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छंद

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दोहा  गीत ग़ज़ल

माह के छंदकार- लक्ष्मीनारायण शर्मा 'साधक'

दोहाकार- रामरज शर्मा पंकिल, डॉ. जयजयराम आनंद, रामेश्वर हरिद

 

 

 

वसुधा के प्रतिबिंब

गंध पुष्प में, तेल तिल, काष्ठ अग्नि पैसार ।

त्यों आत्मा है देह में, देख विवेक विचार ।।

 

शासक का होता नहीं, कोई हित-प्रिय-साध्य ।

उसकी जनता जनार्दन, एक मात्र आराध्य ।।

 

वसुधा माता है बड़ी, वसुधा बड़ा कुटुम्ब ।

वसुधा के सब पुत्र हैं, वसुधा के प्रतिबिंब ।।

 

क्या लंकापति ले गया, क्या खोया नृप कर्ण ।

रावण अपयश, कर्ण ने पाया सुयश-सुवर्ण ।।

 

छोटी चिनगारी बड़े, वन को करे विनष्ट ।

देता है लघु शत्रु भी, बड़े-बड़ों को कष्ट ।।

 

तेरी कविता तीर है, मेरी तुक्का जान ।

तेरी मेरी है यही, कविता की पहचान ।।

रामरज शर्मा पंकिल

 

 पानी का भूगोल

हाथ उठाये खड़े हैं, कुँआ बाबड़ी ताल ।

एक बूँद पानी नहीं, मुँह बाए है काल ।।

 

सरिता जल का घाट से, चला बहुत संवाद ।

तुलसी ने चंदन घिसा, रहा न शेष विवाद ।।

 

नवल-धवल साड़ी पहन, नदिया दुलहन रूप ।

शैल-शिखर व्याहन चले, सजे-धजे जस भूप ।।

 

खेल खेलती लाटरी, नल बांटे जब नीर ।

जिसका क्रम में नाम हो, हरती उसकी पीर ।।

 

राजनीति की आँख में, पानी का भूगोल ।

बदलेगी जब पैतरे, आयेगा भूडोल ।।

 

घूँघट पानी ले चला, लुका छिपाकर रूप ।

दिखा गई बरबस हवा, मुस्कानों की धूप ।।

डॉ. जयजयराम आनंद

 

बंजारन-सी ज़िंदगी

मिले दर्द की बाँसुरी, कसें कष्ट के तार ।

इस जीवन की बान का होता रहे सुधान ।।

 

आती-जाती लहर हैं, लहरों का कब अंत ।

सागर-सी इस देह में, अभिलाषायें अनंत ।।

 

नदी करे निर्माण ख़ुद, साग़र तक की राह ।

क्या है दुर्लभ जगत् में, है यदि उत्कट चाह ।।

 

सच्चाई का शव पड़ा, छिन्न-भिन्न ईमान ।

ख़ूब प्रसिद्धि पा रही, झूठों की दूकान ।।

 

सींचे जाते कैक्टस, हैं गुलाब मोहताज़ ।

अपने वाद्य उपेक्षित, छिड़े विदेशी साज़ ।।

 

रेत-रेत नदिया मिली, ख़ाली, सूख़े कूप ।

कोई दृष्टि निश्छल नहीं, मिला न निर्मल रूप ।।

 

कस्तुरी हो याद की, या मौसम का घाव ।

बंजारन-सी ज़िंदगी, चलना महज़ स्वभाव ।।

 

पेड़ों को मिलती नहीं, अपनी ख़ुद की छाँव ।

तेज़ धूप वो झेलते, चैन पा रहा गाँव ।।

रामेश्वर हरिद

 

 

 

 

 

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अन्याय को मिटाओ, लेकिन अपने-आप को मिटाकर नहीं - प्रेमचंद

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