
कला ज्योति
परिवार के कवि
कला ज्योति एक लंदन में महिला
रचनाकारों की साहित्यिक संस्था है जहाँ हिन्दी की कवियत्रियाँ एक
दूसरे को कविता सुनाती हैं और पुष्पा भार्गव जी के नेतृत्व में
कविता को तराशती भी हैं। पिछले एक वर्ष से लंदन की एकमात्र
साहित्यिक पत्रिका पुरवाई में कला ज्योति की कवियत्रियों की
कविताएं प्रवासी काव्यधारा स्तम्भ के अंतर्गत प्रकाशित होती
रही हैं। कला ज्योति की अध्यक्षा पुष्पा भार्गव उत्तरी लंदन के
भारतीय समाज की एक जानी मान हस्ती हैं। आपका जन्म भारत में मथुरा
में हुआ। एम.ए. तक शिक्षा ग्रहण करने वाली पुष्पा भार्गव पिछले 42
वर्षों से ब्रिटेन में भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व कर रही
हैं। कला ज्योति के माध्यम से आप भारतीय संगीत, साहित्य एवं अन्य
कलाओं को प्रोत्साहित करती हैं। संस्था के प्रमुख स्तम्भ पुष्पा
भार्गव आजकल आई.एफ़.बी.एम. (इंडियन फ़ोरम ब्रिटिश मीडिया) की
प्रधान सचिव भी हैं। आपकी कविताओं का एक संग्रह अन्तर्नाद प्रकाशित
हो चुका है। दूसरा काव्य संग्रह प्रकाशनाधीन है।
कला ज्योति के 5 सदस्यों की कविताएँ प्रस्तुत हैं
–
1. श्रीमती पुष्पा भार्गव,
Pushap-Kamal,
243-C,
Wingletye Lane,
Essex, RM11 3BL (UK)
2. श्रीमती तोषा त्रेहन,
Pushap-Kamal,
London N12
9HH,
(U.K.)
3. श्रीमती राज मौडगिल,
27 Dollis Avenue,
Finchley,
London N3
1DA,
(U.K.)
4. श्रीमती सरोज सूद,
142 Albert Palace Mansions,
Lurline
Gardens,
London SW11 4DJ(U.K.)
5.
डा. इंदिरा आनन्द,
18 West End Avenue,
Pinner, Middlesex,
HA5 1BJ
(U.K.)

पुष्पा
भार्गव की दो कविताएँ
मरूस्थल
इन रेत के ढेरों में लिखी
हैं विचित्र कहानियाँ।
काफ़िले
कितने चले थे
हमसफ़र की आस में
थक के पहुँचे दूर
मरुद्यान की तलाश में
पा से न प्यार, ग़म में
लुट गईं जवानियाँ।
चले थे पड़ाव से
एक चाँदनी की रात में
बिछुड़ कर भटके, रहा न
साथी कोई साथ में।
शीत में चुभने लगीं
वहाँ रात की तन्हाइयाँ।
दूर तक सूखे मरूस्थल
फैलते वीरान में
धूप की गर्मी से तपते
रेत के मैदान में
दीखतीं हर बार केवल
अपनी ही परछाइयाँ।
रेत के टीलों को बदला
आँधियों ने राह में
बिछुड़े राही ढूंढते
पद-चिन्ह सूखी राह में
खो गये वीरान में
न मिली सकीं निशानियाँ।
इन रेत के ढेरों में लिखी
हैं विचित्र कहानियाँ।
परदेसी मन
परदेसी मन ने झुक झुक कर
देखे देश के कितने सपने
अपना घर और सगे बन्धु-जन
वह पल जो अब रहे न अपने।
दूरी के फैले पंखों से
सिहर उठा मन का स्पन्दन
व्यस्त व्यवस्था ने कर डाला
कितना कठिन प्यार का बन्धन।
परिवर्तित जीवन में ढल कर
जब एक सभ्य देश का वासी
भूला निज भाषा, संस्कृति को
बरबस हो कर, मौन प्रवासी।
उठती रहती अन्तस्तल में
बार बार मन की जिज्ञासा
कैसी व्याकुल सी अकुलाती
अपने घर जाने की आशा।
आँखों से सावन बरसे जब
स्मृति के घन घिर घिर आए
प्रबल विवशता में उलझे यह
पाँव कभी भी लौट न पाए।
तोषी त्रेहन की दो कविताएं
खोई राह
तुम आशा का दीप जला दो
खोई राह स्वयं पा लूँगी।
तुम नभ में चन्दा सम चमको
मैं रजनी बन कर मुस्काऊँ
तुम दिनकर बन दमको दिन भर
मैं अवनी सम देह तपाऊँ।
तुम थोड़ा सम्बल दो मुझको
अंतिम झोर स्वयं पा लूंगी
तुम आशा का दीप जला दो
खोई राह स्वयं पा लूँगी।
साज़ तुम्हारा हों स्वर मेरे
मादक सी झंकार भरें हम
अधर भरे मुस्कान तुम्हारी
जीवन से यूं प्यार करें हम।
तुम पहली पंक्तियाँ सुना दो
पूरा गीत स्वयं गा लूँगी
तुम आशा का दीप जला दो
खोई राह स्वयं पा लूँगी।
आओ कदम मिलाकर साथी
कुछ बन जाएं कुछ कर डालें
जगत के कोने कोने को
दिव्य दीप्ति से भर डालें।
लक्ष्य और तुम इंगित कर दो
फिर मैं लक्ष्य स्वयं पा लूँगी
तुम आशा का दीप जला दो
खोई राह स्वयं पा लूँगी।
आज है मधुमास सूना
आज है मधुमास सूना
शून्य पथ पर मैं खड़ी हूँ
सोचती हूँ बात बीती
उर में गहरी पीर व्यापी
और मेरी दृष्टि रीती
बढ़ रहा है दर्द दूना
आज है मधुमास सूना
सिसकता सुकुमार जीवन
आपदाओं से घिरी हूँ
हो चुका निष्प्राण चूंकि
मैं अभागी ही निरी हूँ
हर्ष का संसार ऊना
आज है मधुमास सूना
दोष क्या मैं दूँ किसी को
भाग्य ने मुझको गिराया
ठोकरें लगतीं रहीं पर
कब किसी ने है उठाया
पाप क्यों है मुझको छूना
आज है मधुमास सूना
सरोज सूद की दो कविताएं
परिवर्तन
आता है कभी संसार में
सुभग नव-प्रात परिवर्तन
छुपा रहता है जिसमें
नयें निर्माण का अकिंचन।
नई आशा नई भाषा
नया ही भाव होता है
नई इस भावना में
मनुज का श्रृंगार होता है।
नए श्रृंगार में मानव
सदा ही त्राण पाता है
शुभाशा में निराशा की
कभी न रेख पाता है।
कभी क्या सार जीवन का
सदा मधुरिम ही हो पाया है
नये मधुमास में पतझड़ का
अन्तिम लेश होता है।
सामान
कृत्रिम चेहरा, झूठा व्यक्तित्व,
बनावटी पहचान लिए
भाग रहा है इन्सान, कन्धों पर
शतवर्षिये सामान लिये
हीरे हैं, जवाहरात भी, ढेरों धन,
कानूनी काग़ज़ात भी
सुन्दर भवन हैं, दीवारें स्वर्णिम,
चाँदी के जंगले भी
पाँव तले धरती नहीं तो क्या,
आकाश छू लेने की बात भी
झूठ, दग़ा, फ़रेब और
नफ़रत की पोटली बांधे
समस्त संसार को बटोर
लेने की चाहत भी।
नयन मूंदे, स्वयं से खोया
भाग रहा है इन्सान
कृत्रिम चेहरा, झूठा व्यक्तित्व,
बनावटी पहचान लिये।
समय थमता नहीं, पाया सो खोना है,
बहुत देर हो चुकी है
सांझ के झुटपुटे में घड़ी की
टिकटिक देती है आभास
जर्जरित तन, कुंठित मन,
झुर्रियों भरा चेहरा है साथ
हड़बड़ाहट में. यहाँ-वहाँ खोया
सामान खोजते हैं हाथ
सुनहला भवन भी ढेर हो चुका है
कहता है एक आवाज़
सैंकड़ों प्रश्न हैं, उत्तर चाहिये
भाव बिखरे हैं
शतवर्षिये सामान किसी
काम आया ही नहीं
अतिरिक्त इसके कुछ और
कमाया भी तो नहीं।
राज मौडगिल की दो कविताएं
ग़म
जो ग़म मिला उसी को गले से लगा लिया
दिल को उसी की आग ने अक्सर जला दिया
आँखों में ख़्वाब रखे थे हमने सम्भाल के
अशकों में ना-उम्मीद ने उनको बहा दिया
औरों की कमियों को जो हम देखने चले
दरपन ने लेकिन हमको ही मुज़रिम बना दिया
लम्बी यूं जो हो गई जो ग़म की अंधेरी रात
बिन रोशनी जीना अन्धेरों ने सिखा दिया
पूजा या पाठ से हमें कोई न वास्ता
मन की सफ़ाई को ही धरम बना लिया
हद से जब बढ़ा तो ग़म ग़म ना रहा
हर दिल की चोट ने सहना सिखा दिया
आकाश की बुलन्दियाँ कदमों पे थीं कभी
उनकी निगाहों ने ज़मीन पर गिरा दिया
दस्तक क्या दी मौत ने दर पर हमारे जब
जीने का उसने राज़ भी हम को सिखा दिया
ऊँचे महान् हम कोई शायर नहीं हैं राज
बस हाल-ए-दिल को शब्दों में यूं ही सजा दिया।
ज़िन्दगी के दो पहलू
सुख, दुख, कलियाँ और काँटे जब मिले
देखा जहाँ भी ज़िन्दगी के दो पहलू मिले
राह में ख़ुशियों की हमने
जब कभी रखा कदम
ग़म के समुन्दर से उभरते
हमें दो आँसू मिले।
बोए तो हमने थे कभी
फूल के पौधे मगर
ज़िन्दगी के बाग़ में
फूलों के संग काँटे मिले।
टूटते सपनों की चोट ने
जब कभी तोड़ा हमें
सुबह की किरणों से बिखरे
रात के अंधेरे मिले।
लौ की लगन में शमा पर
मिटते जहाँ पतंगे मिले
रस की ख़ातिर फूल
कलियों पर हमें भौंरे मिले।
ज़िन्दगी के इस सफ़र में
दोस्त तो बेहद मिले
मुश्किलों में साथ देते
वह बहुत ही कम मिले।
जब घोर अंधियारी की
गहराई से हम घबरा गये
तो टिमटिमाती रोशनी
करते हमें जुगनू मिले।
मिलने को सागर से तो
बहती है नदिया मगर
यह मुमकिन है कहाँ
हर नदी को सागर मिले।
इंदिरा आनन्द की दो कविताएं
वरदान नहीं माँगा करते
कब जाना शलभ बेचारे ने, जलना उसकी नादानी है
शबनम का कतरा क्या जाने, वह मोती है या पानी है
कंटक में कलियाँ पलीं, चटख कर फूल बनीं, अलि मंडराया
वे क्या जाने अलि तब तक है, जब तक यह खिली जवानी है।
जो देने में ही सुख पाते, प्रतिदान नहीं माँगा करते
जिनको विश्वास अडिग निज पर, वरदान नहीं माँगा करते।
जिन पर सागर को गर्व, वही लहरें अपहृत हो जाती हैं,
बन मेघ श्याम, अम्बर के नीले आंगन में छा जाती हैं।
सागर का प्रेम अगाध विकल हो अवाहन करता जाता
ये सजल घटायें सावन बन, धरती पर चू चू जाती हैं।
जिनको वसुधा से प्रेम, स्वर्ग का दान नहीं माँगा करते
जिनको विश्वास अडिग निज पर, वरदान नहीं मांगा करते।
सूरज की किरणे प्रखर सही, गति देतीं, जीवन देतीं हैं
तिमिरावृत पथ को ज्योतिदान, फूलों को यौवन देती हैं
पर हुई प्रशंसित सदा, चाँद की अलस चाँदनी स्वप्नमयी
उन सूर्य रश्मियों को सदैव, शशि किरणे लांछन देती हैं।
है कर्म क्षेत्र से नेह जिन्हें, सम्मान नहीं माँगा करते
जिनको विश्वास अडिग निज पर, वरदान नहीं माँगा करते।
माटी सब की एक
इस घाटी से कई काफ़िले गुज़र गये हैं
शिखरों को जाने वाले धुंधों में भटक गये हैं।
उस पार उजाला है, यह सब जाने हैं लेकिन
लोभ-मोह की बेड़ियों में जैसे जकड़ गये हैं।
जो हैं बंधनमुक्त, दलदल में कमल समान
उस योगी की जीने का अन्दाज़ अलग है।
माटी सब की एक सौरभ की बात अलग है।।
इस पथ के हर राही का विश्वास अलग है
सबका अपना प्याला, अपनी प्यास अलग है।
जीवन के चौराहे खंडहर पर मिलते हैं
पतझड़ सबका एक महज़ मधुमास अलग है।
माटी सबकी एक, मगर जज़बात अलग हैं।।
यूं तो इस अम्बर से अविरल मधु है झरता
लेकिन प्याल किसी किसी विरले का भरता।
अपनी अपनी खोज लिये घर से निकले हैं
मंज़िल सबकी एक अहम पुरुषार्थ अलग है।
माटी सबकी एक, जीत और हार अलग है।।
वर्तमान की जननी है अतीत, वर्तमान भविष्य बनाता है
कर्म है कारण और कर्म ही परिणाम बन जाता है।