
दो गज़लें
लोहे के चार दिन
गुनते हुए कबीर के दोहे के चार दिन ।
कैसे गुज़र गये हैं भरोसे के चार दिन ।।
साअत बुरी हुई तो हरेक शै बुरा हुआ
रहते हैं साथ लोग भी अच्छे के चार दिन ।
मरहूम की तुरबत से हुई याद फ़ख्र से
आख़िर गुज़ार ही लिए ले दे के चार दिन ।
रहमत रही ख़ुदा की इनायत ज़हान की
जीने को हमको मिल गये सदके के चार दिन ।
अब ताब ही नहीं तो क्या नज्जार-ए-ज़माल
भूले नहीं हैं हम तेरे ज़लवे के चार दिन ।
फूलों का तज़किरा था बहारों की याद थी
इन आज़माइशों में थे काँटे के चार दिन ।
हर हर्फ़ आईना है जुनूं कैफ़ियत रही
मुरझा गये है फूल से चेहरे के चार दिन ।
'मुश्फ़िक'
अदबनवाज़ बड़े
सख़्तजां थे हम
सीधे हुए न हमसे ये लोहे के चार दिन ।
देखा न जायेगा कोई सपना मेरे बगैर
सुनी न होगी रंगते
दुनियाँ मेरे बगैर ।
होता रहेगा यूं ही तमाशा
मेरे बगैर ।।
सजता रहे हज़ारहा ज़लसा
मेरे बगैर
कोई भी बज़्म न रहे सूना
मेरे बगैर ।
मेरे रफ़ीक को मिले सद और
भी रफ़ीक
लेकिन न या पा सका कभी
मुझसा मेरे बगैर ।
कितनी हकीकतें हैं फ़साना
बनी हुई
जाया न हो जहान में
नग़्मा मेरे बगैर ।
तू दीदनी रहेगी ऐ दुनियां
हजारों साल
कम जाएगा न हुस्न का
ज़लवा मेरे बगैर ।
उससे जो राहे ज़ीस्त में
आधा नसीब है
देखा न जायेगा कोई सपना
मेरे बगैर ।
बज़्में तरब बहारे सुखन
फ़िक्रे आग ही
अच्छे से होगा और भी
अच्छा मेरे बगैर ।
मेरा वज़ूद कुछ भी नहीं
बेवज़ूद हूँ
आला मेरे बगैर है अदना
मेरे बगैर ।
ये रंज रफ़्ता-रफ़्ता
कलेजे से जायेगा
एक दोस्ती जो ही गई रुसवा
मेरे बगैर ।
दीवानगी थी अज़्मे सफ़र
कट गई हयात
मैं भी कहाँ रहा कभी तनहा
मेरे बगैर ।
माजी को जब भी याद करेगा
शबाबे नौ
पूरा न होगा कोई भी चर्चा
मेरे बगैर ।
'मुश्फ़िक'
चला चली में यहाँ कितने खो गये
रह जायेगा क्या ज़िस्म का
साया मेरे बगैर ।
मुस्तफ़ा हुसैन
‘मुश्फ़िक’

तीन
ग़ज़लें
हम जिसे चाहे थे पढ़ना
हम जिसे चाहे थे पढ़ना इक
खुली किताब की जैसे ।
दूर जाते ही
गये वो बीते हुए ख्वाब जैसे ।।
दिल की सरज़मीं पे उसकी
आज भी है याद ताज़ा
शबनमी रातों की सुबहा को
खिले गुलाब जैसे ।
आज भी हम हैं नशे में लाख
बीत जायें सदियाँ
डगमगाये लड़खड़ाये हों
पिये शराब जैसे ।
दिल के आसमाँ पे उसकी
ज़ुस्तजू की चमक ऐसी
राते - अमावस में
जगमगाये माहताब जैसे ।
फ़ीकी सभी जन्नतें हैं
उसकी रहगुज़र के आगे
ढूँढ़ती हो हूर भी उसके
लिये ख़िताब जैसे ।
उसकी बेवफाई भी दिल को
मेरे कुछ यूं लगे है
धूप छाँव खेलता बदली से
आफ़ताब जैसे ।
बड़ा होना
कहाँ मुमकिन है इस जहान
में बड़ा होना ।
हवा के जोश तूफ़ान में
खड़ा होना ।।
यदा कदा ही मिले हैं हमें
ऐसे इन्सां
हों खाली पेट मगर दिल सदा
भरा होना
जहाँ पर रेत के टीलों का
सिर्फ हो मंजर
गिरे सेहरा में ज्यों
दरख़्त का हरा होना ।
सभी कहते हैं जमीं आसमान
मिलते हैं
लगे अज़ीब इनके बीच
माज़रा होना ।
यकीं नहीं करें कोई भी
ऐसे इन्सां पे
मिलावट के ज़माने में
निरा खरा होना ।
वफ़ा इमान और सच्चाई पर
चलने वाला
लगे कंकर ज्यों रतन हार
में जड़ा होना ।
मुझसे पहले मेरी परझाई
मुझसे पहले मेरी परछाई
पहुँच जाती है ।
बिन बताये मेरी रूस्वाई
पहुँच जाती है ।
देखने आयें तमाशा ये
ज़माने वाले
क्या कहूँ जब के ये
ख़ुदाई पहुँच जाती है ।
कोई आमद तो है आँखों को
खटकती ऐसे
हिज्र की रात ज्यों
रौशनाई पहुँच जाती है ।
उसने धीरे से लिया नाम
मेरा तो ये लगा
सेहरा में जैसे के पुरवाई
पहुँच जाती है ।
उनका गुलशन हुआ बदनाम
मेरे होने से
भर बहार में कली मुरझाई
पहुँच जाती है
इस कदर रूतबा ज़फ़ाओं का
वफ़ा पर 'पुरनम'
पाकीज़ाओं में ज्यों
हरजाई पहुँच जाती है ।
प्रभा पाण्डे
'पुरनम'