रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001  ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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प्रवासी-कवि

 

 

जय वर्मा

                                                               जन्म- मेरठ, जीवाना में । शिक्षा- भारत से स्नातक, इंग्लैड से बी.टेक(वित्त), एडवांस डिप्लोमा (सर्विस मैनेजमेंट), पोस्ट ग्रेजुएट सर्टिफिकेट(प्रबंधन) । पन्द्रह वर्ष तक शिक्षण कार्य । बीबीसी लोकल रेडियो में हिंदी कार्यक्रम प्रस्तुति । इन दिनों- नॉटिंग्घम में क्वालिफाईड मैनेजर (स्वास्थ्य सेवा)  क्रियाकलाप- यू.के में एशियाई कला और कविता के विकास में निरंतर सक्रिय ।  बहुभाषी साहित्यिक संगठन 'गीतांजलि' की अध्यक्षा । प्रवासी टाइम्स की संवाददाता । नॉटिंग्घम एशियन कला परिषद की सदस्या । प्रकाशन- ओएसिस पोएम(2003), पुरवाई(जनवरी 2003), गगनांचल पत्रिका, प्रवासी टाइम्स । आयोजन- एशियाई कविता से जुड़ी गतिविधियाँ । सम्मान- कविता कर्म के लिए मार्च 2006 में नॉटिंग्घम के मेयर द्वारा सम्मानित ।

 

 संपर्क- Jai Verma, 3 Dormy Close, Bramcote, Nottingham NG9 3DE

 

 

क्यों चाहूँ नया जन्म क्यों चाहूँ मोक्ष

 

अगला जन्म तो मैंने जाना नहीं

पूर्व जन्म मुझे याद ही नहीं

देख ली हमने प्यार की दास्ताँ यहीं

स्वर्ग-नर्क दोनों हैं धरा पर यहीं

 

उमंग दिलों में चहूँदिशा देखी

पर्व-उत्सव नव चेतना देखी

वसंत ऋतु में अंकुरित धरा देखी

मन के आँगन में नृत्य वर्षा देखी

 

रिश्तों को सार्थक होते देखा

प्रेम श्रधेय का सिद्धांत देखा

भौंर हुए सुनहरे रंगो को देखा

सूर्य, चंद्र एवं तारों को संग देखा

 

जीवन का सुख नयनों में देखा

बाँसुरी की धुन में स्पर्श देखा

मझधार की तरंगों को झूमते देखा

अँधेरी गलियों में आशा का दीप देखा

 

फिर क्यों चाहूँ मैं नया जन्म क्यों चाहूँ मोक्ष

 

 

ऐसा क्यों

आसमाँ के ये रंग बदलते हैं क्यों

कहकशाँ इतनी दूर होते हैं क्यों

 

जमीं तो घूमती है सूरज के चारों तरफ़

चाँद भी चक्कर काटे धरा की तरफ़

 

अँधेरा बस अच्छा लगता है सितारों के वास्ते

वर्ना घुप अँधेरों में कायनात के क्या रास्ते

 

ख़ुद-ब-ख़ुद खींच लेगी चाहत मेरी

कशिश है जैसे जमीं में भरी

 

चाँद को भी रात में खो जाने दो

सुबह के सुनहरी रंग बिखर जाने दो

 

परछाइयाँ भी अब तो बढ़ने लगी

तन्हाइयों की बेइंतहा होने लगी

 

इल्म नहीं है तुम्हें मेरे इंतजार का

शुरू हो गया ये सिलसिला प्यार का

 

 

एक पल

 

एक पल के लिए जी लेने दो

एक पल ही तो बस अपना है

इस पल को मुझे छू लेने दो

 

आसमान से टूटे तारे से पूछा तुम कहाँ से आए

फ़ुर्सत न एक पल की अपनी झलक दिखा जाए

तारे ने कहा मैं बहुत दूर से आया हूँ

एक लम्बा सफ़र तय कर आया हूँ

तुमने जो मुझे देखा

ये एक पल है बस मेरा

अब न मैं ठहर पाऊँगा

अंतरिक्ष में कहीं खो जाऊँगा

फिर न कभी किसी को याद आऊँगा

 

नदी का कल-कल करता पानी अपनी चंचलता दिखलाए

अपनी धुन में बेख़बर एक ही दिशा में बहता जाए

इठलाती-लहराती नदी सागर को मिलने जाए

 

 

 

 

 

प्रवासी-कवि

यदि स्वर्ग में पहुँचने की इच्छा है, तो पहले बालक बनो - इंजील

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