जुगनू
अपने मन की गाँठें खोलो
तुम क्यों इधर-उधर यों डोलो।
इन अँधियारी रातों में क्यों
–
भटक रहे अनजान।
जे जुगनू नादान
लघुता के वरदान ।
किसका रूप तुम्हें भरमाए
रह-रहकर जो यों तड़पाए ।

किसकी याद हृदय में ले तुम-
हुए ज्याति-उपमान ।
हे जुगनू छविमान
लघुता के वरदान ।
सतत साधना के अभ्यासी
जीवन में जय के विश्वासी ।
अंधकार को भेद रहे तुम-
ले नन्हीं-सी जान ।
हे जुगनू यशवान
लघुता के वरदान ।
मैं भी तुम-सा भटक रहा हूँ
प्रति पग-पग पर अटक रहा हूँ ।
जाने भाग्य कहाँ ले जाए-
हो जाए अवसान ।
हे जुगनू द्युतिमान
लघुता के वरदान ।
डॉ.गणेश दत्त सारस्वत
सर्दी आई
सर्दी आई, सर्दी आई
ठंड की पहने वर्दी आई ।
सबने लादे ढ़ेर से कपड़े
चाहे दुबले, चाहे पतले ।
नाक सभी की लाल हो गई
सुकड़ी सबकी चाल हो गई ।
ठिठुर रहे हैं, काँप रहे हैं
दौड़ रहे हैं, हाँफ रहे हैं ।
धूप में दौड़े तो भी सर्दी
छाँवों में बैंठें तो भी सर्दी ।
बिस्तर के अंदर भी सर्दी
बिस्तर के बाहर भी सर्दी ।
बाहर सर्दी, घर में सर्दी
पैर में सर्दी, सर में सर्दी ।
इतनी सर्दी किसने करदी
अंडे की जम जाये ज़र्दी ।
सारे बदन में ठिठुरन भर दी
जाड़ा है मौसम बेदर्दी ।
सफ़दर हाश्मी
हमसे सब कहते
नहीं सूर्य से कहता कोई
धूप यहाँ पर मत फैलाओ ।
कोई नहीं चाँद से कहता
उठा चाँदनी को ले जाओ ।
कोई नहीं हवा से कहता
खबरदार जो अंदर आई ।

बादल से कहता कब कोई
क्यों जलधार यहाँ बरसाई
?
फिर क्यों हमसे भैया कहते
यहाँ न आओ, भागो जाओ ।
अम्मा कहती हैं, घर-भर में
खेल-खिलौने मत फैलाओ ।
पापा कहते बाहर खेलो
खबरदार जो अंदर आए ।
हम पर ही सबका बस चलता
जो चाहे वह डाँट बताए ।
निरंकार देव सेवक
