियों की यह कड़ी है।

गीत

 

इस शहर में हवा भी बहती नहीं

बिन घुटे इक साँस भी जैसे निकलती नहीं

 

हर जगह हर रोज़ कूड़ा बन रहा पर्वत

फेंकने की सभी पड़ गई है आदत

अगर ढेले या शिकायत नहीं तो अपशब्द

ढो रहा हर शख़्स कंधे पर कोई आफ़त 

है सभी को गिला उनकी आज चलती नहीं

 

 

कल दिखे कवि बगल में पोथी दबाए हुए

साथ थे नेता कोई झण्डा उठाए हुए

कर रहे थे क्रांति की दोनों सरासर बात

किंतु श्रोता नशे में थे लड़खड़ाए हुए 

चाहने पर भी यहाँ अब आग जलती नहीं

 

हो रही सच्चाइयों की धूप प्रतिक्षण तेज़

पर सभी को यहाँ है बदलाव से परहेज़

समय की प्रत्येक ध्वनि है उठाती कुछ डर

डाँटता भी रोज़ है इतिहास का हर पेज 

है जिन्हें 'जस-तस' की स्थिति कभी खलती नहीं।

 

सार

 

दाँव लगे हैं

उत्सुक आँखें

गुज़रा हफ़्ता भी ।

      रख दो बावन पत्तों के संग

      मेरा पत्ता भी ।

 

बड़ा तेज़ है आयु चक्र यह

घूम रहा है पहिया

दिन हफ़्तों मासों वर्षों में

करता हैय्या हैय्या

      मैं भी जुड़ा जग से

      ज्यों वह मधु-छत्ता भी ।

 

निचुड़ रहा हूं मधु रस जल सा

बूँद बूँद हो

कर्ज़ ज़िन्दगी, सांसे चलती

जहाँ सूद हो

      जीवन घटता ज्यों नित

      भोजन कपड़ा-लत्ता भी ।

 

यह विस्तृत दुनियाँ मशीन है

जुड़े हुए ही सच हैं

बाकी सब अतिरिक्त आँकड़ों की

केवल खचखच है !

      डेमोक्लीज़ का खड़ग बनी

      ऊपर की सत्ता भी ।

 

कितना भी सब मिथ्या होले

ख़त्म नहीं हो सकता

चक्र यहा चलता जाएगा

दाँव नहीं है रुकता

      कच्ची है दीवार कहीं तो

      है कुछ पुख़्ता भी।

 

 

 

 

प्रवासी-कवि

सब कुछ लुट जाने के बाद भी भविष्य ब़ाकी रहता है - बौबी

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