
सुधियों के द्वार
मैं
सुधियों के द्वार खोल दूँ
तुम
अतीत की छवि निहार लो ।
अनगिनत अनजाने चित्रों की,
रचना सपनों में हो जाती ।
किन्तु चितेरे के दर्शन को,
अखियाँ प्यासी ही रह जातीं।
मैं सपनों में चित्र संवारूँ,
तुम जागृत की छवि निहार लो।।
मैंने काँटों के अधर चूम,
फूलों की मुस्कान निहारी ।
पतझर
में आँचल में उलझे,
मधुऋतु की है बाट निहारी ।
मैं
करील की डाल निहारूँ,
तुम
उपवन की छवि निहार लो।।
रूप भरे जग के उपवन में,
चितवन की मादक छलना है ।
जीवन की अनजान डगर पर,
राही को चलते रहना है ।
मैं चरणों की गति निहार लूँ,
तुम मंज़िल की छवि निहार लो।।
भरता
जाता तम अन्तर में,
दुसह
वेदना प्रतिपल छलती ।
किन्तु नयन की ओट में प्रतिपल,
आशा
की मृदु किरण विहंसती ।
मैं
आरती का थाल संवारूँ,
तुम
पूजा की छवि निहार लो।।
मैं सुधियों के द्वार खोल दूँ,
तुम अतीत की छवि निहार लो ।।
डॉ. हरिवंश प्रसाद शुक्ल
‘मधुकर’

आलिंगन-स्मृति
दीपक
की अलसी आँखों ने, इस उर में चुटकी ले सी दी।
मैं
सिहर उठी अँगड़ाई ली, धड़कन ने उनसे कह सी दी ।।
मधुरिम धूमिल अलसाई सी,
थी
रात लगी सरसाई सी ;
पुरवाई-ननद लगि सोई सी,
इस
तन ने सुधि बिसराई सी ;
अलकों ने अस्त-व्यस्त होकर, प्राणों की बीन बजा सी दी।
इन
नयनों ने, मधु-अधरों ने, फिर प्रेम अबीर उड़ा सी दी।।
बाहर
बुंदिया रिमझिम करतीं,
सरस
सरल संगीत सुनातीं ;
श्वाँस, अधऱ-कंपन मधु ध्वनि को,
अपने
गीतों में भरमाती ;
मेघों ने बरस-बरस बाहर, भीतर की आग बुझा सी दी।
दीपक
ने प्राण बुझाकर भी, पीतम के हाथ झुला सी दी।।
मैं
शिथिल हुई और रात ढली,
जब
ऊषा खिली, जब पलक खुली ;
कल
के कलरव की मंजु कथा,
लगि
झूठी सी, लगि और धुली ;
दीपक
ने दीवट से गिरकर, तन बिखरा बात छुपा सी दी।
टूटे
दीपक के टुकड़ों ने, वह रात अमिट सखि कर सी दी।।
के.एल. नेमा

बरस रही हैं झर-झर कितनी सुधियाँ
आज
घटाएँ उमड़-घुमड़ आती हैं...
नयन
तुम्हारे भर-भर आये होंगे.....।
थिरक
रही है वन-उपवन हरियाली....
घाव
तुम्हारे फिर हरियाये होंगे....।।
आज
गगन की गोद न चाँद-सितारे
ज्योंकि तुम्हारे मुख मुस्कान न होगी ।
किरन
रात से रूठी है, यूँ...जासे
–
तुम
से खुशियों की पहिचान न होगी ।।
ढीठ अँधेरा पाँव पसार रहा है......
पीर-पाहुन फिर बिरमाये होंगे......।।
आज
रात का घट न रीत पाया है
जैसे
अश्रु तुम्हारे भर लायी है....।
कितनी भीगी पवन, तुम्हारा आँचल....
आँसुओं से तर, जैसे छू आयी हो.....।।
बरस रही हैं झर-झर कितनी सुधियाँ....
तुमने बीते पल दुलराये होंगे ....।।
तड़प-तड़प उठती बिरहिन बदरिया
पीर
तुम्हारी ज्यों अकुलाती होगी।
सुलग-सुलग बुझ जाये रात अकेली
ज्यों बरसात तुम्हें सुलगाती होगी....।
किरन-किरन पर परतें जमीं धुएँ की......
तुमने गीत प्राण जलाये होंगे....।
आँसू
से धुल गयी रात की स्याही
नयनों की नगरी जगनारी होगी ....।
भोर
खिल उठी.... आखिर तुमने बेबस
पलक
उघारी, अलक कसंवारी होगी।
उषा किरन-कंचन बिखराती आती....
भाल
बाल रवि फिर मुस्काये होंगे .....।
चौरसिया जवाहर
‘तरुण’

तुलसी आंगन की कुम्हलाए
बदरा
बिन बरसे उड़ जाए
तुलसी आँगन की कुम्हलाए ।
मन
प्यासा है, नैना प्यासे
तन
प्यासा है मेरा
पूछा
पड़ौसन, निशदिन मुझसे
कहाँ
सजन है तेरा
नहीं
संदेसा कोई आए
तुलसी आँगन की कुम्हलाए ।
आँगन, द्वार, तकूँ में राहें
ध्यान न टूटे मेरा
गहराए जब रात अंधेरे
धीरज
छूटे मेरा
कोई
नहीं समझाए
तुलसी आँगन की कुम्हलाए।
उड़
जाए नैनों का कजरा
रचे
न मेंहदी रंग
रंग
जो आए तब जीवन में
प्रीतम हो जो संग
प्यासा जीवन बिरहा गाए
तुलसी आँगन की कुम्हलाए ।
इब्राहीम
“अश्क”

श्रेष्ठतम कृति कहीं तुम कलाकार की
मैं
सजाऊँ तो कैसे सजाऊँ भला
श्रेष्ठतम कृति रहीं तुम कलाकार की ।
हार फीका लगे जो गले में पड़ा
रंग सारे प्रकृति के वसन में सजे
सादगी में सही छवि रही देह की
ऊपरी साज सारा मलिन ही करे
मैं सजाऊँ तो कैसे सजाऊँ भला
श्रेष्ठतम कृति रहीं तुम कलाकार की ।
न
समता छटा से अलक की रही
चन्द्रमा से नहीं मेल मुख का रहा
हरिन
की न आँखें रहीं, आँख सी
गमन
भी न गज का गमन सा रहा
है
कठिन साम्य किससे बताऊँ भला
श्रेष्ठतम कृति रहीं तुम कलाकार की ।
खींचता हूँ लकीरें न खिंचती सही
रंग-रोगन न उसमें भरा जा सके
इस तरह छवि बदलती रहे भावनी
रूप रेखा पकड में न कुछ आ सके
सब कलाएँ थकी की थकी रह गईं
देखकर भंगिमा प्यार अभिसार की ।
साज
सिंगार रितुएं न कर पा रहीं
तुम
उन्हें दान देतीं रहीं कान्ति का
क्षुब्ध सरिता रही बावली प्रीति की
तुम
दिखाती रहीं पथ उसे शान्ति का
लुब्ध सारे नयन कुछ न कर पा रहे
क्या
बनक है बनी रूप सिंगार की ।
बोल सादे तुम्हारे मधुर गान से
क्या से क्या न करे मोहिनी रूप की
तन सिहरने लगे तमतमाने लगे
आँच लगने लगे कुनकुनी धूप की
भूलकर विश्व सारा तुम्हीं में रमा
सुधि रही एक जगती कि गलहार की ।
कौन
से पुण्य थे जो मिला साथ ये
तुम
मिलीं तो मुझे हर नियामत मिली
म्लान होवे नहीं मुख कुमुद का कभी
बस
संजोता रहूँ भावना यह दिनी
दे
सकूँ क्या तुझे सोच पाता नहीं
वस्तु ऐसी नजर में न उपहार की।
मैं सजाऊँ तो कैसे सजाऊँ भला
श्रेष्ठतम कृति रहीं तुम कलाकार की ।
डॉ. रमेश बुधौलिया

पिया-पिया बोलो
लाजभरा अवगुंठन
हौले से खोलो ।
काली कली झूम रही
गन्ध पवन चूम रही
सुमनों का सुरभित रस
सांसों में घोलो ।
प्रेम पगी ये रातें
रस भीनी बरसातें
मधुर मधुर सुधियों के
अँगना में डोलो ।
धरती आकाश जहाँ
मिलते उस ओर वहाँ
नेह नील सागर में
डूब तन भिनोंलो ।
जान या अजानी में
पपिहा की बानी में
आँखों ही आँखों बोलो ।
स्वप्न से असीमित तुम
शब्दों से
सीमित हम
भूल दो घड़ी के लिये
एक प्राण हो लो ।
कामता तिवारी
“राज”

तुमने भी देखा क्या
?
रोज सुबह उगता जो
इन्द्र धनुष आँखों में
मैने तो देखा है / तुमने भी देखा क्या
?
पीड़ा के जल में ही
शुभ कमल खिलते हैं
दुरदिन के भँवरे
मकरंद लिए मिलते हैं
जीवन का स्पंदन
फूल और परागों में
मैंने तो देखा है /तुमने भी देखा क्या
?
इच्छा के मरुस्थल में
तृष्णा है अन्तहीन
खोज रहे तृप्ति मगर
पास नहीं दूरबीन
सरस ही जल बहता
अब भी मरु के तल में
मैंने तो देखा है /तुमने भी देखा क्या
?
सूर्य नित्य करता है
पृथ्वी पर हस्ताक्षर
और प्रकृति पढ़ती है
इसका हर हर अक्षर
कालचक्र गतिमय में
क्षण-क्षण नवसर्जन हित
मैंने तो देखा है /तुमने भी देखा क्या
?
मुकुट सक्सेना

ओ
वासंती पवन हमारे घर आना
बहुत दिनों के बाद खिड़कियाँ खोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना।
जडे़ हुए थे ताले सारे कमरों में
धूल-भरे थे आले सारे कमरों में ।
उलझन
और तनावों के रेशों वाले
पुरे
हुए थे जाले सारे कमरों में ।
बहुत दिनों के बाद सँकलें डोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना ।
एक
थकन-सी थी नव भाव-तरंगों में
मौन
उदासी थी वाचाल उमंगों में
लेकिन आज समर्पण की भाषा वाले
मोहक-मोहक प्यारे-प्यारे रंगों में
बहुत दिनों के बाद खुशबुएँ घोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना
।
पतझर
ही पतझर था मन के मधुवन में
गहरा
सन्नाटा सा था अन्तर्मन में
लेकिन अब गीतों की स्वच्छ मुंडेरी पर
चिंतन की छत पर भावों के आँगन में
बहुत दिनों के बाद चिरइयाँ बोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना।
डॉ.कुंअर बेचैन