रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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प्रवासी-कवि

 

 

प्राण शर्मा

 

जन्म-13 जून 1937 को वज़ीराबाद (अब पाकिस्तान में) । शिक्षा-एम. ए. हिन्दी (पंजाब विश्विद्यालय) । लेखन-बचपन से ही गीतों (फ़िल्मी) को गाते-गाते तुकबन्दी का शौक। 1955 से ठोस लेखन। जलंधर में आकाशवाणी को कवि-सम्मेलनों में सक्रिय भागीदारी। भारत देश की सभी प्रमुख हिन्दी पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। पुरस्कार-1961 में, भाषा विभाग पटियाला द्वार आयोजित अखिल भारतीय टैगोर निबंध प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार। 1982 में कादम्बिनी द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में सांत्वना पुरस्कार। 1986 में लेस्टर ईस्ट मिडलैण्ड आर्ट्स द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार। कृतियाँ-सुराही एवं ग़ज़ल कहता हूँ (दोनों ग़ज़ल संग्रह)

 

संपर्क 3 Crackston Close, Coventry, CV2 5EB, UK

 

बसते बसते ही लोग बसते हैं

 

अच्छे अच्छे चमन उजड़ते हैं।

ऐसे ऐसे ख़िज़ां के धन्धे हैं।

 

हम भी कितने अजीब बंदे हैं

औरों के झंझटों में पड़ते हैं।

 

इतनी ख़ामोशी भी नहीं अच्छी

लोग समझें कि आप गूंगे हैं।

 

ग़म नहीं कर कि ज़िन्दगानी में

बसते बसते ही लोग बसते हैं।

 

दाद इन्सां को दें कि दुनियाँ के

उलझे उलझे सवाल सुलझे हैं।

 

ये जो उतरे तो मन से बोझ हटे

"प्राण" एहसान भी तो कर्ज़े हैं।

 

कहते हैं ग़ज़ल अच्छी बहर में

 

शौक़ से आए कोई मेहमान घर में।

हो न कोई खोट पर उसकी नज़र में।

 

रोज़ इक नयी तमन्ना ज़िन्दगी की

क्या पता, क्या-क्या छिपा है इस नहर में।

 

पूछते हैं हाल-ए-दिल अपना समझकर

लोग अच्छे भी तो मिलते हैं डगर में।

 

बोलिये तो बोलिये कुछ आप ऐसे

जैसे कहते हैं ग़ज़ल अच्छी बहर में।

 

कोई तो पाए तजुर्बा "प्राण" उनसे

कोई तो आए बुज़ुर्गों के असर में।

 

 

ख़्वाहिशों को ज़रा क़रार आए

 

काँटों पर भी ज़रा निखार आए।

काश, ऐसी कभी बहार आए।

 

ऐसे बोले वो सामने सबके।

जैसे हर शर्म को उतार आए।

 

कुछ कमी न्योते में रही होगी

जश्न पर लोग बस दो-चार आए।

 

कामयाबी पे यार की यारो

क्यों किसी यार को बुख़ार आए ।

 

आओ कुछ देर "प्राण" सो जाओ

ख़्वाहिशों को ज़रा क़रार आए।

 

 

 

 

प्रवासी-कवि

 पाप न करना दुनिया की भलाई करना है - दयानंद सरस्वती

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