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चट्टान पर चीड़
लीलाधर जगूड़ी
पानी पीटता रहा, हवा तराशती रही
चट्टान को
दरारों के भीतर गूँजती हवा कुछ धूल
छोड़ आती रही हर बार
कुछ धूप कुछ नमी कुछ घास बन कर उग आती
रही धूल
धूल में उड़ते हैं पृथ्वी के बीज
छेद में पड़े बीज ने भी सपना देखा

मातृभूमि में एक दरार ही उसके काम आई
चट्टान को माँ के स्तन की तरह चुसते
हुए बाहर की पृथ्वी को झाँका
हठी और जिद्दी वह आखिर चीड़ का पेड़
निकला
जो अकेला ही चट्टान पर जंगल की तरह छा
गया
उस चीड़ और चट्टान को हिलोरने
चला आ रही है नटों की तरह नाचती हवा
कारीगरों की तरह पसीना बहाती धूप
चट्टान और पेड़ को भिगोने
आँधी में दौड़ती आ रही है बारिश ।

कैसा यह वक्त है
जया जादवानी
कैसा
यह वक्त है
सारे
राग थककर चुप बैठे हैं
घुटने मोड़े अवसाद से
सिर्फ़ कभी-कभी अंतरिक्ष में गुमी धुन कोई
खो जाती ज़रा-सी झलक दिखा
इन सन्नाटों के धागों को बुनने के लिए
इक सुई तक नहीं मेरे पास
धागा लपेटने से नहीं ढँकता नंगा बदन
बर्फ से काँप रही हूँ लगातार
ख़ुदाया!
एकांत का दुशाला ही बुन दे
कोई इक हाथ
यह माटी का बदन
गर्म होना चाहता है
ढहने से पहले ।

बिंदु पर आदमी
दीनू कश्यप
जहाँ से शुरू हुआ जंगल
वहाँ खड़ा था आदमी
जहाँ ख़त्म हुआ जंगल
वहाँ भी मौजूद पाया गया आदमी
कहाँ रहें अब
शेर, हिरण, बाघ, खरगोश

बाज, कबूतर का स्थान कहाँ
भय की सरसराहट
जो तैर रही है
वैज्ञानिकों के शीशे में
उसके हर बिंदु पर
खड़ा है आदमी
आदमी ही तय करेगा अब
आदमी का होना आदमी
होना
इस पृथ्वी पर
जीवन का ।

कहा तो कभी यह भी
नहीं
परमजीत कौर
मैंने कब कहा
आसमान में खिला कोई इन्द्रधनुष
मेरे नाम कर दो
या फिर कहीं से ले आओ
बसंत का मौसम
मेरे लिए
कब कहा
मेरे पैरों के नीचे हो
कोई आकाशगंगा
या हो कोई कल्पवृक्ष

मेरे आँगन में
कभी कहा
नदी में पाँव में पहना दो बेडियाँ
या पहाड़ को
बौना कर दो
कहा तो कभी यह भी नहीं
जबकि चाहा सिर्फ यही था
कि हो बित्ता भर जमीं
तुम्हारी आँखों के रंग जैसी
कोहेनूर तुम्हारी हँसी जैसा
और संजीवनी
तुम्हारे शब्दों जैसी ।

उपले
सुरेश सेन 'निशांत'
फटती हुई पौ में
पाथती हुई उपले
वह औरत
पाथती हुई

अपने सुख और दुख
गर्मी और सर्दी से
भीगे हुए जुझारू दिन
उपलों पे भरी हुई हैं
पीड़ा भरी हथेलियाँ
हाथ की रेखाएँ ।

नमक
ओमप्रकाश तिवारी
चीटियाँ नहीं बैठती नमक पर
नहीं होता नमक का शोषण
हवा लगने-भर से नमक पसीज जाता है
पर नहीं ख़त्म होता उसका खारापन
नमक-जैसा गल जाने पर भी

नमक बनाए रखता है अपनी पहचान
नमकहरामों, नमकहलालों में
पृथ्वी के तीन-चौथाई भाग पर फैले
इफ़रात
नमक की क़ीमत जानते हैं
इसे अदा करने वाले!
पीढ़ियाँ तक निभाती हैं चुटकी-भर नमक
का मोल
कि गल जाएँ पुरखों की हड्डियाँ
हो न जाए ऊसर बच्चों का भविष्य
नमक की अति से भी डरते हैं
पर नमक नहीं डरता
कि मिठास की तरह उसे चुरा लेगा कोई ।

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