
माह के छंदकार
लक्ष्मीनारायण शर्मा
'साधक'
जन्म- 1 मई, 1934 । शिक्षा- एम.ए.(हिंदी, इतिहास),
एल.टी.। सेवा-यात्रा- 34 वर्ष तक स्कूल शिक्षा विभाग में
अध्यापन कार्य । अब सेवानिवृति और पूर्णकालीन लेखन । प्रकाशन-
देश के अनेक लघु पत्र-पत्रिकाओं में गीत, ग़ज़ल, दोहे, कहानी आदि
लगातार प्रकाशित । रेडियो साहित्य पत्रिका 'पल्लव'
में गीत, कविताएँ प्रसारित । कहानी 'प्रत्यावर्तन'
को कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार । कृतियाँ- मंज़िल
के आसपास(ग़ज़ल), चिड़िया बैठी नीड़ (दोहा), ग़ज़ल पंचदशी (ग़ज़लें
समादृत)
संपर्क- न्यू टीचर कॉलोनी, तिल्दा-नेवरा, जिला रायपुर, छत्तीसगढ़,
493114, ई-मेलः sadhakln@rediffmail.com

तृष्णा
का मेला लगा, यादों की है भीड़ ।
जाने
क्या-क्या सोचती, चिड़िया बैठी नीड़ ।।
वन पलाश के हैं नहीं, हँसे न टेसू
फूल ।
खेत-खेत मुस्का रही, काँटेदार
बबूल ।।
बहुरंगी सौंदर्य पर, तितली हुई
निसार ।
फूल सलौने खिल रहे, छाई हुई बहार
।।
तन का रँगना सरल है, मन रँगना
दुश्वार ।
रँग कर मन तुमने प्रिये, किया सघन
उपकार ।।
यादों में माँ रम रही, रही झरोखे
झाँक ।
कहती मत कर गल्तियाँ, तेरी लम्बी
नाक ।।
नैतिकता ओझल हुई, भागे मूल्य-कपोत
।
सीधे भ्रष्ट्राचार से, जुड़े आय
के स्त्रोत ।।
अब चरित्र की सुक्तियाँ, सजा रही
दीवार ।
किंतु आचरण रूप में, देश हुआ
बीमार ।।
राजनीति कालिज घुसी, प्रोफ़ेसर
असहाय ।
मंत्री का निर्देश है, इनको कौन
बचाय ।।
वही पुरानी नीतियाँ, नहीं रहीं
अनुकूल ।
ले आये यूरोप से, चुभने वाले शूल
।।
कम्प्यूटर की धूम है,
अद्भूत है संचार ।
अब तो लघुतम रूप में, सिकुड़ गया
संसार ।।
माता की सेवा नहीं, नहीं पिता का
मान ।
टी.वी.-बीबी में रमा, कुल दीपक का
ध्यान ।।
घर का बूढ़ा दुखित अति, देख-देख
उत्पात ।
नित आँखों से हो रही, बैमौसम
बरसात ।।
चटनी मिक्सी पीसकर, लीनी ब्रेड
मँगाय ।
भोज-मेज पर डिश धरे, मम्मी-पापा
खॉय ।।
चूल्हे की छुट्टी हुई, जलती है अब
गैस ।
दूध मिले ब़ाजार में, क्यों
पालेंगे भैंस ।।
मम्मी आई शाम को, ज्यों मुरझाया
फूल ।
पापा को फ़ुरसत नहीं, रही निराशा
झूल ।।
खिड़की से हँसने लगे, कुछ कागज़
के फूल ।
सरसों बोली खेत से, थोथी शान
फ़िजूल ।।
उथले पानी में कभी, मिलते नहीं
प्रबाल ।
गहरे पानी पैठ तू, होगा तभी निहाल
।।
मंदिर गूँजीं घंटियाँ, मस्जिद उठी
अजान ।
दोनों ही छल कर रहे, इज्जत रख
भगवान ।।
सागर में लहरें उठीं, पूनम आया
ज्वार ।
अन्दर भी तूफ़ान है, पर मत हिम्मत
हार ।।
उनके दुख वर्णन करो, रहते जो
अधपेट ।
मजबूरी में दे रहे, अपने श्रम की
भेंट ।।
लिखो वसीयत इस तरह, मोह न पकड़े
हाथ ।
दोष न कोई मढ़ सके, पुण्य न छोड़े
साथ ।।
स्वयं स्वच्छ पहले बनो, बदलो फिर
परिवेश ।
उपदेशों से कभी भी, सुधरा नहीं
स्वदेश ।।
दोहे का वैशिष्ट है, घट में
सिन्धु समाय ।
पाठक गहरे भाव में, डूबे मुग्ध
नहाय ।।