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अष्टसिद्धि नवनिधि के दाता |
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गौतम पटेल |

देवर्षि,
ब्रह्मर्ष, महर्षि, ऋषि-मुनि, साधु-सन्त, महात्माओं तथा
भक्तों ने ज्ञान प्राप्ति के लिए अनेक साधन बनाये हैं।
सभी साधनों का लक्ष्य ब्रह्मा की प्राप्ति तथा अज्ञान की
निवृत्ति है । निखिल विश्व में सर्वत्र व्याप्त
हनुमत्-साधना भी उन्हीं में से एक है। हनुमत-साधना से
अनेक लौकिक सिद्धियाँ भी प्राप्त होती है। कहा भी गया है
कि श्री हनुमान जी
‘अष्टसिद्धि
नवनिधि के दाता’
हैं ।
‘अणमा
महिमा चैत्र गरिमा लधिमा तथा । प्राप्तिः प्राकाम्यमी
शइत्वं वशित्वं चाष्टासिद्धियः ।।’
-अमरकोश,
रामाश्रयी व्याख्या -1/1/34
अणिमा, लधिमा, महिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य,
वशित्व तथा ईशित्व ये अष्ट सिद्धियाँ भक्त शिरोमणि
हनुमानजी में प्रतिष्ठित थीं ।
1.अणिमाः- यह सिद्धि
जिससे योगी अति सूक्ष्म रूप धारण कर सकता है।
‘मसक
समान रूप कपि धरी । लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी ।।’
श्री हनुमान जी
मच्छर के समान लघु से लघु रूप
धारण कर नररूपथारी श्री हरि अर्थात् श्री राम चंद्र जी का
स्मरण करके लंका
पहुँच गये ।
2. लघिमाः- योग से
प्राप्त वह शक्ति जिससे योगी लघु, बहुत छोटा या हल्का बन
सकता है।
‘जस-जस
सुरसा बदनु बढ़ावा । तासु दून कपि रूप देखावा ।
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा । अति लघु रूप
पवनसुत लीन्हा ।
जैसे-जैसे सुरसा मुख का विस्तार बढ़ाती थी,
हनुमान जी उसका दूना रूप दिखलाते थे। जब उसने सौ योजन मुख
किया, तब हनुमान जी ने लघु, अथवा बहुत ही छोटा रूप धारण कर
लिया ।
3.
महिमाः- महावीर की मह्त्ता का बखान
ऋक्षराज जामवंत की वाणी से गोस्वामी जी के शब्दों में-
‘कवन
सो काज कठिन जग माहीं । जो नहीं होइ तात तुम्ह पाहीं ।।’
जगत् में कौन सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात
!
तुमसे न हो सके ?
4.गरिमाः- द्वापर युग में
गन्धमादनांचल में गुरूत्व अथवा भारीपन लिए हुए अपनी पूंछ
फैलाकर स्वच्छन्द पड़े गरिमामय बजरंग बली, बलगर्वित भीमसेन
से बोले-अत्यधिक वृद्धावस्था के कारण मैं स्वयं उठने में
नितान्त असमर्थ हूँ, कृपया आप ही मेरी इस पूंछ को हटाकर
आगे बढ़ जाइये । महाबली भीमसेन पहले बायें हाथ से, फिर
दियें हाथ से तदुपरांत दोनों हाथ से अपने संपूर्ण बल का
उपयोग करने के उपरांत भी जब महाकपि की पूंछ को टस से मस न
कर सके, तब उन्होंने महाकपि से
क्षमा याचना की
।(महाभारत-3/147/15-20) इस प्रसंग में महामारूति में
महिमा-सिद्ध का पूर्ण प्रस्फुटित रूप प्रत्यक्ष उपस्थित हो
जाता है ।
5. प्राप्तिः-
प्राप्ति-सिद्ध प्रतिष्ठित होने पर साधक को वांछित फल
प्राप्त होता है। श्री सीता जी की खोज में अनेकानेक
वानर-भालू चारों दिशाओं में । उनमें श्री मारूति ही
एक-अकेले श्री सीतान्वेषक बने ।
6. प्राकाम्यः- प्राकाम्य
सिद्धि वह सिद्धि है जिससे साधक की कामना पूर्ण होती है।
श्री रामराज्याभिषेक
समारोह के समय सर्वाधिक मूल्यवान मणियों को
श्री रामभक्त ने अपने दातों से फटाफट फोड़ दिया । श्री
राम भक्त ने भरे राजसभा में यह बात कही कि
‘जिस
वस्तु में श्री राम नाम नहीं, वह वस्तु तो दो कौड़ी की भी
नहीं । इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए राजसभासदों के
मध्य आसीन एक रत्न पारखी के पूछने पर कि क्या आपके शरीर
में श्री राम नाम लिखा है
?
हनुमान जी ने अपने बज्र नख से अपनी छाती का चमड़ा उधेड़कर
दिखा दिया । श्री राम-जानकी उनके हृदय में विराजित थे और
उनके रोम-रोम में श्रीराम नाम अंकित था।श्री राम भक्त ने
अपने इष्टदेव को तन-मन
धन से उपरोक्तानुसार संजोया है।
7. वाशित्वः- वह सिद्धि
जिससे साधक सबको अपने वश में कर लेता है। सर्व सुख-दुःख
हनुमानजी के वश में हैं।
‘सब
सुख लहै तुम्हारी सरना । तुम रक्षक काहू को डरना ।।
आपने तेज सम्हारों आपै । तीनों लोक हांक तें कांपै।।
भूत पिचास निकट नहीं आवै । महाबीर जब नाम सुनावै।
संकट कटै मिटै सब पीरा । जौ सुमिरै हनुमत बलबीरा ।।
हनुमान चालीसा
8. ईशित्वः- सिद्धि
प्रतिष्ठित हो जाने पर साधक में ऐश्वर्य तथा ईश्वरत्व भी
स्वतः सिद्ध हो जाता है ।
“अर्चना-आराधना
के अनोखे हो देव तुम, सब जाति मानती है, ऐसे दयावान हो ।’
घर-घर पूजते हैं चित्र भी पवित्र मान, कोई ग्राम है नहीं,
जहाँ न हनुमान हो ।।”
कविभूषण श्री जगदीश जी साहित्यरत्न-(कल्याण श्री
हनुमान-अंक पृष्ठ-439
)
इस प्रकार श्री हनुमान जी के चरित्र में अष्टसिद्धि के
प्रतिष्ठित स्वरूपों का स्पष्ट
प्रमाण मिलता है।
किसी बात पर इसलिए विश्वास मत करों कि तुम्हें वैसा
बताया गया है या गुरूजनों ने वैसा कहा है या फिर परम्परा
से वैसा होता आया है, लेकिन फिर भी यदि उचित
निरीक्षण,
परीक्षण और विश्लेषण करने के पश्चात् जो तुम्हें उचित लगे, कल्याणकारी लगे, सर्वहितकारी लगे तो उस
सिद्धान्त पर अमल करो और आजीवन उस पर डटे रहो ।
अर्थ्-विज्ञान का अभिप्राय है विहितार्थ समझने का ज्ञान,
आशय समझने का भाव, यथार्थ समझने का
तत्वार्थ, तात्पर्य
समझने का ममार्थ । इस कारण जहाँ अर्थ-विज्ञान की बात हो
वहाँ अक्षरशः अर्थ
न लेकर भावार्थ भी लेना चाहिए, यह संस्कृत शास्त्रों की परिपाटी है। निधि अर्थात् वह आधार,
प्रात्र या स्थान जिसमें कोई गुण या पदार्थ व्याप्त अथवा
स्थित हो-आश्रम स्थान । जैसे-
(1)
घर
निधि
- निवास या आवास
।
(2) सागर
निधि - क्षीरनिधि, जलाशय, सरोवर, कुँआ, नलकूप
।
(3) नागर
निधि - किसी विशेष कार्य के लिए पृथक सुरक्षित
धन-सम्पदा ।
(4) आगार
निधि -
मंदिर, शिवालय, देवालय इत्यादि देवभूमि
अथवा देवस्थान ।
(5) आगार
निधि - आश्रय, अवलंब, सहारा, नींव, मूल, जड़ ।
(6) भण्डार
निधि - कोठार, खाद्यान्न रखने का स्थान, भण्डार
गृह ।
(7) भू-गर्भ
निधि - भूमि में गड़ी हुई धनराशि ।
(8) जीवक
निधि - जीवक नामक औषधि, धन ।
(9) नलिका
निधि - नली या
नलिका नामक एक गंथ द्रव्य,आक्सीजन।
(10)
गो निधि - गौशाला, गजशाला, घुड़साल,
भैंसथान ।
(11)
गुण निधि - सद्गुण सम्पन्न व्यक्तित्व,
दयानिधि, कृपानिधि।
(12)
संचय निधि - संचलन,
एकत्रीकरण, संग्रहालय,
ग्रंथालय ।
(13) संतोष निधि -
सदा प्रसन्न रहना, न चिंता, न निंदा, न उलाहना, न अपेक्षा,
न कामना ।
(14) साथ निधि -
सेवा, सत्संग, स्वाध्याय, संतोष, स्मरण, समर्पण ।
(15) तप निधि -
तपोनिधि, तपोनिष्ठ, तपोधन, तपबल, मनोबल ।
(16) रत्ननिधि
- कुबेर के नौ रत्न-पद्म,
महापद्मम, शंख, मकर,
कच्छप,मुकंद,कुंद, नील और बर्च्च।
(17) नवरत्न निधि -
माणिक्य, मोती, मूंगा, पन्ना, पुखराज, हीरा, नीलम, गोमेद,
लहसुनिया ।
(18) नवसंख्या निधि -
उपरोक्त आदार पर नौ की संख्या या सूचक
शब्द है - निधि अथवा नवनिधि।
(19) नवलक्ष्मी निधि
- विभूति,नम्रता, कांति, तुष्टि, कीर्ति, सन्नति,
पुष्टि, उत्कृष्टि और ऋद्धि ।
(20) नवधातु -
सोना, चाँदी, लोहा, सीसा, तांबा, रांगा, इस्पात, कांसा और
कांतिलोहा ।
(21) नवभक्ति -
श्रवण,कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, सख्य, दास्य
और आत्म निवेदन
।
(22) नवशक्ति -
प्रभा, माया, जया, सूक्ष्मा, विशुद्धा, नंदिनी, सुप्रभा, विजया और
सर्वसिद्धा।
(23) नव अलंकार -
कुँडल, कंकण, मेमला,केयर, नूपुर, पदक,कटिसुत्र(करधन), सिकड़ीऔर
मूँदरी ।
(24) नवपरिधान -
पीताम्बर,उपरत्ना,पगड़ी,कंचुकी, पगड़ी के ऊपर बँधने वाले
दिव्य वस्त्र,कमरबन्द, रूमाल, अल्फी और दुपट्टा ।
(25) नवपुष्प -
जूही, चम्पा, मन्दार, तुलसी, वैजयन्ती, मालती, दमनक, केतकी और
सिही।
(26) नवफल -
आम, जामुन, कैथा,
सीता फल, अनार, खजूर, नारियल, केला और कटहल।
(27)
नवखाद्यान्न - मोदक, लड्डु, मंड, वटक, फेणिका,
भात, शाक,पर्पट और पायस।
(28) नवताम्बूलोपचार -
पान, सुपारी, खैर, चूना, चावित्री, जायफल, कपूर, केसर और
इलायची
।
(29) नवराजोपचार -
छत्र, सिंहासन, रथ, चामर, पंखा, गिलास, पानदान,ओगालदान और
पिटारी ।
(30) नवशय्योपचार -
पलंग, गद्दा, चाँदनी, तकिया, शीशा, दीपक, जलपात्र, चादरऔर
व्यंजन।
(31) रामरतनधनखान -
ब्रह्म, विष्ण, महेश, परमपिता परमात्मा,परमेश्वर,मालिक, सब
का मालिक एक, एकेश्वर इत्यादि-इत्यादि । नेति-नेति, इतना
ही नहीं-इतना ही नहीं, और भी अनेकानेक;
और भी अनन्त अष्ट सिद्धि और नवनिधि के दाता हैं हमारे
पूज्य श्री हनुमान जी । हनुमान चालीसा के पद, सीता-माता की
वाणी और संत गोस्वामी तुलसीदासजी के शब्द-
“अष्ट
सिद्धि नवनिधि के दाता, अस वर दीन जानकी माता ।”