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ब्रिटेन की हिंदी कहानी का साहित्य में क्या स्थान है? -राजम नटराजन पिल्लै


     (नैना शर्मा की रिपोर्ट)

 

लंदन । ब्रिटेन ।। अहम सवाल ये उठता है, जिसका जवाब हर हिन्दी प्रेमी, हिन्दी रचनाकार, हिन्दी अध्यापक, हिन्दी समीक्षक और हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों को देना होगा, कि इन (ब्रिटेन के) रचनाकारों को हिन्दी साहित्य के इतिहास के ग्रन्थों में किस अध्याय में स्थान दिया गया है?” यह प्रश्न उठाया मुंबई से लंदन पधारीं प्रोफ़ेसर राजम नटराजन पिल्लै ने। अवसर था कथा यू.के. द्वारा लंदन के साउथहॉल क्षेत्र में विश्व हिन्दु केन्द्र में आयोजित कथा गोष्ठी का।

 

        इस गोष्ठी में डा. गौतम सचदेव एवं दिव्या माथुर ने अपनी अपनी कहानियों का पाठ किया। कार्यक्रम के अध्यक्ष थे भारतीय उच्चायोग में हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी श्री राकेश दुबे। कार्यक्रम की शुरूआत में कथा यू.के. संस्था के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने सभी उपस्थित महमानों का स्वागत किया और कथा यू.के. की गतिविधियों से परिचय करवाया।

       

        डा. पिल्लै ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, भारत भूमि से बाहर, विशेषकर इंग्लैण्ड में लिखी गई इन कहानियों को पढ़ते हुए कुछ ऐसा अहसास होता है मानो किसी प्रिज़म पर सूरज की रोशनी पड़ी हो और सात रंगों की पट्टीयां फैल गई हों। चटकीला नारंगी, उदास बैंगनी, शांत नीला, उग्र लाल, ठंडा ठंडा हरा, सब कुछ। नई कहानी का युग समाप्त हो गया, समकालीन कहानी का अंतहीन युग चल रहा है, लेकिन पिछले कम से कम दो-तीन दशकों से रचनाक्रम में रत इन लेखकों की रचनाएं क्या भारत में भी आप्रवासी रहेंगी?” राजम जी ने अपने लेख में उषा राजे सक्सेना, शैल अग्रवाल, गौतम सचदेव, महेन्द्र दवेसर, उषा वर्मा, कादम्बरी मेहरा, एवं तेजेन्द्र शर्मा की कहानियों की विवेचना की।

 

        बर्लिन से लंदन पधारीं सुशीला शर्मा हक़ ने चिन्ता जताई कि विदेशों में हिन्दी पढ़ाने के लिये ऐसे विदेशी शिक्षकों की नियुक्ति कर दी जाती है जिनका अपना हिन्दी का उच्चारण सही नहीं होता। जिस व्यक्ति को स्वयं और के उच्चारण का अंतर नहीं मालूम है, वह भला सही भाषा कैसे सिखा पायेगा? सुशीला जी ने नियुक्तियों में रंगभेद नीति का पर भी तीखी टिप्पणी की।गौतम सचदेव ने अपनी कहानी खंडहर, और वह स्टुपिड का रोचक पाठ किया तो वहीं दिव्या माथुर की संवादात्मक कहानी तुम नहीं सुधरोगी... के पाठ में फ़िल्म पत्रकार एवं संपादक ललित मोहन जोशी ने उनका साथ दिया। दोनों कहानियों की विषय, भाषा एवं अदायगी के लिये खासी तारीफ़ की गई।

(बैठे हुए -बाएं से दाएं-ज़किया ज़ुबैरी, दिव्या माथुर, सुशीला शर्मा, डा. राजम नटराजन पिल्लै, डा. गौतम सचदेव, उषा राजे सक्सेना। खड़े हुए- बदी-उ-ज़मां, शमील चौहान,ललित मोहन जोशी, अमर उप्पल, राकेश दुबे, तोषीअमृता, के.बी.एल.सक्सेना। )

 

कार्यक्रम की विशेष उपलब्धि रही कार्यक्रम के मेज़बान श्री सुदर्शन भाटिया की कहानी ड्रेस कोड । भाटिया जी का कहानीकार रूप देख कर सभी चकित रह गये। काउंसलर ज़किया ज़ुबैरी ने कथा गोष्टी के स्वरूप एवं कहानियों के स्तर की खुले दिल से प्रशंसा की। उन्हें कार्यक्रम में उर्दू एवं पंजाबी साहित्यकारों की सहभागिता ने विशेष रूप से प्रभावित किया।

 

        अध्यक्ष पद से बोलते हुए भारतीय उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी श्री राकेश दुबे ने कहा, हि‍न्‍दी कहानी के लि‍ए ब्रि‍टेन में कथा यू. के. द्वारा चलाए जा रहे आन्‍दोलन की सफलता के लिए मेरी शुभ कामनाएं। पि‍छले कुछ समय से कथा यू. के. द्वारा आयोजि‍त कथा-गोष्‍ठि‍यों में जो अन्‍तराल आया उसके बाद आज की गोष्‍ठी के सफल आयोजन के लि‍ए आपको बधाई । आज की गोष्‍ठी में पढ़ी गई कहानि‍यों से यह तो नि‍श्‍चि‍त हो गया है कि‍ स्‍थानीय समाज और जीवन उनमें वि‍षय-वस्‍तु के रुप में मौजूद है और अच्‍छे ढंग से मौजूद है । यह स्‍वागत योग्‍य है । जहां तक भाषा का प्रश्‍न है, तो मेरा मानना है कि‍ स्‍थानि‍कता का पुट देने के लि‍ए अंग्रेज़ी के शब्‍दों का प्रयोग तो होगा ही लेकि‍न भारतीय भाषाओं में से केवल उर्दू से ही शब्‍द लेते जाने से बात नहीं बनेग हमें गुजराती, मराठी, पंजाबी, तेलुगू, नैपाली और बांगला जैसी भाषाओं से भी शब्‍द लेने होंगे तभी सही अर्थों में भाषायी समन्‍वय की बात की जा सकती है ।

 

        कार्यक्रम में अन्य लोगों के अतिरिक्त श्री बदी-उ-ज़मां, गुरपाल सिंह, अमर उप्पल, उषा राजे सक्सेना, वेद मोहला, शमील चौहान (ग़ज़ल गायक), अरुण ठाकुर, तोषी अमृता, श्री के.बी.एल. सक्सेना, श्रीमती भाटिया, दीदी विश्व भारती, दामिनी शाह, आदि उपस्थित थे।

 

 

 

 

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