रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001  ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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जुगनूः डॉ.गणेश दत्त सारस्वत सर्दी आईःसफ़दर हाश्मी हमसे सब कहतेः निरंकार देव सेवक

प्रेरक प्रसंग

छोटा या बड़ाः भारती त्रिपाठी बुराई की जड़ संजुक्ता पंडा सही निशाना संदीप पंडा

अल्लाह का करिश्माः गीति मिश्रा तृप्ति का साधनः नीति मिश्रा गंदा पानीः श्रीकांत मिश्रा

 

 

 


जुगनू 


अपने मन की गाँठें खोलो

तुम क्यों इधर-उधर यों डोलो।

इन अँधियारी रातों में क्यों

भटक रहे अनजान।

जे जुगनू नादान 

लघुता के वरदान ।

 

किसका रूप तुम्हें भरमाए

रह-रहकर जो यों तड़पाए ।

किसकी याद हृदय में ले तुम-

हुए ज्याति-उपमान ।

हे जुगनू छविमान

लघुता के वरदान ।

 

सतत साधना के अभ्यासी

जीवन में जय के विश्वासी ।

अंधकार को भेद रहे तुम-

ले नन्हीं-सी जान ।

हे जुगनू यशवान

लघुता के वरदान ।

 

मैं भी तुम-सा भटक रहा हूँ  

प्रति पग-पग पर अटक रहा हूँ ।

जाने भाग्य कहाँ ले जाए-

हो जाए अवसान ।

हे जुगनू द्युतिमान

लघुता के वरदान ।

डॉ.गणेश दत्त सारस्वत


सर्दी आई


सर्दी आई, सर्दी आई

ठंड की पहने वर्दी आई ।

 

सबने लादे ढ़ेर से कपड़े

चाहे दुबले, चाहे पतले ।

 

नाक सभी की लाल हो गई

सुकड़ी सबकी चाल हो गई ।

 

ठिठुर रहे हैं, काँप रहे हैं

दौड़ रहे हैं, हाँफ रहे हैं ।

 

धूप में दौड़े तो भी सर्दी

छाँवों में बैंठें तो भी सर्दी ।

 

बिस्तर के अंदर भी सर्दी

बिस्तर के बाहर भी सर्दी ।

 

बाहर सर्दी, घर में सर्दी

पैर में सर्दी, सर में सर्दी ।

 

इतनी सर्दी किसने करदी

अंडे की जम जाये ज़र्दी ।

 

सारे बदन में ठिठुरन भर दी

जाड़ा  है  मौसम  बेदर्दी ।

सफ़दर हाश्मी


हमसे सब कहते


नहीं सूर्य से कहता कोई

धूप यहाँ पर मत फैलाओ ।

कोई नहीं चाँद से कहता

उठा चाँदनी को ले जाओ ।

 

कोई नहीं हवा से कहता

खबरदार जो अंदर आई ।

बादल से कहता कब कोई

क्यों जलधार यहाँ बरसाई ?

 

फिर क्यों हमसे भैया कहते

यहाँ न आओ, भागो जाओ ।

अम्मा कहती हैं, घर-भर में

खेल-खिलौने मत फैलाओ ।

 

पापा कहते बाहर खेलो

खबरदार जो अंदर आए ।

हम पर ही सबका बस चलता

जो चाहे वह डाँट बताए ।

निरंकार देव सेवक

 

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