
वसुधा के प्रतिबिंब
गंध पुष्प में, तेल तिल, काष्ठ अग्नि पैसार ।
त्यों आत्मा है देह में, देख विवेक विचार ।।
शासक का होता नहीं, कोई हित-प्रिय-साध्य ।
उसकी जनता जनार्दन, एक मात्र आराध्य ।।
वसुधा माता है बड़ी, वसुधा बड़ा कुटुम्ब ।
वसुधा के सब पुत्र हैं, वसुधा के प्रतिबिंब ।।
क्या लंकापति ले गया, क्या खोया नृप कर्ण ।
रावण अपयश, कर्ण ने पाया सुयश-सुवर्ण ।।
छोटी चिनगारी बड़े, वन को करे विनष्ट ।
देता है लघु शत्रु भी, बड़े-बड़ों को कष्ट ।।
तेरी कविता तीर है, मेरी तुक्का जान ।
तेरी मेरी है यही, कविता की पहचान ।।
रामरज शर्मा
‘पंकिल’

पानी
का भूगोल
हाथ उठाये खड़े हैं, कुँआ बाबड़ी ताल ।
एक बूँद पानी नहीं, मुँह बाए है काल ।।
सरिता जल का घाट से, चला बहुत संवाद ।
तुलसी ने चंदन घिसा, रहा न शेष विवाद ।।
नवल-धवल साड़ी पहन, नदिया दुलहन रूप ।
शैल-शिखर व्याहन चले, सजे-धजे जस भूप ।।
खेल खेलती लाटरी, नल बांटे जब नीर ।
जिसका क्रम में नाम हो, हरती उसकी पीर ।।
राजनीति की आँख में, पानी का भूगोल ।
बदलेगी जब पैतरे, आयेगा भूडोल ।।
घूँघट पानी ले चला, लुका छिपाकर रूप ।
दिखा गई बरबस हवा, मुस्कानों की धूप ।।
डॉ.
जयजयराम आनंद

बंजारन-सी ज़िंदगी
मिले दर्द की बाँसुरी, कसें कष्ट के तार ।
इस जीवन की बान का होता रहे सुधान ।।
आती-जाती लहर हैं, लहरों का कब अंत ।
सागर-सी इस देह में, अभिलाषायें अनंत ।।
नदी करे निर्माण ख़ुद, साग़र तक की राह ।
क्या है दुर्लभ जगत् में, है यदि उत्कट चाह ।।
सच्चाई का शव पड़ा, छिन्न-भिन्न ईमान ।
ख़ूब प्रसिद्धि पा रही, झूठों की दूकान ।।
सींचे जाते कैक्टस, हैं गुलाब मोहताज़ ।
अपने वाद्य उपेक्षित, छिड़े विदेशी साज़ ।।
रेत-रेत नदिया मिली, ख़ाली, सूख़े कूप ।
कोई दृष्टि निश्छल नहीं, मिला न निर्मल रूप ।।
कस्तुरी हो याद की, या मौसम का घाव ।
बंजारन-सी ज़िंदगी, चलना महज़ स्वभाव ।।
पेड़ों को मिलती नहीं, अपनी ख़ुद की छाँव ।
तेज़ धूप वो झेलते, चैन पा रहा गाँव ।।
रामेश्वर हरिद