उस
दिन हमारी पड़ोसिन ने टोकरी भर दाने भेज दिए पद्मबीजों
के। टोकरी सहित । वे खुद उसने नहीं मँगाये थे। उन्हें
किसी और ने गाँव से लाकर दिये थे। पत्नी ने कमलगट्टे
देखकर मूँह फेर लिया
–
हाँ, तरकारी अच्छी लगती है। मैं कुँवारी थी, उन
दिनों कई बार खायी है। मगर कैसे हैं, यह मैं नहीं
जानती ।”
आखिर महाराज (रसोइया) को बड़ी जीजी के घर भेजना
पड़ा । वह मुझसे दस
बरस बड़ी है। सत्तर से भी ज़्यादा
की होगी। रसोई-वग़ैरह में खूब नाम है जीजी का । मगर वे
कमलगट्टे का पकाना भूल गई थीं । उन्होंने भेजा एक और
के पर-बड़ी जिठानी सावित्रीदेवी के यहाँ। वहाँ महाराज
जो कुछ पूछकर आया उसी मुताबिक मसाला पीसा गया, तरकारी
पकायी गई । वैसे तरकारी खूब लज़्ज़तदार बनी । सहज ही
भुलाया नहीं जा सकता ।
रात में खा-पीकर पलंग पर लेट, पेट पर हाथ फेरते समय कई
बातें याद आ गई-गाँव में वह पद्मापीखर । तीनों किनारों
पर कमल ही कमल के फूल । कुँई की लता भरी । सिर्फ़ पूरब
की ओर से किनारा साफ़ रहना बीच तक । वहाँ लोग
नहाना-धोना करते, तिल-तर्पण भी होता । दुपहर में
गाय-बैल, भैंस-बकरी वगै़रह को लाकर पानी में घुसा देते
। कपड़े धोना अनवरत चलता घाट से कुछ हटकर ।
पोखर में मछली से ज़्यादा थी जोंक । एक बार खुदरकुणी
के व्रत (मंगला देवी का व्रत) के समय बीनू जीजी ने
कहा-पद्म लाकर दो
!
मुझे सँपेर वाला वह गीत याद आया
–
“पद्मावती
रानी
कंसर घरनी
लक्ष भार पद्म
दबुरे कन्हाई, पाखुड़ा न थिब मिशा!”
(पद्मावती रानी, (कंस की घरनी/) लक्षभार पद्म/देगा रे
कन्हाई/,पंखुड़ी देना न मिलाय
!)
सारी बहादुरी खुद लेने के लिए बिना किसी को बताए धप्प
पानी में चला गया । दल मे पैर फँस गए, और मेरे होश
गुम !
गुच्छ पद्म तोड़कर गले में डाले रखे
थे, अचानक सारी देह जलन में भर गई । मानो कोई चिनगारी
लगा रहा है। समूची देह कोई जकड़े है। मैं घबराकर चीख़
उठा । हड़बड़ाकर ऊपर उठ आया । देखा तो हाथ-पाँव,
पीठ-छाती सब जगह
पन्द्रह-बीस
जोकें चिपट गई हैं
। मेरा खून चूसने में
लगी हैं । जितना खींचता हूँ, छोड़ती ही नहीं। चमड़ी
छील जाती है। अचेत हो पोखर के किनारे गिर पड़ा । पास
में गाय चराने वाले छोकरे दौड़े आये । चिल्लाने गले ।
गाँव वाले आकर जमा हो गए । वे भी जोंक खींच रहे हैं।
आखिर एक ने कहा,
“जाकर
अंजुरी भर नून ले जाओ ।”
तब तक बापू, माँ सब खबर सुन दौड़े आ चुके थे। वे भी
चीख-पुकार में शामिल हो गए । माँ तो बस-
“क्या
हुआ रे !”
यह क्या रे !”
कहती हाथ-पाँव पटक रही थी । नमक आया, जोंक के मुँह और
पूँछ पर डाला गया । चमड़ी छोड़ मेरी देह पर कुनबुलाने
लगीं । आधा खून मेरा पी गईं इतने में । एकदम सफ़ेद
पड़
गया मैं तो । होश का तो सवाल ही न था। तब बैलगाड़ी में
लादकर अस्पताल ले गए । सेलाइन और कई इंजेक्शन ठोंके गए
। तब दस दिन बाद जाकर कुछ ठीक हुआ । घर लौटा ।
एक बार मामा के यहाँ गया था मैं। साथ थे दोनों भाई ।
वहाँ भी खूब बड़ा एक पोखर है। कमल और कुँई से भरपूर ।
कोई पूजा थी उस दिन । दोनों ममेरी बहनों ने ज़िद कर
ली-हमें कुँई लाकर दो । उनके दोनों भाई घर पर थे नहीं
मैं मना करता तो डरपोक होता। लेकिन पुराना अनुभव भी
भूला न था।
छुटकी, याने परिमसा ने अधिक ज़िद की । नौवीं में पढ़ती
थी। एक-दो बार उसका कहा न किया तो गाल पर चिकोटी डाल
दी थी । मैंने भी उसके आँचल का एक हिस्सा दाँत से काट
लिया था। माँ ने आकर छुड़ाया । उसकी लम्बी वेणी पर
मैंने एक बार कैंची लगा दी। वह नींद में लेटी थी, मगर
मैं पकड़ा गया
। मामी ने जाकर माँ से कह दिया। मामा ने
आकर अच्छी तरह पिटाई कर दी।
हाँ, अब की बार मैं पानी में नहीं उतरा । पोखर के
बाँयी
ओर एक बड़ा आम का पेड़ था। उसकी लम्बी डाल पोखर पर
अन्दर तक झुकी थी। एक लग्गी लेकर डाल पर बैठा फूल
खींचता रहा । आठ-दस फूल खींचने में ही काफ़ी देर हो गई
। तभी देखा, दाहिने हाथ में कुछ काट रहा है। पानी में
कुछ छपाक से गिरा
!
मगर उधर ध्यान दिये बिना फूल खीचने में लगा रहा।
कुछ ही देर में थकावट लगने लगी। एक तरह से ऊँघ-सा गया।
हड़बड़ाकर नीचे उतरने लगा
। तभी मामाजी कहीं से आकर घाट
पर पहुँचे । मुझे पेड़ पर देख चिल्लाये,
“चल
चल, घर चल !
तुझे पेड़ पर चढ़ने को किसने कहा
?
शैतान !
ठहर, जीजी से शिकायत करता हूँ । जमकर पिटाई होनी चाहिए
तेरी ।”
मैंने सुन रखा था कि उस पोखर में दो जने डूबकर मर चुके
हैं । कहते हैं, उनके भूत इस आम पर रहते हैं।
चिलचिलाती दुपहर में या सुनसान साँझ की बेला में कोई
उधर नहीं जाता । आम की बात तो दूर रही।
पेड़ से उतरकर देखा-मेरी बायीं बाँह से जगह-जगह खून
टपक रहा है। हाथ से खूल पोंछ सीधा घर ओर दौड़ा।
परिमला के हाथ में कुँई बढ़ा दिये । हाथ-पाँव धोकर
चारपाई पर बैठ गया । मामी खाना परोस कर बुलाने आयी, तब
तक मैं लेट गया था। हिला-हिलाकर जगाया । मगर मैं
सिर्फ़ गूँ-गाँ कर रहा था। मामी ने उलटा कर मुझे खींचा
। अचानक हाथ से खून बहता देख चौंक उठी। ऊँची आवाज़ देकर
माँ को और दोनों भाइयों को बुलाया । दोलपूनों के दिन
थे । हम सब नहीं थे। बापू न बीनू जीजी कटक में थे। माँ
झपटकर आयी । मुझे देख ऊँची आवाज में
–
‘अब
क्या होगा ?
इसे क्या हो गया
?’
चिल्ला-चिल्ला कर रोने लगी । मँझले मामा दौड़े-दौड़े
जाकर माली साही से केला शेठी को बुला लाये । इस इलाक़े
के नामी-गिरामी ओझा हैं वे । आकर मन्त्र फूँका ।
बार-बार मुझ पर पानी के छींटे दिये । फिर बोले,
“किसी
एक जन्तु ने काट आया है पेड़ पर । वो जी न सकेगा । यह
कोई गिरगिट होगा या कुछ....।”
उस घाव पर पीतल की थालिया (छोटी थाली ) लगाई गई । इतनी
वज़नी थाली नोचे नहीं गिरी । कैसे चिपक गई वहाँ
?
खूब झाड़-फूँक की गई तब कहीं जाकर मुझे होश
आया । ओझा
ने बताया –
“इसे
सोने न देना । कल दिन में इसी समय जहर उतर जाएगा
। इस
बीच सो जायेगा तो कोई बचा न सकेगा। सावधान रहना
!”
दोनों भाई, परिमला तीमारदारी में सजग रहे, ताकि मैं सो
न जाऊँ। माँ ने बताया -
दिन-रात में परिमला का एक बार भी पलक नहीं झपकी । मूरत
बनी बिस्तर के पास काउ-सी स्थित बैठी रही । अगले दिन
बापू और बीनू आ पहुँचे ।
चारपाई पर लेटा
था। कई बातें सिनेमा की रोल की तरह आ रही थीं । कितने दिन से गाँव में माँ है, बीनू जीजी भी
विधवा होकर गाँव में ही माँ के पास है । कुछ दिन
ससुराल में रहकर खेत-बाग का काम देखती है। परिमला के
तीन बच्चे हो गए-और फिर हम सबको छोड़ जा चुकी है, बड़े
मामा आठ वर्ष से इस दुनिया में नहीं ....
सुबह उठकर देखा तो मेरी स्त्री कमलगट्टों के छिलके
उतार एक थाली में रख रही है । मुझे देखकर बोली
–
“कल
तो सड़ जायेंगे । आज ही सबकी तरकारी बना लें । क्या
कहते हो ?”
(
उड़िया से हिंदी रूपांतरः शंकरलाल पुरोहित)