रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001  ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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छंद

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दोहा  गीत ग़ज़ल

माह के छंदकार- लक्ष्मीनारायण शर्मा 'साधक'

 

 

 

 

 

माह के छंदकार

लक्ष्मीनारायण शर्मा 'साधक'

जन्म- 1 मई, 1934 । शिक्षा- एम.ए.(हिंदी, इतिहास), एल.टी.। सेवा-यात्रा- 34 वर्ष तक स्कूल शिक्षा विभाग में अध्यापन कार्य । अब सेवानिवृति और पूर्णकालीन लेखन । प्रकाशन- देश के अनेक लघु पत्र-पत्रिकाओं में गीत, ग़ज़ल, दोहे, कहानी आदि लगातार प्रकाशित । रेडियो साहित्य पत्रिका 'पल्लव' में गीत, कविताएँ प्रसारित । कहानी 'प्रत्यावर्तन' को कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार । कृतियाँ- मंज़िल के आसपास(ग़ज़ल), चिड़िया बैठी नीड़ (दोहा), ग़ज़ल पंचदशी (ग़ज़लें समादृत)

 

संपर्क- न्यू टीचर कॉलोनी, तिल्दा-नेवरा, जिला रायपुर, छत्तीसगढ़, 493114, ई-मेलः sadhakln@rediffmail.com

 

 

 तृष्णा का मेला लगा, यादों की है भीड़ ।

जाने क्या-क्या सोचती, चिड़िया बैठी नीड़ ।।

 

वन पलाश के हैं नहीं, हँसे न टेसू फूल ।

खेत-खेत मुस्का रही, काँटेदार बबूल ।।

 

बहुरंगी सौंदर्य पर, तितली हुई निसार ।

फूल सलौने खिल रहे, छाई हुई बहार ।।

 

तन का रँगना सरल है, मन रँगना दुश्वार ।

रँग कर मन तुमने प्रिये, किया सघन उपकार ।।

 

यादों में माँ रम रही, रही झरोखे झाँक ।

कहती मत कर गल्तियाँ, तेरी लम्बी नाक ।।

 

नैतिकता ओझल हुई, भागे मूल्य-कपोत ।

सीधे भ्रष्ट्राचार से, जुड़े आय के स्त्रोत ।।

 

अब चरित्र की सुक्तियाँ, सजा रही दीवार ।

किंतु आचरण रूप में, देश हुआ बीमार ।।

 

राजनीति कालिज घुसी, प्रोफ़ेसर असहाय ।

मंत्री का निर्देश है, इनको कौन बचाय ।।

 

वही पुरानी नीतियाँ, नहीं रहीं अनुकूल ।

ले आये यूरोप से, चुभने वाले शूल ।।

 

कम्प्यूटर  की धूम है, अद्भूत  है संचार ।

अब तो लघुतम रूप में, सिकुड़ गया संसार ।।

 

माता की सेवा नहीं, नहीं पिता का मान ।

टी.वी.-बीबी में रमा, कुल दीपक का ध्यान ।।

 

घर का बूढ़ा दुखित अति, देख-देख उत्पात ।

नित आँखों से हो रही, बैमौसम बरसात ।।

 

चटनी मिक्सी पीसकर, लीनी ब्रेड मँगाय ।

भोज-मेज पर डिश धरे, मम्मी-पापा खॉय ।।

 

चूल्हे की छुट्टी हुई, जलती है अब गैस ।

दूध मिले ब़ाजार में,  क्यों पालेंगे भैंस ।।

 

मम्मी आई शाम को, ज्यों मुरझाया फूल ।

पापा को फ़ुरसत नहीं, रही निराशा झूल ।।

 

खिड़की से हँसने लगे, कुछ कागज़ के फूल ।

सरसों बोली खेत से, थोथी शान फ़िजूल ।।

 

उथले पानी में कभी, मिलते नहीं प्रबाल ।

गहरे पानी पैठ तू, होगा तभी निहाल ।।

 

मंदिर गूँजीं घंटियाँ, मस्जिद उठी अजान ।

दोनों ही छल कर रहे, इज्जत रख भगवान ।।

 

सागर में लहरें उठीं, पूनम आया ज्वार ।

अन्दर भी तूफ़ान है, पर मत हिम्मत हार ।।

 

उनके दुख वर्णन करो, रहते जो अधपेट ।

मजबूरी में दे रहे, अपने श्रम की भेंट ।।

 

लिखो वसीयत इस तरह, मोह न पकड़े हाथ ।

दोष न कोई मढ़ सके, पुण्य न छोड़े साथ ।।

 

स्वयं स्वच्छ पहले बनो, बदलो फिर परिवेश ।

उपदेशों से कभी भी, सुधरा नहीं स्वदेश ।।

 

दोहे का वैशिष्ट है, घट में सिन्धु समाय ।

पाठक गहरे भाव में, डूबे मुग्ध नहाय ।।

 

 

छंद

मधुर वचन है औषधि, कटुक वचन है तीर। श्रवणद्वार ह्वै संचरै, सालै सकल शरीर।। -कबीर

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