रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001  ई-मेलः srijangatha@gmail.com

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

लघुकथा

लघुकथाएं

आईनाः सुभाष चंदर बर्दाश्त की हद कमल चोपड़ा जिंदा लोगः डॉ. सतीशराज पुष्करणा

सात फेरों का सचः डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी दहलीजः आनन्द बिल्थरे


माह के लघुकथाकारः डॉ. तारिक असलम तस्नीम

 

 

माह के लघुकथाकार

डॉ. तारिक असलम तस्नीम

छोटी सी बात


       कीना कॉलेज जाने के लिए तैयार ही हो रही थी कि रेयाज का फोन आ गया । उसने बॉटनिकल गार्डेन में मिलने के लिए बुलाया था। इसलिए, कॉलेज की घंटियां खत्म होते ही गार्डेन जा पहुँची।

 

        दोनों ने गार्डेन के कैफे में नाश्ता किया, फिर इधर-उधर घूमते हुए दुनिया-जहान की बातें करते रहे । उन्हें होश ही नहीं रहा कि कब शाम हो गई और पाँच बच गए ।

 

        वह घर पहुँची तो माँ ने आड़े हाथों लिया, यह घर आने का वक्त है ? तुम पढ़ने जाती हो या नौकरी करने ? मुझे तुम्हारा यह रवैया जरा भी पसंद नहीं है, सकीना । अम्मी गरजीं।

 

        आज थोड़ी देर हो गयी अम्मी । रास्ते में रेयाज मिल गया था। उसी के साथ बातचीत में थोड़ी देर हो गयी । बस इतनी सी तो बात है और एक आप हैं कि हल्ला मचाये जा रही हैं। उसने भी अपनी ओर से हल्की सी नाराज़गी जतायी ।

 

        लेकिन तेरा यह तौर-तरीका मुझे पसंद नहीं है सकीना । जरा सोच तो सही किसी ने साथ देख लिया तो कितनी बदनामी होगी। मुहल्ले में हमारी क्या इज्जत रह जाएगी। लोग तुझ आवारा, बदचलन और न जाने क्या-क्या कहेंगे ? तू समझती क्यों नहीं?“ माँ ने समझाने की अथक कोशिश की।

 

        पहले तो सकीना चुप रही, फिर न जाने क्या सुझा, बोली, अम्मी । मुहल्ले के लड़के चाहे किसी से प्यार करें, किसी से रोमांस करें और साथ घूमे-फिरें। तब किसी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता । किसी को कुछ भी गलत दिखाई नहीं देता, लेकिन जब कोई लड़की किसी से प्यार करें या किसी के साथ घूमे- फिरे तो लोग बावेला मचाने लगते हैं। उसे कालगर्ल तक कहने लगते हैं। आखिर औरत भी तो किसी मर्द के साथ ही घूमती है फिर यह दोहरी मानसिकता क्यों ?”

 

दहलीज पर


        काफी दिनों बाद दोनों सहेलियाँ मिल रही थीं, इसलिए एक-दूसरे को देखते ही लिपट गयीं । वे भूल गयीं थी मौर्या कांप्लेक्स में मार्केटिंग करने आयी हैं न कि गप्पें मारने ।

 

        बातों ही बातों में सबीहा ने शवनम से पूछ लिया, तू भी नौकरी करने लगी है । यह सुनकर तो मैं बड़ी हैरत में हूँ। आखिर तेरे शौहर ने इसकी इजाजत कैसे दे दी ?  वे तो बड़े कट्टर मिजाज आदमी ठहरे। जैसे उसे यकीन नहीं हो रहा हो।

 

        उसकी बातें सुनकर शबनम ने एक पल के लिए उसकी आँखों में झाँका, फिर आँखों में उभरती नमी को जबरदस्ती जज्ब करते हुए कहने को विवश हुई, सच्ची बात तो यह है कि सबीहा मैंने उन्हें तलाक दे दिया ।

   

        यह क्या कह रही है तू ? तू होश में तो है न ?” सबीहा जैसे काँप उठी । उसके जिस्म के रोआँ खड़े हो गए । उसने हमदर्दी के नाते एक अनजाने भय से ग्रसित होकर शबनम का हाथ थाम लिया । यकीन से परे थी उसकी बात।

 

        शबनम ने अपने इरादे में मजबूती जाहिर करते हुए आगे बताया, दरअसल मेरे साथ हादसा ही ऐसा हुआ । तुम से क्या छिपाऊँ मैं । जिन दिनों मैं माँ बनने वाली थी, घर के कामकाज के लिए अपनी बहन को बुला लिया था। सब तो ठीक-ठाक ही लग रहा था। मगर जिस दिन मैं हॉस्पीटल से बच्चे के साथ लौटी....

 -यह कहते-कहते वह चुप हुई।

 

        सबीहा के दिल की धड़कन रूक सी गयी । उसे हिम्मत नहीं हो रही थी कि शबनम से आगे के बारे में पूछे। अचानक शबनम ने ही कहा, उसी शाम मेरी बहन मेरे शौहर के सात सूर्ख जोड़े में मेरे ही घर की दहलीज पर खड़ी थी। मैं...किसे...क्या....कहती। कोई....फायदा....नहीं था । वह तो मुझे नहीं छोड़ना चाह रहे थे ....मगर अब इस रिश्ते के मायने ही बदल गए थे, सो मैंने ही उन्हें आजाद कर दिया ।

 

 

सोने के अंडे


        म दोनों ही बरामदे में बैठे चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे। घर-परिवार की बातें हो रही थी। तभी वह गली से गुजरी । उसे देखकर ही रफ़ीक मिया ने अजीब सा मुँह बनाते हुए कहा, इस लड़की को देखता हूँ तो बड़ा रहम आता है। आप जानते हैं कि नहीं अमन साहब । इनके शौहर हमारे अच्छे दोस्त थे। बेचारे का धोखे से कत्ल हो गया ।

 

        हाँ । सुना तो है। अब क्या किया जाय । यही तो दुनिया है, जो होना था सो हुआ । वह तो चले गए और पीछे छोड़ गए एक बीवी और पेट में बच्चा । यह कहते हुए अमन ने अपने भीतर कुछ खौलता सा महसूस किया।

 

        मैं तो यही कहूँगा कि इस बेचारी की उम्र ही क्या है अभी ?  इसकी घर वालों को शादी कर देनी चाहिए । यही बेहतर होगा। फिर नौकरी करती रहती । आफिसों का माहौल तो आप भी देख ही रहे हैं ?”

 

        लेकिन मुझे तो ऐसा लगता है कि इनके घरवाले इस मुद्दे पर कुछ सोचना ही नहीं चाहते । माँ तो जिंदा है मगर पता नहीं कैसी बेरहम औरत है, जो चुप्पी साधे बैठी है। सच तो यह है कि सोने के अंडे देने वाली इस मुर्गी को घर वाले किसी और के हाथों सौंपना ही नहीं चाहते।

 

        वाह क्या बात कही है आपने अमन साहब । बिल्कुल यही बात है। रफ़ीक मियां ने सहमति जतायी और अफसोस प्रकट करते हुए उठ खड़े हुए ।

 

अपनेअपने स्वार्थ


        दिन के आठ बज चुके थे और जमात दूसरे शहर जाने के लिए तैयार थी। मस्जिद में बैठे लोग आपस में कुछ मशविरा कर रहे थे ।

 

        अचानक एक नौजवान कुछ पैकेट लेकर हाजिर हुआ। सबके हाथों में एक-एक दे दिया गया । मेरी समझ में कुछ आया । इससे पहले अमीर-ए-जमात ने हँसते हुए बताया, आप लोगों को पता नहीं क्या ? कल असगर साहब की बेटी का रिश्ता शमशाद माहब के बेटे से पक्का हो गया । कल ही उन दोनों का निकाह था न । रस्म की यह मिठाई है। आप सभी भी नाश्ता कर लें । फिर यहाँ से निकलते हैं।

 

        यह जानकर मेरा चौंकना स्वाभाविक था। मैंने पास बैठे एक साहब से जानना चाहा, करीम साहब । इन दो खानदानों के बीच रिश्ता कैसे पक्का हो गया। असगर साहब तो जात के सैयद हैं और शमशाद साहब अंसारी ?”

 

        तब कैसे हो सकता है ? आपको कॉलोनी में रहते हुए अभी हुए भी कितने दिन हैं ? मैं बताता हूँ आपको । यह दोनों ही सैयद ही हैं ।

 

        यह कैसे हो सकता है ? शमशाद साहब तो अपने नाम के साथ भी अंसारी लिखते हैं ? फिर वे सैयद कैसे हो सकते हैं ?”

 

        बिल्कुल हो सकते हैं, चूंकि आपको मालूम नहीं है। शमशाद साहब को सैयद जात के कारण नौकरी मिलने में कठिनाई हो रही थी, इसलिए उन्होंने न केवल अपने नाम के साथ अंसारी लिखना शुरू किया बल्कि अत्यन्त पिछड़ी जाति का प्रमाण-पत्र बनवा कर नौकरी भी हासिल कर ली । वही है असलियत, समझे आप ।

 

खास लोग


        फजल मियां कोई खानदानी अमीर आदमी तो नहीं थे। किसी सरकारी दफ़्तर में मुलाजिम  थे, किन्तु उनके बच्चे अच्छी नौकरियों मे आ गये थे, इसलिए बेटी की शादी में जमकर खर्च कर रहे थे ।

 

        मस्जिद से निकलकर उन्हीं के दावत में शरीक होने के लिए कुछ बड़े-बुजुर्ग चले तो एक ने कहा,- यह क्या तमाशा है। न जाने अपने कॉलोनी के आसपास ही कितने मुस्लिमों के घर होंगे, जहाँ एक वक्त का अनाज मुश्किल से बनता होगा। यहाँ देखिये। कितना बड़ा पंडाल लगाया गया है और घर की कितने सलीके से सजावट की गई है। किसी भी तरह पच्चास-साठ हजार से थोड़े ही कम खर्च हुआ होगा ? इनको तो चाहिए था कि सबको दस्तरख्वान पर खाना खिलायें । सुन्नत तरीका तो यही है जिसे पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहब ने हमेशा अपनी जिन्दगी में तरजीह दी।

 

        इस जमाने में पैगम्बर साहब के सुन्नत की किसको फिक्र है। सबके सब मर मिटे हैं दिखावे पर । मगर यह तो बैकवर्ड जात के हैं । इनको यह सच करने की क्या, जरूरत है ?”

 

        कुछ अर्से बाद ही चीफ इंजीनियर साहब की बेटी की शादी तय हुई । ये लोग भी शामिल हुए तो देखा कि यहाँ बैठकर खाने के बजाये करीम साहब ने खड़े-खड़े प्लेट को हाथ में लेकर खाने का इंतजाम किया थे।

 

        जिसके बारे में उनका ही कहना था, कमाल कर दिया करीम साहब। इतना शानदार इंतजाम । आपने खानदान की लाज रख ली। आपको मुबारक हो यह शाम । क्योंकि करीम साहब सैयद जात के थे।

 

 

 

लघुकथा

प्रकृति ईश्वर की कला है - दाँते

आपकी प्रतिक्रिया

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, संजीव ठाकुर

तकनीकः प्रशांत रथ

Google
WWW http://www.srijangatha.com