आईना
सुभाष चंदर
आज
फिर वैसा ही हुआ
। बच्चों के सो जाने के बाद उसने उसे बिस्तर पर
बुलाया । पर वह पहले की तरह आज भी बहाना बना गयी,
नहीं उठी,
“मैं
देख रहा हूँ। तुममें ठंडापन बढ़ता ही जा रहा है। इलाज कराने को
कहता हूँ, तो बिदकती हो। जानती हो, आज हमें हम-बिस्तर हुए पूरे बीस
दिन हो गये हैं।”
उसे मुस्कराते देखकर वह और भड़क गया । फिर
टेलीफोन की ओर बढ़ते हुए
बोला “तुम
क्या समझती हो, मुझ में कोई कमी है, मैं अभी मिसेज वर्मा का नम्बर
डायल करता हूँ । वह वैसे भी काफी दिनों से मेरे पीछे पड़ी है।”
कहकर उसने उसकी ओर देखा । किन्तु कटकर रह गया, क्योंकि वह दूसरी
औरत के नाम पर तड़प उठने की जगह व्यंग्य से मुस्करा रही थी। उस का
मन और कड़वा हो गया । वह बिफर उठा,
“देखना,
तुम्हारा यह ठंडापन तुम्हें और
मुझे ले डूबेगा”
कहकर वह फोन के नम्बर घुमाने लगा।
तभी वह फोन के पास गई। उसके हाथ से रिसीवर लेकर रख दिया । फिर
रहस्यमयी मुस्कराहट के साथ बोली,
“अच्छा
है कि मुझमें यह ठंडापन है। वरना तुम्हारी जगह मैं होती और टेलीफोन
पर मिसेज वर्मा की जगह, मेरे बॉस या कलीग का नम्बर । फिर गहरी सांस
लेकर बोली, “ठंडापन
ही इस घर को बचा रहा है। क्योंकि तुम तो तृप्त होने के बाद आराम से
मुँह फेरकर सो जाते हो और मैं रात भर अतृप्ति की आग में....। अपने
शरीर की माँग को मैं इस ठंडेपन के आवरण में ही छिपाती हूँ। अपने आप
से पूछकर देखो कि इस घर को यह ठंड़ापन कितना बचा रहा है। कहकर वह
बच्चों के कमरे में सोने के लिए चल दी।
वह हतप्रभ सा खड़ा, आइने में खुद को गौर से देखने लगा।

बर्दाश्त की हद
कमल चोपड़ा
वह
अक्सर चोटें खाकर मेरे क्लीनिक में आती । चोटें लगने का कारण भी हर
बार एक ही होता। फिर भी पूछने पर रोते-सिसकते हुए वह बताती कि इसके
तो भाग ही फूटे हुए हैं । उसका पति शराबी और जुआरी है। कैसे-कैसे
मेहनत कर-करके वह पाई-पाई जोड़ती है और वह छीन ले जाता है। जुए में
हार जाता है
और सारी खीझ उस पर निकाल देता है। शराब पीकर कभी किसी नाले में जा गिरता है कभी किसी नाली में कोई पहुँचा आता है।
ज़िंदगी नरक बना रखी है । कभी-कभी किसी दिन कोई बड़ा हादसा हो गया
तो ?
वो उसका पति है। इसलिए बर्दाश्त करने के सिवाय वह कर क्या सकती है
?
पाँच दस दिन भी नहीं बीतते कि वह अपने पति से पिटकर अपने
ज़ख़्मों का इलाज करवाने चली आती । एक ज़ख़्मी ठीक होता तो दूसरा शुरू
हो जाता । बर्दाश्त की भी हद होती है लेकिन ...।
लेकिन आज खुद नहीं बल्कि अपने पति को जख्न्मी हालत में लेकर
आई थी। मैंने सोचा, कहीं किसी से झगड़ा किया होगा या शराब पीकर गिर
पड़ा होगा । वह काफी घबराई हुई सी थी
–
“डाक्टर
साब, उन्हें कैसे भी बचा लीजिए । चाहे जितना भी खर्च हो जाए...मैं
आपके हाथ जोड़ती हूँ...’
उसके खतरे से बाहर होने की
तसल्ली मिलते ही उसकी जैसे जान
में जान आया। थोड़ी देर बाद मैंने कहा-
"काफी
बुरी तरह मारा है किसी मे
इन्हें । रिपोर्ट कर दें.... तुम उनसे कम
से कम इलाज का
खर्चा तो ले ही सकती हो जिन्होंने इन्हें पीटा है...।"
‘खर्चा
किससे लेना है...मैने खुद ही तो पीटा है इसे ...।’
हैरान था मैं... आज इसकी बर्दाश्त की ताकत कहाँ गई
?
पूछा-
"हाँ हद कर दी आज इसने तो...मेरी बेटा जो दस-ग्यारह साल की है एक घर
में बर्तन माँजने जाती है। आज ये उसी
Iर में चला गया और उसकी
मालकिन से उसकी महीने भर की तनख्वाह ले आया और उडा गया....अब आप ही
बताओ मेरी कमाई शराब-कबाब में उडा दे तो फिर भी चलो कोई बात नहीं।
...बेटी की कमाई की शराब-वराब पीएगा तो आप ही बताओ क्या सीध नरक
में नहीं जाएगा ?..."
हैरान था मैं....इसे इधर के
अपने नरक की नहीं बल्कि मरने के
बाद भी पति के नरक की चिन्ता है।

जिंदा लोग
डॉ. सतीशराज पुष्करणा
“पापा
!
नगर के प्रायः हर चौराहे पर किसी-न-किसी नेता की मूर्त्ति
स्थापित कर दी गयी है। उन मूर्त्तियों से क्या लाभ है
?”
किशोरावस्था को स्पर्श करते हुए पुत्र ने पूछा।
“ताकि
लोग इन नेताओं एवं उनके कार्यों को याद रख करें...दरअसल उनकी
सेवाओं के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है।”
पापा ने सहज ढंग से समझाते हुए कहा ।
“ठीक
है !
तो आज जो नेता
हैं...कल जब ये मर जाएँगे तो इनकी मूर्त्तियाँ कहाँ लगेंगी
?”
बेटे ने बड़ी मासूमियत से जिज्ञासा व्यक्त की।
“पार्कों
में लगेंगी ।”
बेटा फिर प्रश्न न करे...पापा ने स्वतः ही सम्भावित प्रश्न का
उत्तर देते हुए पुनः कहना आरंभ किया,
“पार्कों
में भी जब जगह नहीं रहेगी, तो नए पार्क बनाए जाएंगे...उनमें लगेंगी
।”
फिर और आगे आने वाले नेताओं की मूर्तिया भी इसी तरह लगती ही
जाएँगी, तो पूरा नगर क्या, देश श्मशान-भूमि नहीं बन जाएगा... फिर
आदमी कहाँ रहेंगे ?”
पापा खीज गए और बोले, “तो
क्या अभी देश शमशान नहीं सलता है
?....सिर्फ
इतना है....ये लोग, जो चलते-फिरते दिखायी देते हैं...... वस्तुतः
चलती फिरती लाशें हैं।”
“तो
फिर जिंदा कौन लोग होते हैं
?”
अब तक पिता आक्रोश में भर चुके थे,
“जिंदा
वे लोग होते हैं, जो सही-गलत का फर्क जानते हैं ....और गलत का
विरोध बिना किसी चिंता के करते हैं....डर उनके पास तक नहीं फटकता
है....वे लोग देश के लिए, मरते हैं, और लोगों के दिनों में .....
इतिहास के पन्नों में सदैव के लिए
जिंदा रहते हैं ।”
बेटा सन्तुष्ट हो गया... “हमारी
पीढ़ी नपुंसक नहीं होगी ।

सात फेरों का सच
डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी
“चाहे
कुछ हो जाये, अब मैं
बर्दाश्त करने वाली नहीं”
“अब
कौन से पहाड़ टूट पड़े
जो बकवास कर रही है....”पति
गिरीश ने आक्रोश भरे स्वर में राधिका से कहा,
“बस
इतना ही कहूँगी कि घर में भी मैं बेघर रही । जैसे मुझे सताया गया,
वैसे तो अनपढ़ और घरेलू औरतों को भी नहीं सताया जाता, क्योंकि हम
दोनों के बीच में तीसरी औरत की एक दीवार भी तो है...इसलिए मैं
आपको कभी फूटी आँखों न सूहाई....”
और राधिका साड़ी के पल्लू से अपनी आँखें पोंछने लगी।
“सब
झूठ, तुम पवित्र रिश्ते को बदनाम करना चाहती हो...”
“अगर
रिश्ता पवित्र है तो सुसर जी ने उस रिश्ते को तोड़ने को फर्माइश
क्यों की थी ?”
“बुढ़े
का दिमाग खराब था,,,”
“मगर
पड़ोसी और आप के रिश्तेदार भी तो वही बात कहते हैं
?”
“कहने
दो”
“हाँ-हाँ,
दुनिया छूट जाये मगर वे न छुटेंगी । यह भी सच है कि सगे रिश्तों
में तो पवित्रता संभव है मगर मुँह बोले रिश्तों में उसका निर्वाह
करना कलजुग में कठिन है....”
“बकवास
न करो..”
“क्यूँ
?”
आप सात फेरों के सच को झुठलाते रहे और मैं पत्थर बन सब सहती जाऊँ
?....”
“नहीं
मालूम मुझे सातफेरों का सच....”
“तो
मुझसे सुनिये सच !
युगों-युगों का सच हैं, आपने मुझसे कदम-कदम पर छुपाव किया, गैर
औरत के इशारों पर नाचे, कभी अपनी कमाई न दी, हमेशा दो शरीर और दो
आत्मा बन कर रहे, बालबच्चों के जन्म के बाद आप मेरे लिए एकदम
नपुंसक बन गये, दो पैसे की कभी चीज मंगाई तो आपने मुझसे फोरन वसूली
की, मेरे कमाये गये पैसे को लेना धर्म और मुझे अपना पैसा देना
अधर्म समझा....यहाँ तक कि सोमवार के सोमवार के
व्रत में फल भी अपने ही पैसे को लेना धर्म और मुझे अपना पैसा देना
अधर्म समझा...यहाँ तक
कि सोमवार के
व्रत में फल भी अपने ही पैसे के खाती हूँ, कभी आपके
स्कूटर पर बैठी, तो पेट्रोल के पैसे फोरन वसूल लिये । क्या यही है
सात फेरों का सच”
और ड़बड़बाई आँखों से राधिका रिक्शा लेने को चली । गिरीश ने राधिका
को कलाई से पकड़ते हुए कहा.....
“तुम
हमारी चीज हो नहीं जाने दूंगा । तुम्हारे न होने की कल्पना से हिल
जाता हूँ, मैं अपनी भूल मानता हूँ । माफ कर दो मुझे..... मेरी अच्छी
राधिका ।”

दहलीज
आनन्द बिल्थरे
मेरी लाख कोशिशों के बावजूद सुगंधा के पिता ने, उसका हाथ,
मेरे हाथों में नहीं दिया ।
समय गुजरता गया । मैं राजनगर में जाकर रहने लगा। एक दिन,
होटल के बंद खामोश कमरे में सुगंधा मेरी गोद में आ गिरी ।
मैं सोचने लगा, अतीत में गुम राहें, कैसे एकाएक वर्तमान की बाहों
में आकर गुंथ जाती हैं। जाने किस नियति के जोर से ।
तब, सुगंधा एक लड़की थी। हो सकता है उस वक्त उसके और उसके
पिता की आँखों में कोई राजकुमार का सपना, झिलमिला रहा हो।
आज वह एक औरत है, टूटे ख्वाब की किरचों पर नंगे पाँव चलने
वाली एक लहूलुहान अधूरी औरत।
सुगंधा उसी तरह उसी तरह पलंग पर चुपचाप बैठी थी । मैंने
बिस्तर पर पड़ी फुलदार चादर उठायी और उसे, उसके सिर पर डाल दिया ।
फिर धीरे से, चादर का सिरा उठाकर, उसके लाजवंती ओठों पर अपने
निश्चय की मुहर लगा दी।
एक लड़की का कालगर्ल से घर की दहलीज़ में वापस लौटने की
सुगंध उसके शरीर से फुट पड़ रही थी।